किसान रहें सतर्क! आलू की फसल में लेट ब्लाइट का बढ़ा खतरा, जानें पहचान और नियंत्रण के तरीके
14 जुलाई 2026, नई दिल्ली: किसान रहें सतर्क! आलू की फसल में लेट ब्लाइट का बढ़ा खतरा, जानें पहचान और नियंत्रण के तरीके – आलू की खेती करने वाले किसानों के लिए लेट ब्लाइट (Late Blight) सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक मानी जाती है। यह रोग फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टैन्स नामक कवक के कारण होता है और अनुकूल मौसम मिलने पर कुछ ही दिनों में पूरी फसल को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। यह रोग पौधों की पत्तियों, तनों और कंदों को संक्रमित कर उत्पादन और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है। इसलिए समय रहते इसकी पहचान और नियंत्रण करना बेहद जरूरी है।
कैसे फैलता है यह रोग?
लेट ब्लाइट का रोगजनक संक्रमित बीज कंदों में जीवित रहता है। इन्हीं संक्रमित कंदों से अगली फसल में रोग की शुरुआत होती है। इसके बाद कवक से बनने वाले बीजाणु हवा, बारिश और सिंचाई के पानी के माध्यम से अन्य पौधों तक पहुंचकर संक्रमण फैलाते हैं। कम तापमान और अधिक नमी की स्थिति में यह रोग तेजी से फैलता है।
रोग के प्रमुख लक्षण
रोग की शुरुआत पत्तियों पर छोटे-छोटे पानी जैसे धब्बों से होती है, जो बाद में गहरे भूरे रंग के अनियमित धब्बों में बदल जाते हैं। इन धब्बों के चारों ओर हल्के हरे रंग का घेरा दिखाई देता है। सुबह के समय पत्तियों की निचली सतह पर सफेद रूई जैसी फफूंद भी दिखाई दे सकती है। यदि संक्रमण बढ़ जाता है तो तनों पर लंबी भूरी धारियां बन जाती हैं। वहीं कंदों पर भूरे रंग के धंसे हुए धब्बे दिखाई देते हैं और अंदर का भाग स्पंजी तथा जंग जैसे भूरे रंग का हो जाता है। छोटे और अपरिपक्व कंद इस रोग से अधिक प्रभावित होते हैं।
इन परिस्थितियों में तेजी से फैलता है रोग
विशेषज्ञों के अनुसार, रुक-रुक कर होने वाली बारिश, अधिक नमी और 16 से 18 डिग्री सेल्सियस तापमान इस रोग के फैलने के लिए अनुकूल माना जाता है। ऐसी स्थिति में रोग का एक चक्र केवल 4 से 5 दिन में पूरा हो सकता है। वहीं 10 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर इसका विकास अपेक्षाकृत धीमा हो जाता है।
ऐसे करें बचाव और नियंत्रण
लेट ब्लाइट से बचाव के लिए किसानों को केवल रोगमुक्त बीज कंदों का ही उपयोग करना चाहिए और जहां संभव हो, रोग प्रतिरोधी किस्मों की खेती करनी चाहिए। यदि खेत में रोग के लक्षण दिखाई दें, तो कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार अनुशंसित फफूंदनाशकों का समय पर छिड़काव करें। साथ ही आसपास के किसानों को भी रोग नियंत्रण के उपाय अपनाने के लिए प्रेरित करें, ताकि संक्रमण का प्रसार रोका जा सके।
खेत और भंडारण में रखें विशेष सावधानी
रोगग्रस्त पौधों और कंदों को खेत से निकालकर सुरक्षित तरीके से नष्ट करें, ताकि संक्रमण आगे न फैले। यदि रोग की तीव्रता अधिक हो जाए, तो प्रभावित पौधों के तनों को काटकर गड्ढे में दबा दें। खुदाई के समय संक्रमित कंदों को अलग कर नष्ट करें और फसल अवशेषों को इकट्ठा कर जला दें। इसके अलावा भंडारण स्थल को साफ-सुथरा और संक्रमण मुक्त रखना भी जरूरी है।
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