सरसों में सल्फर की कमी से आधी रह सकती है पैदावार, जानिए वैज्ञानिक पोषण प्रबंधन
22 जून 2026, नई दिल्ली: सरसों में सल्फर की कमी से आधी रह सकती है पैदावार, जानिए वैज्ञानिक पोषण प्रबंधन – सरसों भारत की सबसे महत्वपूर्ण तिलहनी फसलों में से एक है, लेकिन इसके बावजूद पोषण प्रबंधन के मामले में यह फसल अक्सर उपेक्षित रह जाती है। किसान सामान्यतः नाइट्रोजन और फास्फोरस पर ध्यान देते हैं, जबकि सरसों के लिए सल्फर उतना ही महत्वपूर्ण तत्व है जितना नाइट्रोजन।
सरसों की फसल को सामान्यतः 80 से 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 से 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 से 60 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। लेकिन तेल उत्पादन और गुणवत्ता के लिए सल्फर की भूमिका विशेष महत्व रखती है। सल्फर की कमी होने पर पौधों का विकास प्रभावित होता है, फूल कम बनते हैं और तेल प्रतिशत में गिरावट आ सकती है।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार सल्फर प्रोटीन संश्लेषण और तेल निर्माण दोनों प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही कारण है कि सरसों उत्पादक क्षेत्रों में सिंगल सुपर फॉस्फेट का उपयोग विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। एसएसपी फास्फोरस के साथ-साथ सल्फर भी उपलब्ध कराता है।
बोरॉन की कमी भी सरसों में एक उभरती हुई समस्या है। इसकी कमी होने पर फूल झड़ने लगते हैं और दानों का विकास प्रभावित होता है। कई क्षेत्रों में बोरॉन आधारित उर्वरकों के उपयोग से उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की गई है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि सरसों की फसल में संतुलित पोषण प्रबंधन केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि तेल की गुणवत्ता सुधारने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन, सल्फर की पर्याप्त उपलब्धता और सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति से किसान बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
आज जब खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुकी है, तब सरसों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक पोषण प्रबंधन को अपनाना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
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