पशुपालन (Animal Husbandry)

पशुओं एवं कुक्कुटों के स्वास्थ्य के लिए विटामिन-ए का महत्व

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  • डॉ. नीतू राजपूत द्य डॉ. प्रियंका पाटील
  • डॉ. बी.पी. शुक्ला, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन
    महाविद्यालय, महू, इंदौर

 

11 मई 2023,  पशुओं एवं कुक्कुटों के स्वास्थ्य के लिए विटामिन-ए का महत्व – मानव और पशुओं दोनों को ही दैनिक जीवन में बहुत सारे कार्यों को करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसकी पूर्ति के लिए हम विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं जिनके प्रमुख अवयव होते हैं-कार्बोहायड्रेट, वसा, प्रोटीन, खनिज, लवण और विटामिन।

विटामिन का मतलब किसी ऐसे जैविक और अति महत्वपूर्ण पोषक पदार्थ से है जो हमें बेहद सूक्ष्म मात्रा में आवश्यक होता है। विटामिन्स दो तरह के होते हैं – जल में घुलनशील और वसा में घुलनशील। विटामिन-ए, विटामिन-डी, विटामिन-ई, विटामिन-के वसा में घुलनशील है जबकि विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स और विटामिन-सी जल में घुलनशील विटामिंस हैं। विटामिन-बी कामप्लेक्स कुछ को-एंजाइम का समूह होता है। इस लेख के द्वारा विटामिन-ए की पशुओं व मुर्गियों में आवश्यक महत्ता, इसकी कमी व अधिकता के कारण स्वास्थ व प्रजनन पर होने वाले प्रभाव से संबंधित जानकारी प्रस्तुत की जा रही है।

पशुओं एवं कुक्कुटों के स्वास्थ्य और प्रजनन में विटामिन-ए का उपयोग
  1. यह भ्रूण के समुचित विकास के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। 2. त्वचा के लिए स्वास्थवर्धक होता है। 3. रक्त में कैल्शियम का स्तर बनाए रखने और हड्डियों के संवर्धन के लिए आवश्यक है। 4. हड्डियों, दांत और ऊतकों के रखरखाव के लिए आवश्यक है। 5. ऊर्जा पैदा करने के लिए सभी कोशिकाओं को इसकी जरुरत पड़ती है।
  2. विटामिन-ए सफेद रक्त कोशिकाओं के निर्माण में सहायता करके प्रतिरक्षा प्रणाली में जीवाणु और विषाणु से लडऩे में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विटिमिन-ए के स्रोत

चुकंदर, साग, ब्रोकली, साबुत अनाज, पनीर, गिरीदार फल, बटर, गाजर, मक्खन, मिर्च, दूध, घी, हरी पत्तेदार सब्जियां, अंडा, बींस, राजमा, मांस, आम, सरसों, पपीता, धनिया, चीकू, मटर, कदृदू, लाल मिर्च, सी फूड, शलजम, टमाटर, शकरकंद, तरबूज, मकई के दाने, पीले या नारंगी रंग के फल, कॉड लीवर ऑयल, फिश मील तथा मीट मील आदि।

विटामिन-ए की कमी के दुष्प्रभाव

विटामिन-ए की कमी विकासशील देशों में आम समस्या है। विटामिन-ए की कमी का प्रमुख कारण लंबे समय से पाचन तंत्र या जिगर के दोष, राशन में ज्यादा मात्रा में फॉस्फोरस, अपर्याप्तविटामिन-ए और लोह तथा जस्ता (जिंक) के निम्न स्तर का होना है। लौह (आयरन) हमारे शरीर द्वारा विटामिन-ए अवशोषित करने में मदद करता है। जस्ता (जिंक) के निम्न स्तर की वजह से जिगर से शरीर में विटामिन-ए पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँच पाता है।

शारीरिक क्रियाओं में विटामिन-ए की भूमिका

विटामिन-ए हमारे शरीर की कोशिकाओं और ऊतकों को सामान्य रखने में मदद करता है। विशेषत: पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, मूत्र तंत्र, आँखें और त्वचा की कोशिकाएं। विटामिन-ए की कमी होने पर इन विशेष ऊतकों और कोशिकाओं का रखरखाव नहीं हो पाता तथा ये छोटे हो जाते हैं।

फिर इन कोशिकाओं का क्षय हो जाता है। जब ये विशेष कोशिकाएं लुप्त हो जाती हैं तो इनके स्थान पर किरैंटेटिनिज्ड कोशिकाओं का उद्धव होता है। किरैंटेटिनिज्ड ऊतकों के आने के कारण पाचन तंत्र से पोषक तत्वों का संग्रहण व अवशोषण घट जाता है।

श्वसन तंत्र, मूत्र तंत्र व त्वचा में विटामिन-ए की भूमिका 

श्वसन तंत्र में धूल और दूसरे सूक्ष्म कणों का अवशोषण होने से निमोनिया का खतरा बढ़ जाता है। मूत्र तंत्र में पथरी की संभावना बढ़ जाती है। विटामिन-ए की कमी से त्वचा भी शुष्क हो जाती है और ज्यादा दिनों के बाद मछलियों की खाल की तरह से दिखने लगती है।

आँखों की सामान्य पुष्टि के लिए आवश्यक

रतौंधी के अलावा आँखों की आंसू की ग्रंथि की कोशिकाओं का ह्वास या क्षरण होने से आंसू नहीं बन पाते औरे आँखें सूख जाती हैं। आँखों के सूखने के कारण घाव भी बन जाते हैं और बाद में पशु अंधा हो जाता है।

मुर्गियों के स्वास्थ्य व उत्पादन हेतु विटामिन-ए का महत्व 

कुक्कुटों में विटामिन-ए की कमी से न्यूट्रीशनल राऊप नामक बिमारी, पाचन तंत्र के आहारनाल में होती है। कुक्कुटों में विटामिन-ए की कमी से हड्डियों की सूजन (गाउट) रोग की संभावना भी बढ़ जाती है। इसके अलावा अंडों का उत्पादन कम हो जाता है, अंडों के सेने के बाद जिन्दा चूजे कम आते हैं, चूजों का विकास रूक जाता है और कुक्कुटों के पंखो का विकास भी उचित तरह से नहीं हो पाता है।

प्रजनन में विटामिन-ए का महत्व

विटामिन-ए पशुओं के प्रजनन में बेहद ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मादा पशुओं के गर्भकाल के दौरान माता और गर्भ में पल रहे शिशु के बीच जरायुनाल या गर्भनाल (प्लेसेंटा) से पोषक तत्वों का खून के माध्यम से आदान-प्रदान होता है। विटामिन-ए की कमी से गर्भनाल की कोशिकाओं का क्षरण हो जाता है तथा कई बार जन्म के समय से पहले ही मादा के गर्भ में शिशु की मृत्यु हो सकती है। विटामिन-ए की कमी से नर पशुओं के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या कम हो जाती है तथा प्रजनन क्षमता घट जाती है।

विटामिन-ए की कमी से बचाव 

विटामिन-ए की कमी को दूर करने हेतु पशुपालक अपने पशुओं और कुक्कुटों को विटामिन-ए के स्रोत जैसे हरा चारा, संतुलित आहार, फिश मील तथा मीट मील आहार के साथ मिलाकर दें। बाजार में विटामिन-ए की दवाइयाँ उपलब्ध हैं। पशुपालक अपने नजदीकी पशुचिकित्सालय के पशुचिकित्सक से सलाह लेकर ही पशुओं और कुक्कुटों को विटामिन-ए की दवाई प्रदान करें।

विटामिन-ए की विषाक्तता

सामान्यत: विटामिन-ए की विषाक्तता पशुओं में नहीं होती क्योंकि यह जिगर में जमा होता जाता है किंतु, यदि विटामिन-ए युक्त दवाइयों या फिश मील तथा मीट मील को आहार में जरुरत से अत्यधिक मात्रा में मिलाया जाए तो विटामिन-ए की विषाक्तता हो सकती है। शरीर में बहुत अधिक विटामिन-ए हानिकारक प्रभाव का कारण बनता है। गर्भ के दौरान अत्याधिक विटामिन-ए, पेट में विकसित हो रहे बच्चे को नुकसान पहुंचा सकता है। विटामिन-ए के उच्च स्तर से जन्म दोष, हड्डियों की कमजोरी, हड्डी और जोड़ों में दर्द, देखने में दिक्कत, थकावट, जिगर और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की समस्याएं हो सकती हैं।

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