पशुपालन (Animal Husbandry)

आईवीएफ तकनीक से सुधरेंगी गाय, बैल, भैंसों की नस्लें

एक गाय से साल भर में 100 भ्रूण होंगे तैयार

5 जनवरी 2022, भोपाल । आईवीएफ तकनीक से सुधरेंगी गाय, बैल, भैंसों की नस्लें – मप्र राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम द्वारा आईवीएफ लैब में एंब्रियो (भ्रूण) तैयार किए जा रहे हैं। जिसे गायों में प्रत्यारोपित कर बछड़े या बछिया पैदा किये जाएंगे, जिससे नस्लों का सुधार होगा तथा पशुपालकों को पता चल सकेगा कि बछड़ा होगा या बछिया। भोपाल की यह आईवीएफ लैब वर्ष 2019-2020 में स्थापित की गई थी।

मप्र राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम के एमडी डॉ. एच.बी.एस. भदौरिया ने बताया इस तकनीक का उपयोग करके बेहतर देसी नस्ल की गाय और बैल तैयार करना है। अभी तक यह प्रयोग गिर और साहीवाल नस्ल की गायों पर किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि यह प्रयोग राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत किया जा रहा है। इस योजना के तहत देश में 15 भ्रूण प्रत्यारोपण प्रयोगशालाओं को चिंहित किया गया है। मप्र में मदरबुल फार्म में आईवीएफ लैब तैयार की गई है। जिसमें एंब्रियो तैयार किए जा रहे हैं। श्री भदौरिया का कहना है कि यह एंब्रियो पशुपालक को वर्ष 2022 अगस्त तक जिला, ब्लाक, पंचायत स्तर पर उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके लिए पशुपालकों को कुक्कुट विकास निगम में संपर्क करना होगा।

निगम के विशेषज्ञ ने बताया कि एक गाय से सौ से अधिक भ्रूण तैयार किए जा रहे हैं। देसी नस्ल की बेहतर गाय से अंडाणु लिए हंै। जिससे एंब्रियो तैयार किए जा रहे हैं। एक बेहतर नस्ल की गाय अपने पूरे जीवन काल में केवल सात से आठ बार ही बछिया या बछड़े को जन्म देती है। वहीं इस पद्धति से एक गाय से एक साल में सौ से अधिक भ्रूण तैयार किए जाएंगे।

भ्रूण कैसे तैयार होता है

डॉ. कुशवाहा ने बताया कि दोनों की पेरेंटल हिस्ट्री देखने के बाद गाय को अंडाणु बढ़ाने के लिए हारमोन थैरेपी दी जाती। कृत्रिम गर्भाधान प्रक्रिया से गाय के अंडाणु को देसी नस्ल के सांड के सीमेन को गाय में ही निषेचित कराया जाता है। इसमें एक बार में दस से 12 अंडाणु निषेचित होते है। निषेचन के सात दिन बाद भ्रूण तैयार होने पर उन्हें फ्लशिंग तकनीक से बाहर निकाल लिया गया। इसके बाद कम उत्पादन क्षमता वाली देसी गायों में प्रत्यारोपित कर दिया गया। इस तकनीक को इन-वीवो (एमओईटी) कहते हैं। इस प्रक्रिया से अब तक 295 बछिया और बछड़े का जन्म हो चुका है। इस तरह टेस्ट-ट्यूब एनिमल का प्रयोग प्रदेश में होगा पहली बार अब आईवीएफ तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। यह अंडाणु व वीर्य का निषेचन टेस्ट ट्यूब में किया जा रहा है। इसमें सोनोग्राफी मशीन और ओवम पिकअप एसेंबली की सहायता से गाय के अंडाणु टेस्ट ट्यूब में एकत्रित किया जाता है। उसके गाय की ओवरी के तापमान में लैब में रखा जाता है। उसके बाद बेहतर नस्ल के वीर्य को अंडाणु से निषेचित कराया जाता है। इससे लैब के इंक्यूबेटर में इन्हें उचित तापमान में रखा जाता है। जिसके बाद टेस्ट ट्यूब एनिमल यानि एंब्रियो बनने की प्रोसेस शुरू हो जाती है। इस आईवीएफ तकनीक से तैयार हुए एंब्रियो कम उत्पादन क्षमता वाली गायों में प्रत्यारोपित किया जाएगा। इसके लिए प्रदेश की गौशालाओं में गायों को चिंहित किए जाने के लिए सर्वे चल रहा है। जिसमें टेस्ट ट्यूब एनिमल को प्रत्यारोपित किया जाएगा।

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बढ़ेगा दुग्ध उत्पादन

इस तकनीक का प्रयोग करने से पशुपालकों को बेहतर नस्ल के बछिया और बछड़े मिल सकेंगे। जो गाय अभी एक या दो लीटर दूध दे रही है। उसकी संतान 16 से लेकर 40 लीटर तक दूध देगी। इस तरह के प्रयोग को एक बार फिर श्वेत क्रांति के रुप में देखा जा रहा है। निगम के एमडी डॉ. भदौरिया का कहना है कि जिन पशुपालकों का अभी गाय पालना महंगा पड़ता है। इस तकनीक की वजह से पशुपालक बेहतर नस्ल की गाय से अपने यहां का दुग्ध उत्पादन बढ़ा पाएंगे। अभी तक विदेशी नस्ल की गाय ही 30 से 60 लीटर तक दूध देती थी। अब देसी नस्ल की गाय इतना ही दूध देगी।

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इस तकनीक से दुर्लभ प्रजाति भी बचेंगी

निगम के एमडी डॉ. एसबीएस भदौरिया ने बताया आईवीएफ यानि टेस्ट ट्यूब एनिमल बहुत कारगर तकनीक है। यह केवल गाय, भैंस की नस्ल सुधारने के लिए ही नहीं बल्कि लुप्त और दुर्लभ प्रजाति के वन्य प्राणियों को बचाने के लिए किया जा सकता है। उनका कहना है कि जंगली भैंसा, बारहसिंगा, पेंगोलिन सहित लुप्त हो रही प्रजाति को बचाया जा सकता है।

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