राज्य कृषि समाचार (State News)

मध्यप्रदेश में गेहूं की MSP पर खरीदी जारी, लेकिन किसान क्यों दिखा रहे बेरुखी?

29 मार्च 2025, भोपाल: मध्यप्रदेश में गेहूं की MSP पर खरीदी जारी, लेकिन किसान क्यों दिखा रहे बेरुखी? – मध्यप्रदेश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गेहूं खरीदी का सिलसिला जारी है। खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री गोविन्द सिंह राजपूत ने शुक्रवार को बताया कि अब तक राज्य के 74,697 किसानों से 5 लाख 80 हजार 711 मीट्रिक टन गेहूं खरीदा जा चुका है। इस खरीदी के बदले किसानों को अब तक 757 करोड़ 36 लाख रुपये का भुगतान भी किया गया है।

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मंत्री के मुताबिक, गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2425 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, लेकिन राज्य सरकार इसके ऊपर 175 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस दे रही है। इस तरह किसानों से गेहूं 2600 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर खरीदा जा रहा है। भुगतान की प्रक्रिया को तेज करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

जिलेवार खरीदी का आंकड़ा

गेहूं खरीदी में उज्जैन जिला सबसे आगे है, जहां 1 लाख 19 हजार 535 मीट्रिक टन गेहूं खरीदा गया। इसके बाद सीहोर (83,735 मीट्रिक टन), देवास (60,456 मीट्रिक टन), और शाजापुर (60,282 मीट्रिक टन) का नंबर आता है। वहीं, इंदौर में 42,765 और भोपाल में 38,640 मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी हुई। दूसरी ओर, सागर (22 मीट्रिक टन) और अलीराजपुर (4 मीट्रिक टन) जैसे जिलों में खरीदी की मात्रा बेहद कम रही। अन्य जिलों में भी अलग-अलग स्तर पर खरीदी दर्ज की गई, जिसमें मंदसौर (25,292 मीट्रिक टन), धार (20,564 मीट्रिक टन), और रतलाम (10,857 मीट्रिक टन) शामिल हैं।

इस साल गेहूं बिक्री के लिए अब तक 13 लाख 98 हजार किसानों ने अपना पंजीयन करवाया है। पंजीयन की आखिरी तारीख 31 मार्च 2025 है। जो किसान अभी तक पंजीयन नहीं करा पाए हैं, उनके पास अब सिर्फ तीन दिन बचे हैं।

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खुले बाजार का आकर्षण

किसानों का रुझान MSP की बजाय खुले बाजार की ओर बढ़ता दिख रहा है। किसान MSP पर गेहूं बेचने में ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहे। वजह साफ है—खुले बाजार में गेहूं की कीमत 2,800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच रही है, जो सरकारी दर से 200 रुपये ज्यादा है। इस साल अब तक 13 लाख 98 हजार किसानों ने MSP पर गेहूं बेचने के लिए पंजीयन करवाया है। पंजीयन की आखिरी तारीख 31 मार्च है। लेकिन बाजार के मौजूदा रुझान को देखते हुए यह सवाल उठ रहा है कि कितने किसान वाकई सरकारी केंद्रों पर अपनी फसल बेचने आएंगे।

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