शहडोल में जैविक खेती विषय पर प्रशिक्षण आयोजित
12 मई 2026, शहडोल: शहडोल में जैविक खेती विषय पर प्रशिक्षण आयोजित – कृषि विज्ञान केंद्र शहडोल के वरिष्ठ वैज्ञानिक सह प्रमुख डॉ. मृगेंद्र सिंह की उपस्थिति में शासकीय पंडित शम्भुनाथ शुक्ला विश्वविद्यालय, शहडोल में जैविक खेती विषय पर आधारित प्रशिक्षण आयोजित किया गया।
प्रशिक्षण में कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. मृगेंद्र सिंह ने विद्यार्थियों को अवगत कराया कि जैविक खेती की विधि रासायनिक खेती की तुलना में मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है। जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है। इसके साथ ही कृषको को आय अधिक प्राप्त होती हैै।
वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने विद्यार्थियों को जानकारी दी कि भारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थो के बीच आदान-प्रदान के चक्र को (इकोलाजी सिस्टम) प्रभावित करता है। जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है। साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है, तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है। प्राचीन काल में, मानव स्वास्थ्य के अनुकूल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी। जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरंतर चलता रहा था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। उन्होंने बताया कि जैविक खेती को इन समस्याओं के लिए बेहतर विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है।
जैविक खेती के उपयोग से किसान अथवा उत्पादक को दूरगामी लाभ प्राप्त होने के साथ-साथ इसकी उत्पादन लगत भी 20-25 प्रतिशत तक कम हो जाती है। साथ ही यह भूमि की गुणवत्ता एवं उर्वरता बढ़ाकर, भूमि में कार्बन अवशेष की मात्रा को भी बढ़ाता है। इसके द्वारा फसल की उत्पादकता एवं उत्पादन बढ़ने के साथ ही स्वास्थ फसल प्राप्त होती है। कृषक मई-जून के महीने में मिट्टी पलटने वाले हल से खेतों की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करते हैं तो किसानों को इसके अनेक लाभ प्राप्त होंगे। इस प्रकार की जुताई से मृदा का सूर्य की किरणों से सीधा उपचार होता है। इस जुताई से हानिकारक कीट व पौध रोगकारक नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है जिससे कि जड़ो की अच्छी वृद्धि होती है। ग्रीष्मकालीन जुताई के बाद खेती की लागत में कमी आती है। साथ ही उपज में लाभ औसतन 10 प्रतिशत तक बढ जाती है। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई रबी मौसम की फसल कटने के बाद शुरू हो जाती है, जो बरसात प्रारंभ होने तक चलती रहती है। गहरी जोताई का मृदा के भौतिक गुणों पर प्रभाव पड़ता है। इससे हानिकारक कीटों से बचाव तथा खरपतवार नियंत्रित होता है, साथ ही मृदा में वायु संचार में बढ़ोत्तरी होती है तथा मृदा संरक्षण में सहायक होता है।
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