राज्य कृषि समाचार (State News)

मध्यप्रदेश में धान के साथ मछली उत्पादन की तकनीक- किसानों की आय बढ़ाने हेतु सफल नवाचार

लेखक: डॉ. सर्वेश कुमार, सह प्राध्यापक, प्रसार शिक्षा विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

25 जून 2026, भोपाल: मध्यप्रदेश में धान के साथ मछली उत्पादन की तकनीक- किसानों की आय बढ़ाने हेतु सफल नवाचार – मध्यप्रदेश देश के प्रमुख कृषि राज्यों में से एक है। यहां बड़ी संख्या में किसान धान की खेती करते हैं। विशेष रूप से बालाघाट, मंडला, डिंडोरी, सिवनी, शहडोल और अनूपपुर जैसे जिलों में वर्षा अधिक होने के कारण खेतों में कई महीनों तक पानी भरा रहता है। सामान्यतः किसान इस पानी का उपयोग केवल धान उत्पादन के लिए करते हैं, जबकि इसी पानी का उपयोग करके अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है।

धान की खेती के साथ मछली पालन करने की तकनीक को धान-सह-मछली उत्पादन प्रणाली (Rice-Fish Farming System) कहा जाता है। इस प्रणाली में एक ही खेत से धान और मछली दोनों का उत्पादन लिया जाता है। इससे किसानों की आय बढ़ती है, खेत की उर्वरता सुधरती है तथा प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है।

आज मध्यप्रदेश के कई किसान इस तकनीक को अपनाकर सफलतापूर्वक अतिरिक्त लाभ प्राप्त कर रहे हैं। यदि सही तरीके से योजना बनाकर इस प्रणाली को अपनाया जाए तो किसान धान की फसल के साथ-साथ मछली उत्पादन से भी अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

धान के साथ मछली पालन क्यों करें?

धान के खेतों में बरसात के मौसम में लंबे समय तक पानी भरा रहता है। यह वातावरण मछली पालन के लिए भी उपयुक्त होता है। मछलियां खेत में मौजूद छोटे कीट, खरपतवार तथा जैविक पदार्थों को खाती हैं जिससे खेत का संतुलन बना रहता है।

धान के साथ मछली तकनीक के प्रमुख लाभ

  1. एक ही खेत से दो प्रकार का उत्पादन मिलता है।
  2. किसानों की अतिरिक्त आय होती है।
  3. मछलियों की बीट से खेत को प्राकृतिक खाद मिलती है।
  4. रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है।
  5. धान की फसल में कीट और खरपतवार कम होते हैं।
  6. खेत की मिट्टी अधिक उपजाऊ बनती है।
  7. परिवार को पौष्टिक भोजन के रूप में ताजी मछली उपलब्ध होती है।

खेत का चयन कैसे करें?

धान-सह-मछली प्रणाली की सफलता के लिए सही खेत का चयन बहुत महत्वपूर्ण है।

ऐसा खेत चुनें जहां जून से नवंबर तक कम से कम 20 से 30 सेंटीमीटर पानी रोका जा सके। मध्यप्रदेश की काली और दोमट मिट्टी वाले खेत इस तकनीक के लिए सबसे अच्छे माने जाते हैं क्योंकि इनमें पानी अधिक समय तक टिकता है।

शुरुआत छोटे क्षेत्र से करें

नए किसानों को सलाह दी जाती है कि वे पहले वर्ष केवल आधा एकड़ या एक एकड़ क्षेत्र में ही इस तकनीक की शुरुआत करें। शुरुआत में कम क्षेत्र रखने से अनुभव प्राप्त होता है और जोखिम भी कम रहता है। अनुभव बढ़ने के बाद अगले वर्षों में क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।

खेत की तैयारी

खेत की तैयारी वर्षा शुरू होने से पहले जून महीने में कर लेनी चाहिए।

1. मजबूत मेड़ का निर्माण

खेत के चारों ओर लगभग 60 सेंटीमीटर ऊंची और 50 सेंटीमीटर चौड़ी मजबूत मेड़ बनानी चाहिए।

इसका उद्देश्य है—

  • वर्षा के पानी को खेत में रोकना।
  • मछलियों को बाहर जाने से रोकना।
  • तेज बारिश में मेड़ टूटने से बचाना।

मेड़ पर घास लगाने से मिट्टी का कटाव कम होता है और मेड़ मजबूत बनी रहती है।

2. शरणस्थली (Refuge Pond) बनाना

खेत के सबसे निचले हिस्से में लगभग 10 प्रतिशत क्षेत्र में एक गहरा गड्ढा बनाना चाहिए।

एक एकड़ खेत के लिए लगभग 10 मीटर × 10 मीटर आकार तथा 1.5 मीटर गहरा गड्ढा पर्याप्त रहता है।

  • गड्ढा क्यों जरूरी है?

मध्यप्रदेश में गर्मियों के दौरान तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे समय में यदि खेत का पानी कम हो जाए तो मछलियां इस गहरे गड्ढे में सुरक्षित रह सकती हैं। यह उनके लिए आश्रय स्थल का काम करता है।

3. नालियों का निर्माण

शरणस्थली गड्ढे को पूरे खेत से जोड़ने के लिए लगभग 30 सेंटीमीटर चौड़ी तथा 25 सेंटीमीटर गहरी नालियां बनानी चाहिए।

इन नालियों के माध्यम से मछलियां पूरे खेत में घूमकर भोजन प्राप्त करती हैं।

4. जाली लगाना

जहां से पानी खेत में आता या बाहर जाता है वहां मजबूत और बारीक जाली लगानी चाहिए।

इससे—

  • सांप अंदर नहीं आएंगे।
  • मेंढक और अन्य जीव नियंत्रित रहेंगे।
  • बाहरी मछलियां खेत में प्रवेश नहीं करेंगी।
  • पालन की गई मछलियां बाहर नहीं निकलेंगी।

धान की उपयुक्त किस्मों का चयन

धान की ऐसी किस्मों का चयन करना चाहिए जिनमें रासायनिक दवाओं की आवश्यकता कम पड़े और जिनकी अवधि लगभग 140 से 150 दिन हो।

  • बालाघाट और सिवनी क्षेत्र के लिए
  • पूसा बासमती-1
  • सुगंधा
  • शहडोल और डिंडोरी क्षेत्र के लिए
  • महामाया
  • MTU-1010
  • मध्यप्रदेश में विकसित किस्में
  • JR-201
  • JR-503

इन किस्मों का विकास जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर द्वारा किया गया है।

धान की रोपाई कैसे करें?

धान की रोपाई लगभग 20 × 15 सेंटीमीटर दूरी पर करनी चाहिए।

बहुत घनी रोपाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि इससे मछलियों को खेत में घूमने और भोजन खोजने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता।

मछली किस्मसंख्याइन प्रजातियों के लाभ
कॉमन कार्प2500गर्मी सहती है, खेत खोदकर उपजाऊ बनाती है
रोहू1500मध्य प्रदेश की स्थानीय मांग, 150 रुपये प्रति किलो बिकती है l
मृगल*1000तालाब की गंदगी खाती है l
ग्रास कार्प300धान का खरपतवार-मोथा खा जाती है l
कतला500ऊपर का शैवाल खाती है l

मांगुर, पंगास, तिलापिया मछलियों से बचें क्योंकि ये प्रजातियां धान की फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं। मांगुर का पालन कई स्थानों पर प्रतिबंधित भी है।

मछली बीज कब छोड़ें?

धान की रोपाई के लगभग 15 दिन बाद, जब पौधे लगभग 6 इंच ऊंचे हो जाएं, तब मछली बीज छोड़ना चाहिए। मध्यप्रदेश में जुलाई का पहला सप्ताह सबसे उपयुक्त माना जाता है।

बीज कहाँ मिलेगा: मध्य प्रदेश मत्स्य विभाग की हैचरी – पवारखेड़ा होशंगाबाद, गंजबासौदा विदिशा, जबलपुरl

खाद और दवा प्रबंधन

धान-सह-मछली प्रणाली में रसायनों का उपयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए।

 5.1. उर्वरक प्रबंधन: मछलियों की बीट से खेत को प्राकृतिक नाइट्रोजन मिलती है। इसलिए यूरिया की मात्रा लगभग 50 प्रतिशत तक कम की जा सकती है।

5.2. कीट नियंत्रण

रासायनिक कीटनाशकों की जगह जैविक उपाय अपनाएं—

  • नीम तेल
  • करंज तेल
  • ट्राइकोडर्मा

कीटनाशकों का छिड़काव कैसे करें?

  • शाम 4 बजे के बाद छिड़काव करें।
  • छिड़काव से पहले मछलियों को गड्ढे की ओर जाने दें।
  • दो दिन बाद मछलियां फिर पूरे खेत में फैल जाएंगी।

इन दवाओं का उपयोग न करें: कार्बोफ्यूरान, फोरेटइनके प्रयोग से मछलियां मर सकती हैं।

खरपतवार नियंत्रण

खरपतवारनाशकों का उपयोग न करें। ग्रास कार्प मछलियां अधिकांश खरपतवार खाकर उनका नियंत्रण कर देती हैं।

मछलियों को भोजन कैसे दें?

धान के खेत में मछलियों को लगभग 70 प्रतिशत भोजन प्राकृतिक रूप से मिल जाता है। फिर भी अच्छी वृद्धि के लिए अतिरिक्त आहार देना चाहिए।

  • आहार मिश्रण
  • चावल की भूसी – 50 प्रतिशत
  • सरसों की खली – 40 प्रतिशत
  • मक्का दाना – 10 प्रतिशत

इसे अच्छी तरह मिलाकर प्रतिदिन शाम को डालें।

भोजन की मात्रा

मछलियों के कुल वजन का लगभग 2 प्रतिशत प्रतिदिन। उदाहरण के लिए यदि मछलियों का कुल वजन 100 किलोग्राम है तो प्रतिदिन 2 किलोग्राम आहार देना पर्याप्त होगा।

पानी का प्रबंधन

  • जुलाई से अक्टूबर: खेत में 20 से 25 सेंटीमीटर पानी बनाए रखें।
  • धान कटाई से पहले कटाई से लगभग 20 दिन पहले धीरे-धीरे पानी निकालना शुरू करें। इससे अधिकांश मछलियां शरणस्थली गड्ढे में एकत्र हो जाएंगी।
  • सूखे की स्थिति में यदि वर्षा कम हो जाए तो बोरवेल या नलकूप से शरणस्थली में पानी भरते रहें ताकि मछलियां सुरक्षित रहें।

कटाई और संभावित आय

नवंबर महीने में पहले धान की कटाई करें। इसके बाद शरणस्थली गड्ढे में जाल लगाकर मछलियों को पकड़ें।

संभावित उत्पादन: एक एकड़ क्षेत्र से 4-5 क्विंटल मछली उत्पादन और  लगभग 50,000-60,000 रुपये या उससे अधिक अतिरिक्त लाभ की प्राप्ति कर सकते हैं l

अतिरिक्त लाभ: मछलियों द्वारा कीट और खरपतवार नियंत्रण होने से धान की उपज में लगभग 10 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है।

सरकारी सहायता और प्रशिक्षण

मध्यप्रदेश सरकार तथा भारत सरकार किसानों को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सहायता प्रदान करती हैं।

सब्सिडी: प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना तथा राज्य मत्स्य विभाग के माध्यम से—

  • लगभग 40 प्रतिशत तक अनुदान
  • गड्ढा खुदाई, बीज, जाल पर 24,000 रु तक सहायता उपलब्ध हो सकती है।

प्रशिक्षण: कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा निःशुल्क प्रशिक्षण आयोजित किए जाते हैं।

बालाघाट, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, मंडला तथा अन्य जिलों में नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित होते हैं। आवेदन: mpfisheries.mp.gov.in पर या जिला मत्स्य अधिकारी ऑफिस में आवेदन कर सकते हैं

किसानों के लिए महत्वपूर्ण सावधानियाl

उथला गड्ढा बनाना: यदि शरणस्थली पर्याप्त गहरी नहीं होगी तो गर्मी में मछलियों की मृत्यु हो सकती है।

आवश्यकता से अधिक बीज डालना: अधिक संख्या में मछलियां छोड़ने से भोजन और स्थान की कमी हो जाती है, जिससे उनका विकास रुक जाता है।

जहरीली दवाओं का प्रयोग: फोरेट और अन्य जहरीले रसायन मछलियों के लिए घातक होते हैं।

नए किसानों के लिए सलाह: यदि आप पहली बार धान के साथ मछली पालन शुरू कर रहे हैं तो आधा एकड़ क्षेत्र में केवल रोहू और कॉमन कार्प के लगभग 2000 बीजों से शुरुआत करें। एक वर्ष का अनुभव प्राप्त करने के बाद अगले वर्ष पूर्ण धान-सह-मछली प्रणाली अपनाएं।

धान के साथ मछली पालन मध्यप्रदेश के किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक प्रभावी और टिकाऊ विकल्प है। जिन क्षेत्रों में वर्षा के कारण लंबे समय तक पानी उपलब्ध रहता है, वहां यह तकनीक विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध हो सकती है। उचित खेत चयन, मजबूत मेड़, शरणस्थली गड्ढा, सही मछली प्रजातियों का चयन और रसायनों का सीमित उपयोग इस तकनीक की सफलता की कुंजी है। यदि किसान वैज्ञानिक सलाह और सरकारी प्रशिक्षण के साथ इस प्रणाली को अपनाएं, तो वे एक ही खेत से धान और मछली दोनों का उत्पादन लेकर अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं तथा खेती को अधिक लाभकारी बना सकते हैं।

(लेखक अस्वीकरण, Author Disclaimer): इस लेख में सम्मलित जानकारी आज के दौर के विभिन्न नवीन सूचना और संचार माध्यमों से सामाजिक हित में कृषकों की जागरूकता एवं समझ के लिए संकलित कर प्रस्तुत की गयी है l लेखक इस जानकारी पर अपना कोई अधिकार नहीं रखता है, अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केन्द्र एवं अन्य कृषि शोध, शिक्षण, विस्तार संस्थानों में संपर्क कर सकते हैंl)

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