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राज्य कृषि समाचार (State News)

गेहूं-बाजरे से किनारा कर गेंदा फूल अपनाया, अब एक बीघा से हो रही 70-80 हजार की कमाई

13 अक्टूबर 2026, मुरैना: गेहूं-बाजरे से किनारा कर गेंदा फूल अपनाया, अब एक बीघा से हो रही 70-80 हजार की कमाई – मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के किसान बनवारी लाल कुशवाह ने गेहूं-बाजरे की परंपरागत खेती छोड़कर गेंदा फूल की खेती शुरू की और अब एक बीघा से 70 से 80 हजार रुपए तक की आमदनी ले रहे हैं। जौरा तहसील के कांसपुरा गुड आसान गांव के रहने वाले 55 वर्षीय बनवारी लाल ने करीब पांच साल पहले सिर्फ 10 बिस्वा जमीन से इसकी शुरुआत की थी।

शुरुआती सफलता के बाद अगले साल उन्होंने एक बीघा में गेंदा लगाया, और अब अलग-अलग मौकों पर दो से पांच बीघा तक गेंदे की खेती करते हैं।

एक ही खेत से फूल और गेहूं दोनों

बनवारी लाल के मुताबिक जुलाई में गेंदे के पौधे लगाए जाते हैं और अक्टूबर से दिसंबर तक फूल आते रहते हैं। फूलों का सीजन खत्म होने के बाद उसी खेत में गेहूं बोया जाता है, जिससे एक ही जमीन से नकदी फसल और अनाज दोनों मिल जाते हैं।

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उनका कहना है, “एक बीघा से करीब 70 से 80 हजार रुपए की आमदनी हुई।” एक बीघा पर खेती की लागत लगभग 25 हजार रुपए आती है, यानी शुद्ध मुनाफा करीब 55 हजार रुपए बैठता है। मानसून के दौरान सिंचाई की जरूरत कम रहती है, जबकि अक्टूबर-नवंबर में करीब 15 दिन के अंतराल पर पानी देना पड़ता है।

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ग्वालियर और आगरा तक जाते हैं फूल

बनवारी लाल के फूल मुरैना के साथ ग्वालियर और आगरा की मंडियों में भी बिकते हैं, जहां भाव करीब 60 रुपए प्रति किलो तक मिल जाता है। उद्यानिकी विभाग से मिली जानकारी और प्रेरणा के बाद उन्होंने गेंदे की खेती को धीरे-धीरे बढ़ाया।

लेख के मुताबिक गेहूं और बाजरे के मुकाबले गेंदे से होने वाली आमदनी दोगुने से भी ज्यादा रही है। चंबल क्षेत्र में परंपरागत रूप से गेहूं और बाजरे की ही खेती होती रही है, इसलिए बनवारी लाल जैसे किसानों के प्रयोग आसपास के गांवों के लिए भी एक उदाहरण बन रहे हैं। मुरैना जिले में, खासकर जौरा तहसील के आसपास के गांवों में, फूलों की खेती अभी सीमित इलाकों में ही हो रही है, लेकिन नकदी फसल के तौर पर इसकी मांग और भाव को देखते हुए कुछ और किसान भी धीरे-धीरे इस तरफ रुख कर रहे हैं।

स्थानीय बाजार के अलावा त्योहारी सीजन में गेंदे के फूलों की मांग और बढ़ जाती है, जिसका सीधा फायदा किसानों को मिलता है। बनवारी लाल आसपास के किसानों को भी गेंदे की खेती के बारे में जानकारी देते रहते हैं।

गेंदे के फूलों की सबसे ज्यादा मांग नवरात्रि, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों के दौरान रहती है, और बनवारी लाल की फसल ठीक इसी समय, यानी अक्टूबर से दिसंबर तक तैयार होकर बाजार में पहुंचती है। इस वजह से उन्हें साल के बाकी समय के मुकाबले इन महीनों में बेहतर दाम मिल जाता है।

बनवारी लाल के मुताबिक एक बार पौधा लगने के बाद फूल कई हफ्तों तक लगातार मिलते रहते हैं, जिससे एक ही फसल से बार-बार कटाई और बिक्री का मौका मिलता है। मुरैना का इलाका ज्यादातर बलुई-दोमट मिट्टी वाला है, जो फूलों की खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है, बशर्ते समय पर सिंचाई और खाद का इंतजाम हो।

फूल की खेती से एक और फायदा यह होता है कि इसमें मेहनत तो ज्यादा लगती है, लेकिन कीट-रोग की समस्या अनाज की फसलों के मुकाबले अपेक्षाकृत कम होती है। बनवारी लाल कहते हैं कि अगर किसान अपने खेत के एक हिस्से में भी नकदी फसल की तरह गेंदा लगाना शुरू करें, तो पारंपरिक गेहूं-बाजरे से होने वाली सीमित आमदनी के मुकाबले उनकी कुल सालाना कमाई में अच्छा इजाफा हो सकता है।

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