दक्षिण राजस्थान कन्द फसलों के लिए महत्वपूर्ण : डॉ. कर्नाटक

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01 फरवरी 2023, उदयपुर: दक्षिण राजस्थान कन्द फसलों के लिए महत्वपूर्ण : डॉ. कर्नाटक – महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अनुसंधान निदेशालय के अन्तर्गत अखिल भारतीय कन्द फसल अनुसंधान परियोजना द्वारा एक दिवसीय कन्द फसलों पर कृषक प्रशिक्षण एवं आदान वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मेवाड़ के जनजाति क्षेत्र के किसानों एवं विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने भाग लिया।

कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि डाॅ. अजीत कुमार कर्नाटक, कुलपति, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने कहा कि स्वास्थ्य की दृष्टि से कन्द फसलों का उपयोग भोजन में बढ रहा है क्योंकि इनमें फाइबर, पोटेशियम तथा विटामिन ज्यादा होते है। अतः प्रत्येक किसान वर्ष भर में कम से कम एक बीघा में रतालू, जमीकन्द, शकरकन्द, अरवी, हल्दी आदि की खेती कर आय 25 से 50 हजार रूपये तक बढा सकते हैं। दक्षिण राजस्थान के सभी जिले कन्द फसलों की खेती के अनुकूल है। इन फसलों का राजस्थान में क्षैत्रफल बढाना समय की आवश्यकता है।

दक्षिण राजस्थान कन्द फसलों के लिए महत्वपूर्ण : डॉ. कर्नाटक

उद्घाटन समारोह के विशिष्ट अतिथि डॉ. बीजू गंगाधरन, निदेशक, केन्द्रीय कन्द वर्गीय अनुसंधान संस्थान, तिरुवनन्तपुरम, केरल ने बताया कि देश में 21 केन्द्रों पर कन्द फसलों पर अनुसंधान कार्य चल रहे हैं उनमें उदयपुर राजस्थान के लिए इन फसलों पर महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि कन्द फसलों (रतालू, जमीकन्द, शकरकन्द, अरती, हल्दी) की 68 नई किस्में इस संस्थान द्वारा विकसित की गई है जिनका इस कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किसानों तक पहुँचाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के तहत चावल, मक्का तथा गेहूँ की उपज छटने के अनुमान है लेकिन रतालू, शकरकन्द तथा अरवी के तहत क्षैत्रफल बढाकर किसान बदलते मौसम में अधिक आय प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने किसानों को कन्द फसलों का प्रसंस्करण से जोड़कर उद्यमिता के क्षैत्र में आगे बढने की आवश्यकता है। उन्होंने कन्द फसलों के गुणवत्तापूर्ण बीजों को अपनाने पर जोर दिया तथा विश्वविद्यालय के साथ समझौता पत्र तैयार कर नई कार्य करने पर बल दिया जिसके तहत स्टार्च तथा अल्कोहल उत्पादन तकनीकों को आगे बढाये जायेगा।

डाॅ. एस. के. शर्मा, निदेशक अनुसंधान ने बताया कि राजस्थान में कन्द फसलों में लगभग 20,000 हैक्टेयर है। लेकिन आलू के अलावा रतालू, जमीकन्द, अरवी तथा शकरकन्द के तहत क्षैत्रफल 5,000 हैक्टेयर से कम है जिसे दुगुना करने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि डंूगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, राजसमन्द तथा हाडौती क्षैत्र में इन फसलों के उत्पादन की अच्छी सम्भावनाएं है।

डाॅ. वीरेन्द्र सिंह, परियोजना प्रभारी ने बताया कि प्रशिक्षण में सभी उपस्थित किसानों को मुख्य अतिथि द्वारा विभिन्न आदानों का भी वितरण किया गया एवं अतिथियों द्वारा कन्द फसलों पर आयोजित प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया गया।

कार्यक्रम के अन्त में डाॅ. अरविन्द वर्मा, क्षेत्रीय निदेशक अनुसंधान ने धन्यवाद ज्ञापित किया।  डाॅ. शालिनी पिलानिया, सहायक प्रोफेसर ने कार्यक्रम का संचालन किया।

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