कपास में गुलाबी सुंडी व तना छेदक का खतरा, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने जारी की दवा और मात्रा सहित सलाह
19 अक्टूबर 2026, कोयंबटूर (तमिलनाडु): कपास में गुलाबी सुंडी व तना छेदक का खतरा, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने जारी की दवा और मात्रा सहित सलाह – कपास की फसल में बोंड बनने की अवस्था के दौरान गुलाबी सुंडी, तना छेदक और मिलीबग जैसे कीटों का खतरा बढ़ जाता है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने अक्टूबर महीने के लिए जारी अपनी ताज़ा कीट-रोग पूर्वानुमान सलाह में कपास किसानों को इन कीटों से बचाव के लिए दवा के नाम और मात्रा सहित विस्तृत उपाय सुझाए हैं।
विश्वविद्यालय की सलाह के अनुसार कपास में तना बग्घा (स्टेम वीविल) से बचाव के लिए सबसे पहले बीज को क्लोरपायरीफॉस 20 प्रतिशत ईसी की 10 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज की मात्रा से उपचारित करना चाहिए। इसके बाद बुवाई के 15 और 30 दिन बाद पौधे के कॉलर क्षेत्र में क्लोरपायरीफॉस 50 प्रतिशत ईसी का 1,200 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने की सलाह दी गई है।
गुलाबी सुंडी के लिए तीन विकल्प
फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली गुलाबी सुंडी के नियंत्रण के लिए विश्वविद्यालय ने तीन कीटनाशकों में से किसी एक को चुनने की सलाह दी है। इनमें एमामेक्टिन बेंजोएट 5 प्रतिशत एसजी की 190 ग्राम प्रति हेक्टेयर, डिफ्लुबेंजुरॉन 25 प्रतिशत डब्ल्यूपी की 300 ग्राम प्रति हेक्टेयर अथवा थायोडिकार्ब 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी की 1,000 ग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा शामिल है।
मिलीबग के प्रकोप पर नियंत्रण के लिए फिश ऑयल रोसिन सोप का 25 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल से छिड़काव करने या प्रोफेनोफॉस का 2,000 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। विश्वविद्यालय ने किसानों को सचेत किया है कि फूल और बोंड बनने की अवस्था में लगातार खेत का निरीक्षण करते रहें, ताकि कीट प्रकोप की शुरुआती पहचान हो सके।
जड़ सड़न से बचाव के उपाय भी शामिल
कीटों के अलावा सलाह में जड़ सड़न रोग से बचाव के उपाय भी दिए गए हैं। संक्रमित पौधों के पास कार्बेंडाजिम का 1 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल से स्पॉट ड्रेंचिंग करने की सलाह दी गई है। इसके विकल्प के रूप में ट्राइकोडर्मा या बैसिलस सबटिलिस जैसे जैविक कारकों को 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 500 किलोग्राम गोबर की खाद के साथ मिलाकर खेत में डालने की भी सिफारिश की गई है।
विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि किसी भी कीटनाशक का छिड़काव करने से पहले खेत में कीट या रोग की वास्तविक स्थिति का आकलन जरूरी है, क्योंकि जरूरत से ज्यादा या बिना जरूरत छिड़काव से न सिर्फ लागत बढ़ती है, बल्कि मित्र कीटों को भी नुकसान पहुंच सकता है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क करके ही किसी दवा का प्रयोग करें, ताकि मात्रा और समय दोनों सही रहें।
गुलाबी सुंडी को देश के कपास उत्पादक इलाकों में पिछले कुछ वर्षों से सबसे बड़ी चुनौती माना जाता रहा है, क्योंकि यह कीट बोंड के भीतर छिपकर रहता है और ऊपर से छिड़काव करने पर भी पूरी तरह नियंत्रित नहीं होता। इसी वजह से विश्वविद्यालय ने बार-बार एक ही कीटनाशक का इस्तेमाल करने से बचने और जरूरत पड़ने पर अलग-अलग समूह के कीटनाशकों को बदल-बदल कर प्रयोग करने की सलाह दी है, ताकि कीट में दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित न हो सके।
कीटनाशकों के साथ-साथ विश्वविद्यालय ने गैर-रासायनिक उपायों पर भी जोर दिया है। खेत में फेरोमोन ट्रैप लगाकर गुलाबी सुंडी के पतंगों की मौजूदगी पर निगरानी रखने की सलाह दी गई है, जिससे किसान समय रहते कीट के बढ़ते प्रकोप की पहचान कर सकें। इसके अलावा संक्रमित बोंड और पौधों के अवशेषों को खेत से हटाकर नष्ट करने की सलाह भी दी गई है, क्योंकि गुलाबी सुंडी अक्सर पुराने अवशेषों में ही छिपकर आगे की फसल तक पहुंचती है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार कपास की कटाई पूरी होने के बाद खेत को जल्द साफ करना और बचे हुए डंठल व बोंड के अवशेषों को नष्ट करना अगले सीजन में गुलाबी सुंडी के प्रकोप को कम करने में काफी मदद करता है।
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