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राज्य कृषि समाचार (State News)

असम के किसान ने पुराने प्रेशर कुकर से बना दी चाय प्रसंस्करण मशीन, 25 साल के अनुभव से निकला नया रास्ता

19 अक्टूबर 2026, छोइबारी (धुबरी, असम): असम के किसान ने पुराने प्रेशर कुकर से बना दी चाय प्रसंस्करण मशीन, 25 साल के अनुभव से निकला नया रास्ता – असम के धुबरी जिले के हिंदूपारा क्षेत्र स्थित छोइबारी गांव के 51 वर्षीय किसान रतन राय ने अपने घर में रखे पुराने प्रेशर कुकर और मिक्सर-ग्राइंडर को जोड़कर एक छोटी चाय प्रसंस्करण मशीन तैयार कर दी है। चाय की खेती में 25 साल का अनुभव रखने वाले रतन राय का यह नवाचार अब कृषि विज्ञान केंद्र, धुबरी के दस्तावेजीकरण का हिस्सा बन चुका है।

रतन राय ने पुराने प्रेशर कुकर के भीतर पारंपरिक चाय-प्रसंस्करण उपकरणों जैसे धातु के ब्लेड लगाए और उसे मिक्सर-ग्राइंडर की मोटर से जोड़ दिया। इस जुगाड़ से पत्तियों को कुचलने, फाड़ने और छोटे-छोटे पेलेट में मोड़ने का काम हो जाता है, यानी सीटीसी विधि के मुख्य चरण इस छोटी मशीन से ही दोहराए जा सकते हैं।

मैनुअल रोलिंग पर घटी निर्भरता

पारंपरिक रूप से छोटे चाय किसान हाथ से पत्तियों को रोल करते हैं, जिसमें काफी समय और मेहनत लगती है। रतन राय की इस जुगाड़ू मशीन से यह निर्भरता काफी हद तक घट जाती है और प्रसंस्करण की प्रक्रिया पहले से तेज हो जाती है। कृषि विज्ञान केंद्र के अनुसार इस तरीके से तैयार चाय का स्वाद भी पहले से अधिक तीव्र बताया गया है।

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कृषि वैज्ञानिकों ने इस जुगाड़ को “संभावित रूप से किफायती” विकल्प बताया है, क्योंकि इसमें महंगी मशीनरी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि अभी इस तरीके से होने वाली लागत बचत या आय वृद्धि को लेकर कोई ठोस आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है, और इसका मूल्यांकन अभी जारी है।

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छोटे किसानों के लिए बन सकता है उम्मीद की किरण

धुबरी जिले के कृषि विज्ञान केंद्र ने इस नवाचार के दस्तावेजीकरण और प्रसार में सहयोग किया है, ताकि क्षेत्र के अन्य छोटे चाय किसान भी इससे प्रेरणा ले सकें। असम में बड़ी संख्या में छोटे व सीमांत चाय किसान हैं, जिनके लिए महंगी प्रसंस्करण मशीनरी खरीदना आसान नहीं होता और उन्हें अक्सर अपनी हरी पत्तियां बड़े बागानों या फैक्ट्रियों को कम दाम पर बेचनी पड़ती हैं।

ऐसे में रतन राय जैसा घरेलू जुगाड़ छोटे किसानों को अपने स्तर पर ही पत्तियों का प्रसंस्करण करने और बेहतर दाम पाने का एक रास्ता दिखा सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र के अधिकारियों के अनुसार इस तरह के स्थानीय नवाचारों को आगे वैज्ञानिक रूप से परखकर बेहतर बनाया जा सकता है, जिससे इन्हें बड़े स्तर पर अन्य किसानों तक पहुंचाया जा सके।

रतन राय का यह अनुभव इस बात का उदाहरण है कि खेती में बरसों का अनुभव रखने वाले किसान अक्सर अपनी जरूरतों के हिसाब से ऐसे व्यावहारिक समाधान खुद ढूंढ लेते हैं, जिन्हें वैज्ञानिक सहयोग मिलने पर दूसरे किसानों के लिए भी उपयोगी बनाया जा सकता है।

धुबरी जिला ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसा इलाका है, जहां चाय बागानों के साथ-साथ बड़ी संख्या में छोटे व सीमांत चाय उत्पादक भी सक्रिय हैं। इन किसानों के पास आमतौर पर बहुत छोटे आकार के बगीचे होते हैं, जिनसे मिलने वाली हरी पत्तियों की मात्रा इतनी नहीं होती कि वे बड़ी प्रसंस्करण मशीन में निवेश कर सकें।

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह एक घरेलू स्तर का प्रयोग है, जिसे अभी तक बड़े पैमाने पर प्रमाणित नहीं किया गया है। इसलिए इसे पूरी तरह व्यावसायिक प्रसंस्करण मशीन का विकल्प मानने से पहले इसकी क्षमता, स्वच्छता मानकों और टिकाऊपन का और अधिक परीक्षण जरूरी है।

फिर भी वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के स्थानीय नवाचार कृषि विज्ञान केंद्रों के लिए एक दिशा दिखाते हैं, जिस पर आगे शोध करके छोटे चाय किसानों के लिए कम लागत वाली, भरोसेमंद प्रसंस्करण तकनीक विकसित की जा सकती है। इसे देखते हुए केंद्र ने रतन राय के इस नवाचार को आगे के अध्ययन के लिए दर्ज कर लिया है।

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