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राज्य कृषि समाचार (State News)

कुफरी हिमालिनी किस्म से त्रिपुरा के किसान की बदली तकदीर, मुनाफा हुआ लगभग दोगुना

19 अक्टूबर 2026, लंकामुरा (पश्चिम त्रिपुरा): कुफरी हिमालिनी किस्म से त्रिपुरा के किसान की बदली तकदीर, मुनाफा हुआ लगभग दोगुना – पश्चिम त्रिपुरा जिले के बमुटिया ब्लॉक स्थित लंकामुरा गांव के 55 वर्षीय सब्जी उत्पादक अमरचंद सरकार ने आलू की एक उन्नत किस्म अपनाकर अपनी छोटी सी जमीन से होने वाली आमदनी को लगभग दोगुना कर लिया है। वह सालों से करीब 0.08 हेक्टेयर जमीन पर कुफरी ज्योति और स्थानीय बेबी पोटैटो किस्मों की खेती करते आ रहे थे।

पुरानी किस्मों से उन्हें औसतन 173 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता था। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पश्चिम त्रिपुरा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के संपर्क में आने के बाद उन्हें कुफरी हिमालिनी किस्म के बारे में जानकारी मिली और इसकी गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री उपलब्ध कराई गई।

उत्पादन में साढ़े 44 फीसदी का इजाफा

अनुशंसित खेती पद्धतियों के साथ कुफरी हिमालिनी किस्म अपनाने के बाद अमरचंद सरकार के खेत में उत्पादन बढ़कर 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया। यह पुराने उत्पादन की तुलना में 77 क्विंटल प्रति हेक्टेयर यानी लगभग 44.5 प्रतिशत ज्यादा है। इस बदलाव ने उनकी आमदनी की पूरी गणना बदल दी।

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आंकड़ों के अनुसार इस किस्म की खेती पर लागत लगभग 1 लाख 14 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर आई, जबकि सकल प्रतिफल 3 लाख 75 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर रहा। इस तरह उनका शुद्ध प्रतिफल 2 लाख 61 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गया। विशेषज्ञों के अनुसार इस खेती का लाभ-लागत अनुपात 2.28 है, यानी हर एक रुपये के निवेश पर उन्हें करीब सवा दो रुपये का प्रतिफल मिला।

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कई संस्थानों की मिली मदद

अमरचंद सरकार की इस सफलता में एक नहीं, बल्कि कई कृषि अनुसंधान संस्थानों की भूमिका रही। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पश्चिम त्रिपुरा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र ने उन्हें नई किस्म अपनाने का अवसर और प्रारंभिक परिचय दिया। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के पूर्वोत्तर हिल घटक और केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के पूर्वोत्तर हिल घटक ने उन्हें गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री उपलब्ध कराई।

इसके अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वोत्तर क्षेत्र स्थित त्रिपुरा केंद्र ने उन्हें खेती की पूरी प्रक्रिया में तकनीकी मार्गदर्शन दिया, जबकि उमियाम स्थित कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान ने प्रसार सहायता प्रदान की। इस तरह कई संस्थानों के समन्वित प्रयास से एक सीमांत किसान की छोटी सी जमीन पर बड़ा बदलाव संभव हो सका।

पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी व पठारी इलाकों में ज्यादातर किसान अभी भी परंपरागत आलू किस्मों पर निर्भर हैं, जिनकी उत्पादन क्षमता सीमित है। अमरचंद सरकार का यह अनुभव इस बात का उदाहरण है कि सही तकनीकी सहयोग और गुणवत्तापूर्ण बीज मिलने पर बहुत छोटी जोत पर भी किसान अपनी आमदनी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर सकते हैं।

लंकामुरा और आसपास के गांवों में ज्यादातर किसान सब्जी की खेती पर ही अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं, और आलू उनकी प्रमुख नकदी फसलों में से एक है। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के अनुसार कुफरी हिमालिनी किस्म की गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री खास तौर पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वोत्तर हिल क्षेत्र घटकों के माध्यम से ही उपलब्ध कराई गई, जो इस बात का संकेत है कि इस किस्म को पूर्वोत्तर क्षेत्र के किसानों के लिए प्राथमिकता के साथ बढ़ावा दिया जा रहा है।

अमरचंद सरकार के खेत में मिले नतीजों के बाद कृषि विज्ञान केंद्र अब आसपास के अन्य किसानों के बीच भी इस किस्म और उससे जुड़ी अनुशंसित खेती पद्धतियों की जानकारी फैलाने की योजना बना रहा है। इसके लिए खेत पर प्रदर्शन दिवस आयोजित करने पर भी विचार किया जा रहा है, जिससे पड़ोसी गांवों के किसान खुद खेत पर जाकर नतीजे देख सकें और अपनी शंकाओं का समाधान कर सकें।

विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह की सफलता की कहानियां इस बात का भी संकेत देती हैं कि पूर्वोत्तर राज्यों में आलू उत्पादन बढ़ाने के लिए सिर्फ नई किस्म देना काफी नहीं है, बल्कि किसानों को बुवाई के समय, खाद-पानी के प्रबंधन और रोग नियंत्रण से जुड़ी पूरी तकनीकी जानकारी भी साथ में देनी जरूरी है।

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