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राज्य कृषि समाचार (State News)

अमरूद के बाग में मिलीबग और फल मक्खी का प्रकोप, जैविक तरीके से भी हो सकता है नियंत्रण

19 अक्टूबर 2026, कोयंबटूर: अमरूद के बाग में मिलीबग और फल मक्खी का प्रकोप, जैविक तरीके से भी हो सकता है नियंत्रण – अमरूद के बागों में इस समय मिलीबग, फल मक्खी और सूत्रकृमि का प्रकोप किसानों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय यानी टीएनएयू ने अक्टूबर माह की कीट-रोग सलाह में इन तीनों समस्याओं से निपटने के जैविक और रासायनिक दोनों तरीके बताए हैं, जिससे किसान अपनी जरूरत के मुताबिक सही तरीका चुन सकें।

मिलीबग अमरूद के पौधे का रस चूसकर उसे कमजोर कर देता है, जिससे फल का आकार और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं। संक्रमित पेड़ों की पत्तियां और तना सफेद पाउडर जैसी परत से ढक जाते हैं, जिससे पहचान आसान हो जाती है। विश्वविद्यालय के मुताबिक इस कीट के प्राकृतिक दुश्मन क्रिप्टोलेमस नाम के भृंग को बाग में छोड़ा जा सकता है। एक पेड़ पर करीब 10 क्रिप्टोलेमस भृंग छोड़ने से मिलीबग की संख्या में अपने आप कमी आने लगती है, और इसके लिए किसी रासायनिक दवा की जरूरत नहीं पड़ती।

फल मक्खी और सूत्रकृमि से बचाव

फल मक्खी अमरूद के पकने वाले फलों में अंडे देकर उन्हें भीतर से खराब कर देती है, जिससे बाजार में बिकने लायक फलों की संख्या घट जाती है और किसान को आर्थिक नुकसान होता है। इसके नियंत्रण के लिए मिथाइल यूजेनॉल 0.1 प्रतिशत के साथ मैलाथियान 50 ईसी एक मिलीलीटर प्रति लीटर के घोल का इस्तेमाल सुबह 6 से 8 बजे के बीच करने की सलाह दी गई है, क्योंकि इस समय फल मक्खी सबसे ज्यादा सक्रिय रहती है। इसके साथ प्रति हेक्टेयर 10 मिथाइल यूजेनॉल ट्रैप लगाने और 3 प्रतिशत नीम तेल के छिड़काव से भी फल मक्खी पर नियंत्रण में मदद मिलती है।

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अमरूद के बागों में एक और बड़ी समस्या जड़ में लगने वाला सूत्रकृमि यानी मेलॉइडोगाइन एंटरोलोबी है, जो जड़ों में गांठ बनाकर पौधे की बढ़वार रोक देता है। संक्रमित पौधे धीरे-धीरे कमजोर पड़ते जाते हैं और फलन भी घट जाता है। इससे बचाव के लिए हर दूसरे महीने प्रति पेड़ 500 ग्राम जैव-एजेंट युक्त गोबर की खाद देने की सलाह है।

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गंभीर प्रकोप की स्थिति में पोकोनिया क्लैमाइडोस्पोरिया नाम के जैव-नियंत्रक का 30 मिलीलीटर प्रति पेड़ की दर से जड़ों में ड्रेंचिंग किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर इसे 30 दिन के अंतराल पर तीन बार दोहराया जा सकता है, जिससे सूत्रकृमि की संख्या धीरे-धीरे नियंत्रण में आ जाती है।

विश्वविद्यालय का कहना है कि मिलीबग और फल मक्खी के नियंत्रण में जैविक तरीकों को प्राथमिकता देने से अमरूद के बाग में फायदेमंद कीटों की संख्या बनी रहती है, जो आगे भी कीट प्रबंधन में मदद करते हैं। किसानों को सलाह दी गई है कि संक्रमित और गिरे हुए फलों को बाग से तुरंत हटाकर नष्ट कर दें, ताकि फल मक्खी का प्रकोप आगे न बढ़े और आसपास के स्वस्थ पेड़ों तक न पहुंचे।

अक्टूबर-नवंबर का समय अमरूद की मुख्य फसल के पकने का मौसम माना जाता है, इसलिए इस दौरान फल मक्खी और मिलीबग का प्रकोप किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक जो बाग पहले से साफ-सफाई और छंटाई पर ध्यान देते हैं, वहां इन कीटों का प्रकोप तुलनात्मक रूप से कम देखा जाता है।

विश्वविद्यालय ने यह भी सलाह दी है कि रासायनिक दवाओं का छिड़काव फल तोड़ने से पर्याप्त समय पहले बंद कर देना चाहिए, ताकि फल में दवा का कोई अंश न रह जाए। इससे फल की बाजार में बिक्री और गुणवत्ता दोनों सुरक्षित रहती हैं।

बागों में नियमित निगरानी को भी नियंत्रण का सबसे सस्ता तरीका बताया गया है। जो किसान हफ्ते में एक-दो बार अपने बाग का निरीक्षण करते हैं, वे मिलीबग और फल मक्खी के शुरुआती लक्षण समय रहते पहचान लेते हैं, जिससे बाद में बड़े पैमाने पर छिड़काव की जरूरत कम पड़ती है और लागत भी बचती है।

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