मुंबई की नौकरी छोड़ लौटे गांव, अब रंगीन गोभी और काले धान से बना रहे पहाड़ की खेती को लाभकारी
13 अक्टूबर 2026, बागेश्वर: मुंबई की नौकरी छोड़ लौटे गांव, अब रंगीन गोभी और काले धान से बना रहे पहाड़ की खेती को लाभकारी – करीब 22 साल तक मुंबई में नौकरी करने के बाद अपने गांव लौटे चंद्रशेखर पांडेय अब उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके में रंगीन सब्जियों और विशेष किस्म के अन्न की खेती से नई पहचान बना रहे हैं। बागेश्वर जिले के चौरसों गांव के इस किसान ने पिछले साल प्रयोग के तौर पर गुलाबी गोभी लगाई थी, जिसकी उपज और बाजार दोनों ने उन्हें हैरान कर दिया।
लंबे समय से खाली पड़ी पुश्तैनी जमीन पर खेती शुरू करने वाले चंद्रशेखर अब करीब 150 नाली जमीन पर फल, सब्जियां, दालें, औषधीय पौधे, काला धान और काला गेहूं उगा रहे हैं।
गुलाबी के बाद अब पीली गोभी भी खेत में
एक साथ कई फसलें लेने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी एक फसल का भाव या उत्पादन गिरने पर दूसरी फसल से आय बनी रहती है। पिछले साल गुलाबी गोभी का प्रयोग सफल रहने के बाद इस साल चंद्रशेखर ने पीली गोभी की खेती भी शुरू कर दी है।
उनका कहना है कि सामान्य गोभी के दाम बाजार में अक्सर बहुत नीचे गिर जाते हैं, जबकि रंगीन गोभी की मांग लगातार बनी रहती है। उनके मुताबिक पहाड़ का ठंडा मौसम और यहां की उपजाऊ मिट्टी रंगीन गोभी के लिए खासतौर पर मुफीद है। काला धान भी उनकी नई फसलों में शामिल है, हालांकि इसकी उपज और बिक्री का ब्योरा अभी सामने नहीं आया है क्योंकि यह अभी शुरुआती दौर में है।
उद्यान विभाग से मिली बीज की मदद
चंद्रशेखर को स्थानीय उद्यान विभाग से समय पर उन्नत बीज मिलने में मदद मिली है, जिससे उन्हें नई किस्मों के प्रयोग का हौसला मिला। उनका कहना है, “पहाड़ की खेती भी आधुनिक, विविध और लाभकारी व्यवसाय बन सकती है।”
विविध खेती अपनाने से न सिर्फ चंद्रशेखर की अपनी आमदनी बढ़ी है, बल्कि इससे गांव में रोजगार के नए मौके भी बने हैं। पहाड़ी इलाकों में अक्सर जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े और पानी की सीमित उपलब्धता बड़ी चुनौती मानी जाती है, लेकिन चंद्रशेखर जैसे किसान दिखा रहे हैं कि कम जमीन पर भी अलग-अलग फसलें लेकर साल भर आमदनी बनाई जा सकती है।
रंगीन सब्जियों की खेती पिछले कुछ सालों में पहाड़ी राज्यों में धीरे-धीरे बढ़ रही है, क्योंकि शहरी बाजारों और होटल-रेस्टोरेंट उद्योग में इनकी मांग बढ़ती जा रही है। बागेश्वर जैसे इलाकों में युवा और प्रवासी मजदूर वापस लौटकर इस तरह के प्रयोग कर रहे हैं, जिससे आने वाले समय में पहाड़ की पारंपरिक खेती का तरीका भी बदलता दिख सकता है।
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों से रोजगार के लिए मैदानी इलाकों और महानगरों की तरफ पलायन एक पुरानी और जानी-पहचानी समस्या रही है। चंद्रशेखर जैसे किसानों की कहानी इसलिए भी अहम है, क्योंकि यह दिखाती है कि अगर सही फसल और सही बाजार मिल जाए, तो गांव में रहकर भी अच्छी आमदनी संभव है।
बागेश्वर जिले की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि यहां बड़े, सपाट खेत बहुत कम मिलते हैं। जमीन नाली और मुट्ठी जैसी छोटी इकाइयों में बंटी रहती है, जिस पर बड़े पैमाने की मशीनीकृत खेती करना मुश्किल होता है। ऐसे में चंद्रशेखर जैसे किसान सीमित जमीन पर ज्यादा से ज्यादा फसलों का मिश्रण बनाकर साल भर आमदनी का इंतजाम करने की कोशिश करते हैं।
काला धान और काला गेहूं जैसी फसलें सामान्य किस्मों के मुकाबले बाजार में ज्यादा दाम पर बिकती हैं, क्योंकि इन्हें सेहत के लिहाज से बेहतर माना जाता है और शहरी उपभोक्ताओं के बीच इनकी मांग बढ़ रही है। हालांकि चंद्रशेखर के खेत में यह फसलें अभी नई हैं, इसलिए इनकी उपज और आमदनी का ठोस आंकड़ा आने वाले सीजन में ही साफ होगा। बागवानी और उद्यान विभाग के अधिकारी बताते हैं कि ऐसे प्रयोगों को देखकर आसपास के कुछ और किसान भी रंगीन सब्जियों की तरफ रुख करने पर विचार कर रहे हैं।
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