पचौली की खेती से किसानों की बढ़ेगी कमाई, एक एकड़ से 1.5 लाख तक मुनाफे का मौका; जानिए फायदे
09 अगस्त 2026, रायपुर: पचौली की खेती से किसानों की बढ़ेगी कमाई, एक एकड़ से 1.5 लाख तक मुनाफे का मौका; जानिए फायदे – छत्तीसगढ़ में किसानों की आय बढ़ाने के लिए पारंपरिक फसलों के साथ अब सुगंधित और औषधीय पौधों की खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी कड़ी में पचौली की खेती किसानों के लिए कम लागत में बेहतर कमाई का नया जरिया बनकर सामने आ रही है। इसकी खासियत यह है कि एक बार खेत में पौधे तैयार होने के बाद उन्हीं पुराने पौधों से नए पौधे आसानी से तैयार किए जा सकते हैं। इससे किसानों को बार-बार महंगे बीज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती और खेती की कुल लागत कम रखने में मदद मिलती है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में राज्य सरकार किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें खेती की नई संभावनाओं से जोड़ने के प्रयास कर रही है। इसी दिशा में छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड (वन विभाग) ने पचौली की खेती का प्रायोगिक प्रोजेक्ट शुरू किया है। राज्य में फिलहाल 8 एकड़ भूमि पर पचौली की खेती का प्रयोग किया जा रहा है। इसके बेहतर परिणाम मिलने पर किसानों को बड़े स्तर पर इसकी खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
पचौली की खेती क्यों है फायदे का सौदा?
पचौली एक सुगंधित और औषधीय पौधा है। इसकी पत्तियों से निकलने वाले तेल की देश-विदेश में अच्छी मांग है। पचौली के तेल का इस्तेमाल इत्र, परफ्यूम, साबुन, कॉस्मेटिक्स, अरोमाथेरेपी और प्राकृतिक कीट-रोधक उत्पादों में किया जाता है। बढ़ती मांग किसानों के लिए इस फसल में बेहतर बाजार और आय की संभावना पैदा कर रही है। खेती में रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। किसान फसल की सेहत सुधारने के लिए गोबर, गोमूत्र और गुड़ से तैयार प्राकृतिक जीवामृत का उपयोग कर सकते हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्रति एकड़ करीब 30 किलो तक तेल उत्पादन और करीब 6,000 रुपये प्रति लीटर तक बाजार भाव मिलने की स्थिति में किसान पहले वर्ष के खर्च निकालने के बाद लगभग 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं। हालांकि वास्तविक आय उत्पादन, गुणवत्ता और बाजार भाव के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।
एक साल में 2 से 3 बार कटाई
पचौली की खेती में लागत अपेक्षाकृत कम आती है और इससे साल में 2 से 3 बार तक कटाई की जा सकती है। इससे किसानों को एक ही फसल से बार-बार आय प्राप्त करने का अवसर मिलता है। इसकी खेती खुले खेतों के अलावा फलदार बगीचों, नारियल और सुपारी के बगीचों के बीच खाली जगह में भी की जा सकती है। ऐसे में किसान अपनी मौजूदा खेती के साथ पचौली को अतिरिक्त फसल के रूप में अपनाकर अतिरिक्त आमदनी हासिल कर सकते हैं।
जुलाई-अगस्त में रोपाई, 4-6 महीने में पहली कटाई
पचौली की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु अनुकूल मानी जाती है। इसकी रोपाई के लिए जुलाई-अगस्त का समय उपयुक्त है। ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करने से फसल की पैदावार और गुणवत्ता बेहतर करने में मदद मिल सकती है। रोपाई के करीब 4 से 6 महीने बाद पहली कटाई की जाती है। इसके बाद पत्तियों से भाप आसवन यानी स्टीम डिस्टिलेशन की प्रक्रिया के जरिए पचौली का तेल निकाला जाता है। यही तेल इसकी खेती से होने वाली कमाई का प्रमुख आधार है।
30-40 एकड़ के क्लस्टर में खेती से बाजार का फायदा
यदि किसान 30 से 40 एकड़ के क्लस्टर में मिलकर पचौली की खेती करते हैं, तो बड़ी कंपनियों के सीधे खेत से उपज खरीदने के लिए आगे आने की संभावना बढ़ जाती है। इससे किसानों को बाजार उपलब्ध कराने और उचित मूल्य दिलाने में सुविधा हो सकती है। औषधि पादप बोर्ड की ओर से किसानों को पचौली की खेती के लिए तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और विपणन सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है।
किसानों के लिए आय बढ़ाने का नया विकल्प
पचौली की खेती किसानों के लिए पारंपरिक फसलों के साथ आय के नए स्रोत विकसित करने का अवसर दे रही है। कम लागत, एक साल में कई बार कटाई और इसके तेल की बाजार मांग इसे संभावनाओं वाली सुगंधित फसल बनाती है। छत्तीसगढ़ सरकार और औषधि पादप बोर्ड की ओर से शुरू किया गया यह प्रायोगिक प्रोजेक्ट सफल रहता है तो राज्य में बड़े स्तर पर पचौली की खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे किसानों को खेती में विविधता लाने, अतिरिक्त आय बढ़ाने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर विकसित करने में मदद मिल सकती है।
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