परंपरागत खेती से आगे बढ़े कटनी के 450+ आदिवासी किसान, 125 एकड़ में उगा रहे मसाला-औषधीय फसलें
02 अक्टूबर 2026, कटनी: परंपरागत खेती से आगे बढ़े कटनी के 450+ आदिवासी किसान, 125 एकड़ में उगा रहे मसाला-औषधीय फसलें – मध्यप्रदेश के कटनी जिले में खेती के तौर-तरीकों में बदलाव देखने को मिल रहा है। ढीमरखेड़ा और बरवाड़ा क्षेत्र के 450 से ज्यादा आदिवासी किसान अब परंपरागत फसलों के साथ प्राकृतिक, औषधीय और मसाला फसलों की खेती से जुड़ रहे हैं। करीब 125 एकड़ क्षेत्र में किसान हल्दी, अदरक, अश्वगंधा, तुलसी और चिया जैसी फसलें उगा रहे हैं। लगातार तीसरे साल किसानों की खेती को लेकर सोच में यह बदलाव देखने को मिल रहा है।
कलेक्टर के निर्देश पर नई फसलों से जोड़ा गया
कलेक्टर आशीष तिवारी ने कृषि और उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों को प्राकृतिक, औषधीय और उद्यानिकी फसलों को बढ़ावा देने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद किसानों को नई फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के साथ उन्हें इनसे जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। शुरुआत में किसानों के मन में नई फसल, तकनीक और बाजार को लेकर कई तरह की आशंकाएं थीं। पर्यावरणविद् श्री निर्भय सिंह के प्रयासों से किसानों का भरोसा बढ़ा और उन्होंने नई फसलों की ओर कदम बढ़ाया।
अश्वगंधा की खेती से बढ़ा किसानों का भरोसा
पिछले साल किसानों को अश्वगंधा के बीज निशुल्क उपलब्ध कराए गए थे। करीब 25 एकड़ में अश्वगंधा की खेती की गई। किसानों ने इसकी उपज नीमच कृषि उपज मंडी में बेचकर करीब 25 हजार रुपए प्राप्त किए। इसका सीधा लाभ उत्पादक किसानों को मिला। अश्वगंधा की खेती की सफलता से दूसरे किसानों को भी नई फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिला।
इस साल हल्दी, अदरक, तुलसी समेत कई फसलें
इस वर्ष 175 किसान हल्दी की खेती कर रहे हैं। वहीं, 100-100 किसान अश्वगंधा और तुलसी की खेती से जुड़े हैं। 75 आदिवासी किसानों ने अदरक की खेती की है, जबकि 15 किसान करीब आधा एकड़ में चिया की खेती कर रहे हैं। इन फसलों से इस बार उत्पादन भी अच्छा रहने की उम्मीद है। अदरक से 700 से 800 क्विंटल, हल्दी से 2,500 से 3,000 क्विंटल और तुलसी से करीब 750 किलोग्राम उत्पादन का अनुमान है। अश्वगंधा की भी अच्छी उपज की उम्मीद जताई गई है।
बाजार की चुनौती के लिए बनाई किसान उत्पादक कंपनी
नई फसलों को अपनाने के साथ किसानों के सामने उपज के बाजार की चुनौती भी थी। इसके लिए संगमबिडी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनाई गई है। कंपनी के माध्यम से नीमच मंडी, डाबर इंडिया लिमिटेड, महाराष्ट्र की सुहाना मसाला सहित अन्य प्रतिष्ठित कंपनियों और बड़े औद्योगिक संस्थानों से बातचीत की जा रही है। कंपनियों ने जिले में उत्पादित फसलों को खरीदने में रुचि दिखाई है।
आठ गांवों से शुरू हुई थी पहल
ढीमरखेड़ा क्षेत्र में नाबार्ड के टीडीएफ फंड के तहत ननबाड़ी परियोजना के माध्यम से आठ गांवों से इस पहल की शुरुआत हुई थी। इनमें कोठी, हर्रई, सगौना, सिवनी, डैगवां, दियागढ़, उमरपानी और छाहर शामिल हैं। इसके बाद भलवारा, मेर, पहरुआ, कटारिया, खंडवारा, बांध, भमका, महगवां, सर्रा, तिलमन और बिजौरी सहित अन्य गांवों में भी किसान इस खेती से जुड़े। बरवाड़ा क्षेत्र में भदौरा, पथवारी, विलायतकलां, पथरा, भदावर, जमुनिया, बिजौरी, भमराड़, चदन और छपानी गांवों के किसान भी अश्वगंधा, हल्दी, अदरक और तुलसी जैसी फसलों की खेती कर रहे हैं।
निशुल्क बीज और प्रशिक्षण से मिला सहयोग
किसानों को नई फसलों से जोड़ने में राज्य कृषि विभाग के आत्मा कार्यक्रम, नाबार्ड की ननबाड़ी परियोजना और ह्यूमन लाइफ डेवलपमेंट कमेटी की भूमिका रही है। इन संस्थाओं की ओर से किसानों को निशुल्क बीज उपलब्ध कराए गए। पर्यावरणविद् श्री निर्भय सिंह के अनुसार, शुरुआत में किसानों को नई फसलों को लेकर झिझक थी, लेकिन एक किसान की सफलता से दूसरे किसानों का भरोसा बढ़ा। अब हर साल मसाला और औषधीय फसलों का रकबा बढ़ रहा है। हल्दी, अदरक, अश्वगंधा, तुलसी और चिया जैसी फसलों के जरिए किसानों की खेती केवल पारंपरिक फसलों के उत्पादन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि किसान बेहतर बाजार और कीमत की तलाश में भी आगे बढ़ रहे हैं। इससे कटनी के ग्रामीण क्षेत्रों में खेती की तस्वीर बदलने की उम्मीद दिखाई दे रही है।
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