मल्चिंग और जैविक खेती : मृदा तापमान संतुलन की प्रभावी तकनीक
लेखक: रंजना वसुन्या, डॉ. भरत सिंह, डॉ. दिव्या भायल, डॉ. अंजली भार्गव, डॉ. आस्था पाण्डेय, कृषि महाविद्यालय, इंदौर (म.प्र.)
23 मई 2026, भोपाल: मल्चिंग और जैविक खेती : मृदा तापमान संतुलन की प्रभावी तकनीक – परिचय
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन विश्व स्तर पर एक गंभीर समस्या बन चुका है। पृथ्वी के औसत तापमान में लगातार वृद्धि होने के कारण कृषि, जल संसाधन, वनस्पति एवं मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह समस्या और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहाँ की अधिकांश जनसंख्या आज भी कृषि पर निर्भर है। बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा तथा अत्यधिक गर्म हवाओं के कारण कृषि भूमि की उत्पादकता धीरे-धीरे प्रभावित हो रही है। विशेष रूप से मृदा का अत्यधिक गर्म होना किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
मृदा कृषि उत्पादन का आधार है। स्वस्थ एवं उपजाऊ मृदा ही पौधों को आवश्यक पोषक तत्व, जल तथा उचित वातावरण प्रदान करती है। जब मृदा का तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है, तब उसकी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक विशेषताएँ प्रभावित होने लगती हैं। अधिक तापमान के कारण मृदा की नमी तेजी से समाप्त होती है, सूक्ष्मजीवों की सक्रियता कम हो जाती है तथा पौधों की जड़ों का विकास बाधित होता है। परिणामस्वरूप फसल की वृद्धि रुक जाती है और उत्पादन में कमी आने लगती है। इसके अतिरिक्त भूमि की संरचना कमजोर हो जाती है तथा लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने पर भूमि बंजर होने की संभावना भी बढ़ जाती है।
इसी संदर्भ में मल्चिंग और जैविक खेती अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रभावी तकनीकें मानी जाती हैं। मल्चिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें मृदा की सतह को किसी जैविक या अजैविक पदार्थ से ढक दिया जाता है। इससे सूर्य की सीधी किरणें मृदा तक नहीं पहुँच पातीं और मृदा का तापमान नियंत्रित रहता है। साथ ही, यह मृदा की नमी को सुरक्षित रखने, वाष्पीकरण को कम करने तथा खरपतवार नियंत्रण में भी सहायक होती है। दूसरी ओर, जैविक खेती मृदा में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाकर उसकी संरचना, उर्वरता एवं जलधारण क्षमता में सुधार करती है। जैविक खाद एवं जैव उर्वरकों के उपयोग से मृदा में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है, जिससे भूमि अधिक उपजाऊ एवं जीवंत बनती है।
मल्चिंग एवं जैविक खेती दोनों तकनीकें पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ सतत कृषि विकास को भी बढ़ावा देती हैं। ये तकनीकें जल संरक्षण, मृदा संरक्षण तथा पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वर्तमान समय में जब कृषि भूमि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर रही है, तब इन तकनीकों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
अतः मृदा को अत्यधिक गर्म होने से बचाने तथा उसकी उर्वरता एवं उत्पादकता बनाए रखने के लिए मल्चिंग और जैविक खेती का उपयोग अत्यंत आवश्यक है। यह लेख मृदा के अत्यधिक गर्म होने की समस्या, उसके कारणों एवं प्रभावों के साथ-साथ मल्चिंग और जैविक खेती की भूमिका का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है।
जैविक खेती की भूमिका: मृदा तापमान संतुलन की प्रभावी तकनीक
जैविक खेती एक पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धति है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के स्थान पर जैविक खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद एवं जैव उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। वर्तमान समय में बढ़ते तापमान एवं जलवायु परिवर्तन के कारण मृदा के अत्यधिक गर्म होने की समस्या बढ़ती जा रही है। ऐसी परिस्थितियों में जैविक खेती मृदा संरक्षण की एक प्रभावी तकनीक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जैविक खेती मृदा में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाती है, जिससे मिट्टी की जलधारण क्षमता एवं संरचना में सुधार होता है। कार्बनिक पदार्थ मिट्टी में नमी को लंबे समय तक बनाए रखते हैं, जिसके कारण मृदा तापमान संतुलित रहता है और मिट्टी अत्यधिक गर्म नहीं होती। इसके अतिरिक्त जैविक खादों के उपयोग से मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है, जो मृदा को अधिक उपजाऊ एवं जीवंत बनाते हैं।
रासायनिक खेती की तुलना में जैविक खेती मिट्टी की गुणवत्ता को लंबे समय तक सुरक्षित रखती है। यह मृदा अपरदन को कम करने, जल संरक्षण करने तथा पर्यावरण प्रदूषण को घटाने में भी सहायक होती है। जैविक खेती में फसल अवशेषों एवं प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग मल्चिंग के रूप में भी किया जाता है, जिससे मृदा की सतह सूर्य की सीधी किरणों से सुरक्षित रहती है।
इसके अतिरिक्त जैविक खेती फसलों की जड़ों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती है, जिससे पौधों की वृद्धि एवं उत्पादन में सुधार होता है। यह तकनीक जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने तथा टिकाऊ कृषि विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अतः मृदा को अत्यधिक गर्म होने से बचाने, उसकी उर्वरता बनाए रखने तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए जैविक खेती को अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
मल्चिंग : एक प्रभावी संरक्षण तकनीक
मल्चिंग वह प्रक्रिया है जिसमें मिट्टी की सतह को सूखी घास, पत्तियों, फसल अवशेषों, भूसे या प्लास्टिक आदि से ढक दिया जाता है। यह परत मिट्टी को सीधे सूर्य की किरणों से बचाती है और तापमान को संतुलित बनाए रखती है।
“मल्चिंग को ढाल बनाएँ, गर्मी से मिट्टी को बचाएँ।“
मल्चिंग के प्रकार
मल्चिंग आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि की एक महत्वपूर्ण तकनीक है, जिसमें मिट्टी की सतह को विभिन्न जैविक अथवा अजैविक पदार्थों से ढक दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य मृदा की नमी को संरक्षित रखना, तापमान को नियंत्रित करना, खरपतवारों की वृद्धि को कम करना तथा मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखना है। वर्तमान समय में बढ़ते तापमान एवं जलवायु परिवर्तन के कारण मृदा के अत्यधिक गर्म होने की समस्या गंभीर होती जा रही है। ऐसी परिस्थितियों में मल्चिंग मृदा संरक्षण की एक प्रभावी एवं पर्यावरण-अनुकूल तकनीक के रूप में उभरकर सामने आई है। उपयोग की जाने वाली सामग्री के आधार पर मल्चिंग को निम्न प्रकारों में विभाजित किया जाता है।
1. जैविक मल्चिंग :- जैविक मल्चिंग में प्राकृतिक रूप से प्राप्त पदार्थों जैसे सूखी पत्तियाँ, भूसा, फसल अवशेष, घास, लकड़ी का बुरादा, नारियल रेशा तथा कम्पोस्ट आदि का उपयोग किया जाता है। यह विधि जैविक खेती में अत्यधिक उपयोगी मानी जाती है क्योंकि यह मिट्टी की उर्वरता एवं जैविक गतिविधियों को बढ़ावा देती है।
2. प्लास्टिक मल्चिंग :- इस विधि में मिट्टी की सतह पर प्लास्टिक की पतली चादर बिछाई जाती है। सामान्यतः काले, चाँदी-काले अथवा पारदर्शी प्लास्टिक का उपयोग किया जाता है। यह तकनीक विशेष रूप से सब्जी एवं बागवानी फसलों में अधिक प्रचलित है।
प्लास्टिक मल्च मिट्टी से जल के वाष्पीकरण को कम करती है तथा खरपतवारों की वृद्धि को नियंत्रित करती है। काली प्लास्टिक सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करके खरपतवारों को बढ़ने से रोकती है, जबकि चाँदी-काली मल्च तापमान संतुलन बनाए रखने में सहायक होती है। यह मृदा को अत्यधिक गर्म होने से बचाकर फसलों की वृद्धि एवं उत्पादन में सुधार करती है।
3. अकार्बनिक मल्चिंग :- इस प्रकार की मल्चिंग में पत्थर, बजरी, रबर या अन्य कृत्रिम पदार्थों का उपयोग किया जाता है। यह विधि मुख्यतः बागवानी एवं सजावटी पौधों में उपयोग की जाती है।
अकार्बनिक मल्च मिट्टी की सतह को ढककर तापमान को नियंत्रित करने तथा नमी संरक्षण में सहायता करती है। हालांकि, यह मिट्टी में जैविक पदार्थों की वृद्धि नहीं करती।
4. पेपर एवं कार्डबोर्ड मल्चिंग :- इस विधि में कागज एवं गत्ते का उपयोग मिट्टी की सतह को ढकने के लिए किया जाता है। यह पर्यावरण-अनुकूल एवं जैविक रूप से विघटित होने वाली तकनीक है।
यह मल्चिंग खरपतवार नियंत्रण, नमी संरक्षण तथा तापमान संतुलन में सहायता करती है। जैविक खेती में इसका उपयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
मल्चिंग और जैविक खेती का संयुक्त प्रभाव
मल्चिंग एवं जैविक खेती दोनों ही टिकाऊ कृषि प्रणाली की महत्वपूर्ण तकनीकें हैं। जब इन दोनों का संयुक्त रूप से उपयोग किया जाता है, तब मृदा स्वास्थ्य, नमी संरक्षण, तापमान नियंत्रण तथा फसल उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वर्तमान समय में बढ़ते तापमान एवं जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों में मल्चिंग और जैविक खेती का समन्वित उपयोग मृदा को अत्यधिक गर्म होने से बचाने तथा कृषि उत्पादन को स्थिर बनाए रखने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रहा है।
“जैविक खेती और मल्चिंग अपनाएँ, सतत कृषि का भविष्य बनाएँ”
1. मृदा तापमान नियंत्रण में प्रभाव
2. नमी संरक्षण में सुधार
3. मृदा उर्वरता में वृद्धि
4. सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में वृद्धि
5. खरपतवार नियंत्रण
6. मृदा अपरदन में कमी
7. फसल उत्पादन एवं गुणवत्ता में सुधार
8. पर्यावरण संरक्षण में योगदान
किसानों के लिए सुझाव
मृदा को अत्यधिक गर्म होने से बचाने तथा टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के लिए किसानों को वैज्ञानिक एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि तकनीकों को अपनाना आवश्यक है। मल्चिंग एवं जैविक खेती के समुचित उपयोग से मृदा स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है तथा फसल उत्पादन को स्थिर एवं सुरक्षित बनाया जा सकता है। इस संदर्भ में किसानों के लिए निम्नलिखित सुझाव उपयोगी हो सकते हैं।
1. मल्चिंग तकनीक का उपयोग करें
किसानों को खेतों में सूखी पत्तियाँ, भूसा, फसल अवशेष, घास अथवा प्लास्टिक मल्च का उपयोग करना चाहिए। इससे मिट्टी की नमी संरक्षित रहती है, तापमान नियंत्रित रहता है तथा खरपतवारों की वृद्धि कम होती है।
2. फसल अवशेषों को न जलाएँ
फसल कटाई के बाद अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें मल्च के रूप में उपयोग करना चाहिए। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है तथा मृदा तापमान नियंत्रित रहता है।
3. जैविक खादों का अधिक उपयोग करें
गोबर खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट एवं हरी खाद का उपयोग मिट्टी की उर्वरता एवं जल धारण क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है। जैविक पदार्थ मृदा को अत्यधिक गर्म होने से बचाने में भी मद
4. संतुलित सिंचाई अपनाएँ
समय पर एवं आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। ड्रिप एवं स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का उपयोग जल संरक्षण एवं नमी बनाए रखने में सहायक होता है।
5. अत्यधिक जुताई से बचें
बार-बार एवं गहरी जुताई मिट्टी की संरचना को नुकसान पहुँचाती है तथा नमी हानि बढ़ाती है। इसलिए न्यूनतम जुताई (Minimum Tillage) तकनीक अपनानी चाहिए।
6. वृक्षारोपण एवं कृषि वानिकी को बढ़ावा दें
खेतों के आसपास पेड़-पौधे लगाने से तापमान नियंत्रण में सहायता मिलती है तथा मृदा अपरदन कम होता है। कृषि वानिकी प्रणाली मृदा संरक्षण के लिए लाभकारी होती है।
9. मृदा परीक्षण कराएँ
समय-समय पर मृदा परीक्षण करवाकर मिट्टी की पोषक स्थिति एवं pH का पता लगाना चाहिए। इससे उचित उर्वरक एवं प्रबंधन तकनीकों का चयन किया जा सकता है।
10. जागरूकता एवं प्रशिक्षण प्राप्त करें
किसानों को कृषि वैज्ञानिकों एवं कृषि विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेना चाहिए ताकि आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि तकनीकों की जानकारी प्राप्त हो सके।
निष्कर्ष
वर्तमान समय में बढ़ते तापमान के कारण मृदा का अत्यधिक गर्म होना कृषि के लिए एक गंभीर समस्या बन गया है। इससे मृदा की नमी, उर्वरता एवं सूक्ष्मजीवों की सक्रियता प्रभावित होती है। अधिक तापमान के कारण फसलों की वृद्धि एवं उत्पादन में कमी आती है। रासायनिक खेती एवं फसल अवशेषों का दहन इस समस्या को और बढ़ाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में मल्चिंग एवं जैविक खेती प्रभावी समाधान के रूप में सामने आती हैं। मल्चिंग मृदा तापमान को नियंत्रित करने तथा नमी संरक्षण में सहायक होती है। वहीं जैविक खेती मृदा की संरचना एवं उर्वरता में सुधार करती है। इन दोनों तकनीकों के संयुक्त उपयोग से मृदा स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है। साथ ही पर्यावरण संरक्षण एवं जल संरक्षण में भी सहायता मिलती है। अतः टिकाऊ कृषि विकास के लिए मल्चिंग एवं जैविक खेती को अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
ICAR-IISS. (2020). सतत कृषि के लिए मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉइल साइंस, भोपाल।
शर्मा, आर. एवं सहयोगी. (2020). मल्चिंग द्वारा मृदा नमी एवं तापमान प्रबंधन. भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण जर्नल।
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