राज्य कृषि समाचार (State News)

मंडला: शून्य जुताई ने बदली किसान लोचन की तकदीर  

25 जून 2026, मंडला: मंडला: शून्य जुताई ने बदली किसान लोचन की तकदीर – मंडला जिले के आदिवासी बहुल ग्राम रामपुर के किसान श्री लोचन भांवरे आज क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन चुके हैं। बदलते मौसम, अनियमित वर्षा और बढ़ती कृषि लागत जैसी चुनौतियों के बीच उन्होंने आधुनिक कृषि तकनीक को अपनाकर यह साबित कर दिया कि सही मार्गदर्शन और नवाचार से खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।

 कुछ वर्ष पहले तक श्री भांवरे पारंपरिक खेती पद्धति से खेती करते थे। धान की कटाई के बाद गेहूँ की बुवाई के लिए बार-बार जुताई करनी पड़ती थी, जिससे समय, श्रम और धन तीनों की अधिक आवश्यकता होती थी। मौसम की अनिश्चितता के कारण उत्पादन भी अपेक्षित नहीं मिल पाता था। वर्ष 2024 में जलवायु अनुकूल कृषि परियोजना के तहत बीआईएसए एवं कृषि विभाग की टीम ने ग्राम रामपुर में किसानों को शून्य जुताई तकनीक और फसल अवशेष प्रबंधन के बारे में जानकारी दी।

वैज्ञानिकों के सुझाव और आत्मा परियोजना के अधिकारियों के मार्गदर्शन से प्रेरित होकर श्री लोचन भांवरे ने अपने खेत में पहली बार शून्य जुताई तकनीक अपनाने का निर्णय लिया। उन्होंने धान कटाई के बाद पराली को जलाने के बजाय खेत में ही संरक्षित रखा और हैप्पी सीडर मशीन की सहायता से सीधे गेहूँ की बुवाई की। इस तकनीक से खेत तैयार करने में लगने वाला समय कम हुआ, जुताई और मजदूरी का खर्च घटा तथा समय पर बुवाई संभव हो सकी। खेत में मौजूद फसल अवशेषों ने मिट्टी की नमी बनाए रखने, खरपतवार नियंत्रण और भूमि की उर्वरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब फसल कटाई का समय आया तो परिणाम उम्मीद से कहीं बेहतर थे। पहले जहाँ गेहूँ का उत्पादन 10 से 12 क्विंटल प्रति एकड़ मिलता था, वहीं शून्य जुताई तकनीक अपनाने के बाद उत्पादन बढ़कर 15 से 16 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुँच गया। अर्थात उत्पादन में लगभग 30 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई। धान और मूंग की फसलों में भी 10 से 15 प्रतिशत तक उत्पादन बढ़ा।

 इस तकनीक ने केवल आर्थिक लाभ ही नहीं दिया, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। पराली जलाने की आवश्यकता समाप्त होने से वायु प्रदूषण कम हुआ, मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीव सुरक्षित रहे तथा खेत की जलधारण क्षमता में सुधार हुआ। अपनी सफलता के बारे में श्री लोचन भांवरे कहते हैं, “आज खेती की सबसे बड़ी चुनौती बदलता हुआ मौसम है। ऐसे समय में वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाना ही किसानों की सफलता का मार्ग है। नई तकनीकें खेती को लाभकारी और जलवायु के अनुकूल बनाती हैं।” आज उनकी सफलता से प्रेरित होकर ग्राम रामपुर सहित आसपास के अनेक किसान भी शून्य जुताई तकनीक अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं। श्री लोचन भांवरे की यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि वैज्ञानिक सोच, आधुनिक तकनीक और किसान का दृढ़ संकल्प मिलकर खेती को समृद्ध, टिकाऊ और भविष्य के लिए सुरक्षित बना सकते हैं। श्री लोचन भांवरे की यह सफलता कहानी मंडला जिले के किसानों के लिए आशा, नवाचार और आत्मनिर्भरता का एक प्रेरणादायक उदाहरण है।

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