मध्यप्रदेश: खेत नहीं था, तो घर के दो कमरों में शुरू की मशरूम खेती, अब हो रही लाखों की कमाई
16 मई 2026, भोपाल: मध्यप्रदेश: खेत नहीं था, तो घर के दो कमरों में शुरू की मशरूम खेती, अब हो रही लाखों की कमाई – खेती के लिए अक्सर बड़ी जमीन को सबसे जरूरी माना जाता है, लेकिन जबलपुर जिले के पाटन विकासखंड के ग्राम कुशली निवासी किसान शैलेंद्र रैकवार ने इस सोच को बदलकर रख दिया है। पुश्तैनी जमीन नहीं होने के बावजूद शैलेंद्र ने हार नहीं मानी और घर के दो खाली कमरों को ही अपनी खेती का आधार बना लिया। आज वह छोटे कमरे उनकी सफलता और बेहतर कमाई का बड़ा जरिया बन चुके हैं।
शैलेंद्र रैकवार ने आधुनिक तकनीक और नई सोच के सहारे मशरूम उत्पादन शुरू किया और कम समय में एक सफल किसान के रूप में पहचान बना ली। उनकी इस पहल ने न केवल परिवार को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि आसपास के किसानों और युवाओं को भी आधुनिक खेती की नई राह दिखाई है।
दो कमरों में तैयार की मशरूम यूनिट
शैलेंद्र ने घर के दो खाली कमरों में मशरूम प्रोडक्शन यूनिट तैयार की। कम जगह का अधिकतम उपयोग करने के लिए उन्होंने वर्टिकल फार्मिंग यानी खड़ी खेती की तकनीक अपनाई। इसके तहत बांस की लकड़ी से 4 से 5 मंजिला रैक तैयार किए गए, जिससे एक ही कमरे में ज्यादा बैग रखकर उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सके।
मशरूम उत्पादन के लिए तापमान और नमी का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। इसके लिए उन्होंने कूलर और फॉगर का उपयोग किया, ताकि कमरे का तापमान 18 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रहे। सही वेंटिलेशन और नमी प्रबंधन के कारण मात्र 30 से 45 दिनों में मशरूम की फसल तैयार हो जाती है।
कम लागत में शुरू हुआ बड़ा कारोबार
इस व्यवसाय की सबसे बड़ी खासियत कम लागत और बेहतर मुनाफा है। शैलेंद्र ने लगभग 30 से 40 हजार रुपये की शुरुआती लागत से मशरूम उत्पादन शुरू किया। इस राशि में बीज, भूसा और रैक जैसे जरूरी संसाधन शामिल थे।
वर्तमान में उनकी यूनिट में करीब 400 से 500 बैग लगाए जाते हैं, जिनसे औसतन 800 से 1000 किलो मशरूम का उत्पादन प्राप्त होता है। स्थानीय होटल, ढाबों और सब्जी मंडियों में मशरूम की अच्छी मांग होने से उन्हें नियमित आय मिल रही है।
ताजा मशरूम नहीं बिके तो पाउडर और अचार बनाकर बेचते हैं
शैलेंद्र ने मशरूम उत्पादन के साथ मार्केटिंग पर भी ध्यान दिया। यदि ताजा मशरूम की बिक्री नहीं हो पाती, तो उसे सुखाकर पाउडर या अचार बनाकर बेचा जाता है। इससे नुकसान की संभावना कम हो जाती है और आय का लगातार स्रोत बना रहता है।
प्रति बैच मशरूम उत्पादन में करीब 5 से 7 हजार रुपये का परिचालन खर्च आता है, जिससे यह मॉडल छोटे किसानों और युवाओं के लिए एक बेहतरीन स्टार्टअप बनकर उभरा है।
युवाओं के लिए बने प्रेरणा
कृषि विभाग के अधिकारियों के मार्गदर्शन में तैयार हुआ यह मॉडल अब जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। शैलेंद्र और उनकी पत्नी संगीता रैकवार आज न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अन्य किसानों और युवाओं को भी यह संदेश दे रहे हैं कि खेती के लिए एकड़ में फैली जमीन जरूरी नहीं, बल्कि नई सोच और तकनीक जरूरी है।
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