इंजीनियरिंग छोड़ अपनाई प्राकृतिक खेती! अब वर्मी कम्पोस्ट, नर्सरी और पशुपालन से दंपति कमा रहा लाखों रुपए, दूसरे किसान को भी दे रहे प्रशिक्षण
13 जुलाई 2026, भोपाल: इंजीनियरिंग छोड़ अपनाई प्राकृतिक खेती! अब वर्मी कम्पोस्ट, नर्सरी और पशुपालन से दंपति कमा रहा लाखों रुपए, दूसरे किसान को भी दे रहे प्रशिक्षण – दृढ़ संकल्प, नवाचार और अपनी मिट्टी पर विश्वास हो तो खेती भी सम्मानजनक और लाभकारी आजीविका का मजबूत माध्यम बन सकती है। इसका जीवंत उदाहरण नरसिंहपुर जिले के चीचली विकासखंड स्थित ग्राम पंचायत पुआरिया के युवा किसान दंपति कुलदीप कौरव और शिवानी कौरव हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़कर खेती को अपना करियर बनाने वाले कुलदीप ने प्राकृतिक खेती को अपनाया और आज वर्मी कम्पोस्ट, नर्सरी, पशुपालन और बागवानी के समन्वित मॉडल से हर साल करीब 4 लाख रुपये की शुद्ध आय अर्जित कर रहे हैं। इतना ही नहीं, वे अब अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती की तकनीकों का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
इंजीनियरिंग छोड़ खेती को बनाया करियर
कुलदीप कौरव ने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन उनका मन हमेशा खेती और गांव की मिट्टी से जुड़ा रहा। उन्होंने साहसिक फैसला लेते हुए पढ़ाई छोड़ दी और खेती को ही अपना भविष्य बनाया। इस सफर में उनकी पत्नी शिवानी कौरव ने भी हर कदम पर उनका साथ दिया। दोनों ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक और प्राकृतिक कृषि तकनीकों को अपनाने का निर्णय लिया, जिसने उनकी जिंदगी बदल दी।
प्राकृतिक खेती से घटी लागत, बढ़ी आय
रासायनिक खेती की बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता को देखते हुए दंपति ने अपने खेत में वर्मी कम्पोस्ट इकाई स्थापित की। गोबर, फसल अवशेष और जैविक पदार्थों से तैयार खाद के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ और रासायनिक उर्वरकों पर होने वाला खर्च काफी कम हो गया। अतिरिक्त वर्मी कम्पोस्ट की बिक्री से उनकी आय का एक नया स्रोत भी तैयार हो गया।
खेती, पशुपालन और नर्सरी का सफल मॉडल
दंपति ने खेती को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पशुपालन को भी इससे जोड़ा। पशुओं से मिलने वाले गोबर का उपयोग जैविक खाद तैयार करने में किया जाने लगा। वहीं, पशुओं के लिए कम लागत में पौष्टिक चारा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अजोला उत्पादन इकाई भी स्थापित की गई, जिससे चारे का खर्च कम हुआ और पशुओं के स्वास्थ्य के साथ दुग्ध उत्पादन में भी सुधार हुआ।
भविष्य की आय को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने खेत में करीब 100 नींबू, 100 आम, 50 आंवला और 20 अमरूद के पौधे लगाए। इसके साथ ही सब्जियों, पपीता, मुनगा, आम सहित विभिन्न पौधों की गुणवत्तापूर्ण नर्सरी तैयार की, जिससे क्षेत्र के किसानों को बेहतर पौधे उपलब्ध हो रहे हैं और बागवानी को बढ़ावा मिल रहा है।
दूसरे किसानों को भी दे रहे प्रशिक्षण
आज कुलदीप कौरव कृषि विभाग से जुड़े बायो रिसोर्स सेंटर के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती, जीवामृत, घनजीवामृत, वर्मी कम्पोस्ट और अजोला उत्पादन का प्रशिक्षण दे रहे हैं। वहीं, उनकी पत्नी शिवानी कौरव ‘कृषि सखी’ के रूप में महिला किसानों को प्राकृतिक और आधुनिक खेती की तकनीकों से जोड़ रही हैं। उनके मार्गदर्शन से कई महिलाएं खेती और कृषि आधारित आजीविका गतिविधियों को अपनाकर आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं।
हर साल करीब 4 लाख रुपये की शुद्ध आय
कुलदीप कौरव बताते हैं कि पहले परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी और सीमित आय में परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होता था। लेकिन प्राकृतिक खेती, वर्मी कम्पोस्ट, नर्सरी, पशुपालन और बागवानी जैसे कृषि आधारित कार्यों को अपनाने के बाद उनकी आय में लगातार वृद्धि हुई। आज उनका परिवार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है और इन गतिविधियों से उन्हें हर साल करीब 4 लाख रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हो रही है।
दूसरे किसानों के लिए बना प्रेरणादायी मॉडल
आज कुलदीप और शिवानी कौरव का खेत एक ‘लर्निंग फार्म’ बन चुका है, जहां किसान, युवा और स्व-सहायता समूहों के सदस्य प्राकृतिक खेती की तकनीकों को सीखने के लिए पहुंचते हैं। कुलदीप का कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने से उनकी लागत घटी, मिट्टी की सेहत में सुधार हुआ और आय लगातार बढ़ी। उनका मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक सोच, नवाचार और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करें, तो खेती को कम लागत में अधिक लाभ देने वाला और टिकाऊ व्यवसाय बनाया जा सकता है।
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