एशियाई सोयाबीन में गेरुआ रोग का आनुवंशिक प्रबंधन’ पर अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार संपन्न

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19 जून 2021, इंदौर । एशियाई सोयाबीन में गेरुआ रोग का आनुवंशिक प्रबंधन’ पर अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार संपन्न – भा.कृ.अनु.प.-भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर द्वारा “एशियाई सोयाबीन में गेरुआ रोग केआनुवंशिक प्रबंधन: वर्तमान स्थिति और भविष्य के दृष्टिकोण” पर  गत दिनों एक वेबिनार का आयोजन किया गया। इस वेबिनार में जापान के अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र, कृषि विज्ञान (जेआईआरसीएएस – जिरकास ) के वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. नाओकी यामानाका ने “एशियाई सोयाबीन के गेरुआ रोग के आनुवंशिक प्रबंधन” पर व्याख्यान दिया।

डॉ. यामानाका ने कहा कि जापान अपनी सोयाबीन की आवश्यकता का 90% आयात कर रहा है और अपनीजनसंख्या के लिए आवश्यक सोयाबीन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए, जिरकास अन्य देशजैसे ब्राजील, बांग्लादेश, पराग्वे, उरुग्वे, अर्जेंटीना और मैक्सिको जैसे विभिन्न देशों में सोयाबीन के गेरुआ रोगकि रोगरोधी किस्मों के अनुसंधान और विकास में लगा हुआ है। उन्होंने कहा कि सोयाबीन के गेरुआ रोग काआनुवंशिक प्रबंधन सबसे किफायती और पारिस्थितिक तरीका है। डॉ.यामानाका ने सोयाबीन के गेरुआ रोग पर आनुवंशिक अध्ययन पर अपना शोधकार्य प्रस्तुत किया, जिसमें गेरुआ रोग प्रतिरोधी जीन की मैपिंग और लक्षणों का वर्णन और जीन पिरामिडयुक्त गेरुआ प्रतिरोधी लाइनों का विकास शामिल है। एशियाई सोयाबीन की प्रचलित किस्मों में गेरुआ सोयाबीन का एक महत्वपूर्ण रोग है, जिससे कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में सोयाबीन के उत्पादन में नुकसान होता है। एक ही किस्म की खेती के कारण, गेरुआ रोग की नई रेसों का विकास तेजी से होने पर यह रोग सोयाबीन पर कहर बरपा सकता है,इसलिए सोयाबीन में टिकाऊ प्रतिरोध बनाने के लिए सक्रिय उपायों की आवश्यकता है।

इंदौर संस्थान की निदेशक  डॉ. नीता खांडेकर ने कहा कि भारतीय सोयाबीन की किस्मों में गेरुआ रोग की प्रतिरोधिता में सुधार करने के लिए भारत के वैज्ञानिक जिरकास  के साथ सहयोगी परियोजना के माध्यम से जापान में उपलब्ध प्रतिरोधी आनुवंशिक सामग्री का उपयोग करने का प्रयास करेंगे। वहीं  “पादप विज्ञान अनुसन्धान संस्था” के अध्यक्ष और प्लांट प्रोटेक्शन वैरायटी एवं फार्मर्स’ राईट एक्ट के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आर. आर. हंचिनल ने इस वेबिनार की अध्यक्षता करते हुए कहा कि सोयाबीन को ऐसी बीमारियों से बचाने के लिए और अन्य देशो के साथ सहयोगात्मक प्रयासों में वृद्धि की जरूरत है।

इस वेबिनार  में विशेष  रूप से उपस्थित डॉ. एस. के. राव, कुलपति, राजमाता विजयाराजे सिंधिया विश्वविद्यालय,ग्वालियर ने कहा कि मध्य भारत में किसानों के लिए सोयाबीन की फसल का कोई अन्य विकल्प नहीं है,इसलिए कई रोग प्रतिरोधी सोयाबीन किस्मों के विकास की आवश्यकता है।डॉ. एस. राजेंद्र प्रसाद, कुलपति, युनिवेर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चरल साइंसेज,बैंगलोर ने कहा कि आनुवंशिक प्रबंधन के साथ सूक्ष्मजीओं का उपयोग करके रोगों का जैविक नियंत्रण करना एक कम लागत वाली औरकिफायती पद्धति हैं। डॉ. पी.जी. पाटिल, कुलपति, महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी (महाराष्ट्र) ने कहा किसोयाबीन के गेरुआ रोग से दक्षिणी महाराष्ट्र में खतरा है और इस वेबिनार से निश्चित रूप से राज्य के सोयाबीन वैज्ञानिकों को फायदा होगा। इस वेबिनार में विशेष आमंत्रित सदस्य डॉ. संजीव गुप्ता, सहायक महानिदेशक (तिलहन और दलहन), भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद, नई दिल्ली ने कहा कि ज्ञान साझा करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए ऐसे वेबिनार बहुत महत्वपूर्ण हैं। समन्वयक डॉ. गिरिराज कुमावत ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

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