फसल नुकसान के पंचनामे पर सूचना आयोग का शिकंजा, तहसीलदार पर ₹25 हजार की शास्ति
27 सितंबर 2026, भोपाल (कृषक जगत) (विशेष संवाददाता): फसल नुकसान के पंचनामे पर सूचना आयोग का शिकंजा, तहसीलदार पर ₹25 हजार की शास्ति – किसान के खेत में फसल नुकसान हुआ, सरकारी अमले ने निरीक्षण किया और पंचनामा बनाया, लेकिन जब किसान ने उसी सरकारी रिकॉर्ड की प्रतियां मांगीं, तो दो महत्वपूर्ण पंचनामे उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई। अपने अधिकारों के लिए पांढुर्ना के किसान श्री मंसाराम खोड़े ने संघर्ष जारी रखा और मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंचा। आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए तत्कालीन तहसीलदार एवं लोक सूचना अधिकारी श्री वीर बहादुर सिंह धुर्वे पर ₹25,000 की शास्ति अधिरोपित करने तथा धारा 20(2) के तहत कारण बताओ सूचना-पत्र जारी करने के अलावा पांढुर्ना कलेक्टर को सक्षम अधिकारी से इस मामले के तथ्यों की जांच कराने के भी निर्देश दिए हैं।
दरअसल, मामला 4 फरवरी 2023 को संतरे की फसल के 100 प्रतिशत नुकसान के पंचनामे से शुरू हुआ। किसान के अनुसार 4 फरवरी को मौका मुआयना करने निरीक्षण दल खेत पर पहुंचा था। इस दौरान तैयार किए गए पंचनामे पर किसानों के हस्ताक्षर भी लिए गए थे। किसान ने इस पंचनामे के अस्तित्व और मौके पर हुई कार्रवाई के समर्थन में राज्य सूचना आयोग के समक्ष फोटो एवं वीडियो रिकॉर्डिंग भी प्रस्तुत की।
इसके बाद 6 मार्च 2023 को हुई बेमौसम बारिश और आंधी से गेहूं एवं सरसों की फसल को हुए नुकसान के आकलन के लिए 16 मार्च को निरीक्षण दल खेत पर पहुंचा। किसान के अनुसार मौके पर करीब 30 प्रतिशत फसल नुकसान बताया गया और इस संबंध में भी पंचनामा तैयार किया गया। 18 अप्रैल 2023 को इसी फसल नुकसान का दोबारा जायजा लेने संयुक्त निरीक्षण दल किसान के खेत पर पहुंचा। इस निरीक्षण में नुकसान का आकलन करीब 20 प्रतिशत बताया गया। किसान ने इस आकलन पर आपत्ति जताते हुए वास्तविक नुकसान का पुनः आकलन कराने की मांग की। 25 प्रतिशत से कम क्षति के आधार पर सहायता नहीं मिलने की स्थिति बनी और किसान को राहत राशि नहीं मिल सकी। बता दें कि पंचनामे पर किसान के हस्ताक्षर तो लिए जाते हैं, लेकिन उसकी प्रति किसानों को नहीं दी जाती है। ऐसे में फसल क्षति होने पर किसानों को आरबीसी 6-4 के तहत आर्थिक सहायता पाने में बहुत मुश्किल होती है।
श्री मंसाराम खोड़े ने 4 फरवरी, 16 मार्च और 18 अप्रैल 2023 को हुए फसल नुकसान से संबंधित पंचनामा प्रतिवेदनों की प्रतियां सूचना के अधिकार के तहत मांगी। उन्हें केवल 18 अप्रैल का पंचनामा उपलब्ध कराया गया, जबकि 4 फरवरी और 16 मार्च के पंचनामे उपलब्ध नहीं होने की जानकारी दी गई। किसान ने संबंधित रिकॉर्ड तथा कथित छेड़छाड़ की भी जांच की मांग की। लोक सूचना अधिकारी स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने पर उन्होंने राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील की।
यह मामला बताता है कि सरकार, किसान हितैषी होने के लाख दावे करे, लेकिन जब तक नौकरशाही की नीयत किसान को वास्तविक लाभ पहुंचाने की नहीं होगी, तब तक योजनाओं का पूरा लाभ किसानों तक नहीं पहुंचेगा। यही स्थिति प्रदेश में कई जगह दिखाई देती है। सरकार चाहे तो किसान कल्याण वर्ष में इस मामले की उच्च अधिकारियों से जांच कराकर किसानों और लापरवाह अधिकारियों—दोनों को स्पष्ट संदेश दे सकती है ।
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