दापोली में रिटायर्ड इंजीनियर ने काजू-आम-पान की प्राकृतिक खेती से बनाया इको-टूरिज्म मॉडल
04 नवंबर 2026, दापोली (रत्नागिरी): दापोली में रिटायर्ड इंजीनियर ने काजू-आम-पान की प्राकृतिक खेती से बनाया इको-टूरिज्म मॉडल – कोंकण क्षेत्र के दापोली में अपनी पैतृक ज़मीन पर 57 वर्षीय विजय कुमार दोंगरे बिना किसी रासायनिक खाद या कीटनाशक के काजू, आम और पान की खेती कर रहे हैं। लगभग तीन साल पहले खेती से जुड़ी शुरुआत करने वाले दोंगरे ने अपनी ज़्यादातर ज़िंदगी वसई में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का कारोबार चलाने में बिताई, जिसका टर्नओवर करीब 30 से 35 लाख रुपये रहा।
रिटायरमेंट के बाद प्रकृति से जुड़ने की चाह में दोंगरे दापोली वाली पैतृक ज़मीन पर लौटे और धीरे-धीरे खेती को पुनर्जीवित करने लगे। उनके खेत में फिलहाल 750 से अधिक काजू के पेड़ और अल्फांसो व रत्ना किस्म के आम के करीब 100 पेड़ हैं, जिनमें फल आना शुरू हो चुका है। हाल ही में उन्होंने पान की बेल की खेती भी शुरू की है।
जंगल काटे बिना प्राकृतिक खेती का तरीका
दोंगरे का तरीका पारंपरिक गहन खेती से अलग है। वे जंगल को काटने के बजाय, जहां ज़मीन प्राकृतिक रूप से खाली है, वहीं पौधे लगाते हैं। वे कहते हैं कि वे ज़्यादा पैदावार या बाज़ार के दबाव के लिए खेती नहीं करते, बल्कि ज़मीन पर ज़बरदस्ती किए बिना उसे समय और सम्मान देते हैं।
उनका मानना है कि खेती सिर्फ विज्ञान नहीं, बल्कि धैर्य और अपनी ज़मीन को समझने की एक कला है। फिलहाल खेती से होने वाली आय सीमित है, क्योंकि ज़्यादातर पेड़ अभी शुरुआती विकास के दौर में हैं, लेकिन काजू और आम से अगले एक से दो साल में बेहतर उत्पादन की उम्मीद है।
आगे की योजना में भुने हुए पारंपरिक काजू, आम का अचार व प्रिज़र्व और पान से जुड़े उत्पाद बेचना शामिल है। इसके साथ ही वे काजू के बागानों के बीच मिट्टी के घर बनाकर एक ग्रामीण वेलनेस रिट्रीट शुरू करने की योजना पर भी काम कर रहे हैं, जिसमें उनकी पत्नी और बेटी, जो दोनों डॉक्टर हैं, भी दिलचस्पी ले रही हैं। दोंगरे आसपास के किसानों को भी प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
शहर के कारोबार से गांव की ज़मीन तक का सफर
दोंगरे का यह बदलाव किसी एक दिन में नहीं आया। दशकों तक वसई में बिजली के उपकरणों का कारोबार चलाने के बाद, उन्होंने महसूस किया कि दापोली की पैतृक ज़मीन लंबे समय से बिना किसी देखभाल के पड़ी थी। कोंकण की यह ज़मीन समुद्र किनारे की नमी वाली आबोहवा के लिए जानी जाती है, जो काजू और आम की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती है।
शुरुआत में उन्होंने सिर्फ मौजूदा पेड़ों की देखभाल पर ध्यान दिया, ताकि यह समझ सकें कि ज़मीन किस तरह की फसल और किस तरह के तरीके को सहजता से अपनाती है। धीरे-धीरे उन्होंने नए पौधे लगाना शुरू किया और खेती को पूरी तरह रासायनिक-मुक्त रखने का फैसला किया, भले ही इसमें शुरुआती वर्षों में उत्पादन धीमा रहा हो।
दोंगरे कहते हैं कि उनके लिए खेती सिर्फ कमाई का ज़रिया नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी के लिए ज़मीन को बचाने का एक तरीका भी है। यही सोच उन्हें आसपास के उन किसानों से अलग करती है जो जल्दी नतीजों के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भर रहते हैं।
कोंकण क्षेत्र में काजू और आम लंबे समय से किसानों की आय का मुख्य स्रोत रहे हैं, लेकिन ज़्यादातर बागान पुराने तरीकों और भारी रासायनिक इनपुट पर निर्भर रहे हैं। दोंगरे जैसे किसान, जो शहर की नौकरी या कारोबार छोड़कर खेती में लौटे हैं, इस क्षेत्र में प्राकृतिक खेती और कृषि-पर्यटन को जोड़ने का एक नया उदाहरण पेश कर रहे हैं, जिससे आमदनी के अतिरिक्त ज़रिए भी बनते हैं। दोंगरे का कहना है कि जो भी रिटायरमेंट के बाद खेती में आना चाहते हैं, उन्हें शुरुआत में ही जल्दी मुनाफे की उम्मीद छोड़कर ज़मीन को समझने के लिए समय देना चाहिए। उनका यह भी मानना है कि छोटे किसान अगर अपनी ज़मीन पर मौजूद पुराने पेड़ों और प्राकृतिक संसाधनों को बिना नुकसान पहुंचाए इस्तेमाल करें, तो खेती के साथ कम लागत में अतिरिक्त आय के रास्ते भी खुल सकते हैं।
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