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राज्य कृषि समाचार (State News)

48°C तापमान और सूखे की मार, बीमा भुगतान में देरी से महाराष्ट्र के मौसंबी किसान परेशान

11 नवंबर 2025, भोपाल: 48°C तापमान और सूखे की मार, बीमा भुगतान में देरी से महाराष्ट्र के मौसंबी किसान परेशान – महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में नींबू (मीठा नींबू/मौसंबी) उत्पादक किसानों को अनियमित मौसम और बीमा दावों के विलंबित भुगतान के कारण भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। नागपुर जिले के कई बागवानों ने शिकायत की है कि सरकार की री-स्ट्रक्चर्ड वेदर बेस्ड क्रॉप इंश्योरेंस स्कीम (RWBCIS) के तहत उन्होंने प्रीमियम तो भरा, लेकिन दावे या तो अस्वीकार कर दिए गए या समय पर भुगतान नहीं हुआ।

यह योजना वर्ष 2016 में शुरू की गई थी और अब इसे 2025–26 तक बढ़ाया गया है, जिसकी कुल लागत लगभग ₹71,810 करोड़ है। इसका उद्देश्य किसानों को मौसम से होने वाले नुकसान से सुरक्षा प्रदान करना है, लेकिन किसानों का कहना है कि योजना का लाभ ज़मीन पर नहीं मिल पा रहा है।

नरसिंगी गांव के एक किसान ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2023 में अपनी 50 टन मौसंबी फसल के लिए लगभग ₹5,160 का बीमा प्रीमियम भरा था। लेकिन ओलावृष्टि के कारण फसल को भारी नुकसान हुआ और बीमा दावा अस्वीकार कर दिया गया। उन्होंने कहा, “हमें न तो कोई संदेश मिलता है और न ही अस्वीकृति का कारण बताया जाता है। हम बाद में बस यह जान पाते हैं कि दावा खारिज हो गया।”

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विदर्भ के कई किसानों ने पिछले कुछ वर्षों में संतरे की जगह मौसंबी की खेती शुरू की है। बदलते मौसम और बढ़ते तापमान के कारण संतरे की पैदावार घटने लगी थी। मौसंबी की फसल 40–50% कम पानी में तैयार होती है और यह क्षेत्र की अर्ध-शुष्क जलवायु में बेहतर ढंग से फलती-फूलती है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा मौसंबी उत्पादक राज्य है। वर्ष 2023–24 में राज्य में 77,700 हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 9.44 लाख टन मौसंबी उत्पादन दर्ज किया गया।

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हालांकि, अब मौसंबी की फसल भी मौसम के प्रभाव से सुरक्षित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में लू, सूखा और अनियमित वर्षा ने बागवानी को गहराई से प्रभावित किया है। वर्ष 2019 के सूखे में विदर्भ के लगभग 60% संतरे के बाग नष्ट हो गए, जिससे करीब ₹1,668 करोड़ का नुकसान हुआ। अब क्षेत्र में तापमान 48°C तक पहुंच रहा है और औसत वार्षिक वर्षा मात्र 705 मिलीमीटर रह गई है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है।

सरकारी कृषि महाविद्यालय, चौरई के एक कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि बदलते मौसम से फूल आने की प्रक्रिया पर असर पड़ा है और कीट रोगों का दबाव भी बढ़ गया है। उन्होंने कहा, “पहले पेड़ हर साल समान रूप से फूलते थे, लेकिन अब एक मौसम में फूल आते हैं और अगले में नहीं, चाहे सिंचाई अच्छी ही क्यों न हो।”

बीमा योजना में किसानों की भागीदारी भी लगातार घट रही है। वर्ष 2018 में 1.15 लाख से अधिक किसानों ने अपनी फसलों का बीमा कराया था, जिनकी कुल कीमत करीब ₹1.25 लाख करोड़ थी। लेकिन वर्ष 2024 तक यह संख्या घटकर 48,519 किसान रह गई। नागपुर जिले में भागीदारी 2,387 से घटकर सिर्फ 753 किसानों तक सीमित रह गई और वर्ष 2024 में एक भी दावा भुगतान नहीं हुआ।

किसानों ने बीमा दावों के तेज़ और पारदर्शी निपटान की मांग की है। एक किसान ने कहा, “जब फसल नष्ट होती है तो किसान को तुरंत पैसे की जरूरत होती है ताकि अगली बुवाई की तैयारी कर सके। अगर 2022 का दावा 2025 में मिले तो उसका कोई मतलब नहीं रहता।”

विदर्भ के मौसंबी उत्पादक किसानों के सामने अब गर्मी, सूखे और बीमा की असुरक्षा जैसी चुनौतियाँ एक साथ खड़ी हैं। इन परिस्थितियों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मौसंबी की खेती भविष्य में इस क्षेत्र के लिए टिकाऊ रह पाएगी।

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