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राज्य कृषि समाचार (State News)

धान में पत्ती झुलसा और जीवाणु झुलसा रोग से किसान परेशान, वैज्ञानिकों ने सुझाई दवा

30 अक्टूबर 2026, कटक (ओडिशा): धान में पत्ती झुलसा और जीवाणु झुलसा रोग से किसान परेशान, वैज्ञानिकों ने सुझाई दवा – धान की फसल पर कीटों के साथ-साथ अब कुछ रोगों का खतरा भी मंडरा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक ने अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े की सलाह में पत्ती झुलसा यानी लीफ ब्लास्ट और जीवाणु झुलसा यानी बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक रोग को लेकर किसानों को आगाह किया है।

संस्थान के मुताबिक पत्ती झुलसा रोग में पौधे की पत्तियों पर धुरी के आकार के भूरे धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में बढ़कर पूरी पत्ती को सुखा देते हैं। बादल छाए रहने, हल्की बारिश और ठंडी रातों वाले मौसम में यह रोग तेजी से फैलता है, और समय पर नियंत्रण न हो तो पूरी फसल की बढ़वार रुक सकती है।

पत्ती झुलसा रोग में इन दवाओं का इस्तेमाल करें

नियंत्रण के लिए संस्थान ने टेबुकोनाजोल 50 फीसदी और ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन 25 फीसदी के मिश्रण वाली दवा को 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़कने की सलाह दी है। इसके अलावा एडिफेनफॉस 50 ईसी को 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में या ट्राइसाइक्लाजोल 75 डब्ल्यूपी को 0.6 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर भी छिड़काव किया जा सकता है।

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जो किसान रासायनिक दवाओं से बचना चाहते हैं, उनके लिए संस्थान ने एक देसी विकल्प भी सुझाया है। बेल या तुलसी की ताजी पत्तियों को 25 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से, या नीम की पत्तियों को 200 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से पीसकर अर्क तैयार कर छिड़का जा सकता है।

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जीवाणु झुलसा रोग में पत्तियों पर लंबी, पानी से भरी धारियां बनती हैं, जो बाद में भूरे रंग की हो जाती हैं। यह रोग खेत में ज्यादा नमी और घने पौधों वाली स्थिति में तेजी से फैलता है। संस्थान ने इसके लिए प्लांटोमाइसिन को 1 ग्राम प्रति लीटर पानी के साथ कॉपर ऑक्सीक्लोराइड को भी 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर, प्रति एकड़ करीब 200 लीटर घोल की दर से छिड़कने की सलाह दी है।

संस्थान ने यह भी बताया कि धान की बालियों पर फाल्स स्मट नाम की समस्या भी इस समय देखी जा रही है, जो बूट लीफ अवस्था में फसल को प्रभावित करती है। इसके लिए कॉपर हाइड्रॉक्साइड 77 फीसदी को 400 ग्राम प्रति एकड़ की दर से, या टेबुकोनाजोल 25 फीसदी को भी 400 ग्राम प्रति एकड़ की दर से बूट लीफ अवस्था पर छिड़कने और सात दिन बाद दोबारा छिड़कने की सलाह दी गई है।

इन सभी रोगों की पहचान के लिए संस्थान ने किसानों से कहा है कि खेत में हल्के लक्षण दिखते ही छिड़काव शुरू कर दें, क्योंकि रोग बढ़ जाने के बाद नियंत्रण मुश्किल हो जाता है। जिन किसानों को अपनी फसल में किसी असामान्य लक्षण का पता चले लेकिन समझ न आए कि समस्या क्या है, उनसे कहा गया है कि वे नमूना लेकर संस्थान की राइस हेल्थ क्लिनिक में दिखा सकते हैं।

संस्थान ने यह भी स्पष्ट किया है कि दवा के छिड़काव के दौरान सिफारिश की गई मात्रा से ज्यादा दवा का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इससे न सिर्फ लागत बढ़ती है बल्कि फसल और मिट्टी पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। ओडिशा समेत पूर्वी भारत के धान उत्पादक इलाकों के किसानों को सलाह दी गई है कि वे अगले कुछ दिनों तक अपने खेतों पर नियमित नजर बनाए रखें।

खेत में नमी और घनी बुवाई से बढ़ता है खतरा

वैज्ञानिकों के मुताबिक जिन खेतों में पौधों के बीच आपस में ज्यादा दूरी नहीं रखी गई है, वहां हवा का सही आवागमन नहीं हो पाता और नमी ज्यादा समय तक पत्तियों पर टिकी रहती है। इसी वजह से ऐसे खेतों में पत्ती झुलसा और जीवाणु झुलसा रोग ज्यादा तेजी से फैलते हैं।

इससे बचने के लिए संस्थान ने सलाह दी है कि आगे की बुवाई में पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखें, और खेत में जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन खाद का इस्तेमाल न करें, क्योंकि ज्यादा नाइट्रोजन से भी पौधे इन रोगों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं। जिन खेतों में सिंचाई की नालियां ठीक से बनी हों, वहां पानी जल्दी निकल जाता है और रोग फैलने का खतरा कम रहता है।

वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि बीमारी की शुरुआती पहचान बहुत जरूरी है। अगर खेत के किसी एक हिस्से में भी लक्षण दिखें, तो पूरे खेत में छिड़काव करने के बजाय पहले उस हिस्से पर ध्यान देना चाहिए, ताकि रोग आगे न फैले और दवा का खर्च भी नियंत्रण में रहे। आने वाले दिनों में नमी और बादल बने रहने की स्थिति में किसानों को विशेष रूप से सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

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