सोयाबीन के खाद्य उपयोग हेतु जागरूकता पर कृषक संगोष्ठी आयोजित

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25 अप्रैल 2022, इंदौर ।  सोयाबीन के खाद्य उपयोग हेतु जागरूकता पर कृषक संगोष्ठी आयोजित – भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान ,इंदौर , आई टी सी तथा सोलिडेरीडेड के संयुक्त प्रयास से रविवार को सोयाबीन के खाद्य उपयोग हेतु जागरूकता विषय पर ऑनलाइन कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।  इस कृषक संगोष्ठी में  आयोजकों से जुड़े लगभग 1200 से अधिक सोया कृषक/महिलाओं ने भाग लिया।

अन्नदाता देवो भव: अभियान के अंतर्गत आयोजित की जा रही इस कृषक संगोष्ठी  के प्रारंभ में संस्थान के श्री श्याम किशोर वर्मा ने सभी उपस्थितों का स्वागत कर प्रस्तावना प्रस्तुत की।  संस्थान की कार्यवाह निदेशक डॉ नीता खांडेकर ने बताया कि देश की ग्रामीण जनता के भोजन में प्रोटीन की कमी एक मुख्य समस्या है , जिसके लिए भोजन में सोयाबीन आधारित खाद्य पदार्थों का समावेश एक सार्थक विकल्प है। इस क्षेत्र में उद्यमिता विकास एवं आय वृद्धि की अपार संभावनाएं हैं, जिसका दोहन किया जाना चाहिए।  इस अवसर पर आई.टी.सी. लिमिटेड, मध्य प्रदेश के श्री भुवनेश तथा सोलिडेरीडेड, भोपाल के प्रबंधक डॉ सुरेश मोटवानी ने संस्थान के साथ तकनीकी  हस्तांतरण के क्षेत्र में मिलकर किये जा रहे कार्यक्रमों की जानकारी देकर संस्थान द्वारा विकसित तकनीकी को अपनाकर सोयाबीन उत्पादन में वृद्धि करने वाले  कृषकों की  प्रशंसा की।

इस संगोष्ठी के प्रमुख वक्ता डॉ विनीत  कुमार, प्रधान वैज्ञानिक ने  बताया कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूट्रीशन, हैदराबाद की एक रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश की अधिकतर जनता में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रमाणित प्रति किग्रा शारीरिक वजन के लिए आवश्यक प्रति ग्राम प्रोटीन की पूर्ति नहीं हो रही है,अतःसोयाबीन आधारित प्रोटीन एक अच्छा विकल्प है। प्रोटीन के साथ साथ सोयाबीन में और भी कई पौष्टिक एवं औषधीय गुण है जिसका लाभ लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सोयाबीन में उपलब्ध अपौष्टिक कुनित्ज़ ट्रिप्सिन इन्हिबिटर तथा सोयाबीन आधारित खाद्य पदार्थो से आने वाली विशिष्ट प्रकार की गंध के कारण अभी तक इसके खाद्य उपयोग लोकप्रिय नहीं होने पर उन्होंने संस्थान की अन्य वैज्ञानिक डॉ अनीता रानी के साथ मिलकर विगत 15 वर्षों तक इस बाबत गहन अनुसन्धान कार्य किये।  भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान,इंदौर  द्वारा देश में सबसे पहले सोयाबीन में मौजूद अपौष्टिक कुनित्ज़ ट्रिप्सिन इन्हिबिटर मुक्त किस्म एन.आर.सी 127 के विकास में सफलता प्राप्त की, है जो औसतन 103 दिनों में परिपक्व होने के साथ -साथ सूखा एवं अधिक वर्षा की प्रतिकूल स्थिति में सामना करने के  लिए सक्षम है । इसी प्रकार डॉ विनीत कुमार द्वारा पिछले वर्ष अधिसूचित हुई एक अन्य सोयाबीन किस्म एन.आर. सी. 142 का विकास किया है , जो सोयाबीन की विशिष्ट गंध के लिए कारक “लायपोक्सीजिनेज-2 अम्ल से मुक्त होने के अलावा अपौष्टिक कुनित्ज़ ट्रिप्सिन इन्हिबिटर से भी मुक्त है।  भारत सरकार द्वारा इसी वर्ष अधिसूचित 95 दिनों की समयावधि में पककर औसतन 2  टन/हेक्टेयर उत्पादन क्षमता वाली इस किस्म में पीला मोज़ेक एवं चारकोल रॉट जैसी बीमारियों  के लिए प्रतिरोधी गुण हैं। उन्होंने एक अन्य सोयाबीन किस्म एन.आर.सी. 147 के बारे में भी चर्चा की जिसमें ओलिक अम्ल की मात्रा अत्यधिक है।

इस संगोठी के अन्य वक्ता डॉ बी.यू. दुपारे ने कहा  कि प्रोटीन के साथ साथ सोयाबीन में और भी कई पौष्टिक एवं औषधीय गुण है, जिससे सोयाबीन को एक परिपूर्ण फंक्शनल फ़ूड प्लांट  कहा जा सकता है। प्रोटीन से भरपूर सोयाबीन का उपयोग भोजन के रूप में किया जाना चाहिए। आपने सोयाबीन के विभिन्न खाद्य पदार्थ एवं घरेलू स्तर पर बनाये जाने वाले व्यंजन जैसे सोया दूध, सोया पनीर, सोया आटा, सोया नमकीन, सोया पकौड़े तथा सोया आधारित अन्य पौष्टिक खाद्य जैसे सेव, मठरी, पापड़, बिस्कुट, चकली, शक्करपारे, उपमा, हलवा, गुलाब जामुन आदि की प्रसंस्करण तकनीक  की जानकारी दी.।

डॉ. दुपारे ने कहा कि  दही/दूध, नमकीन आदि के पौष्टिक गुणों में वृद्धि करने लिए औपचारिक रूप से सोयाबीन का मिश्रित उपयोग किया जा सकता है। संगोष्ठी में शामिल महिला कृषकों से उपयुक्त सोयाबीन किस्मों की खेती कर  सोयाबीन को घरेलु खाद्य उपयोग में लेने की अपील करते हुए संस्थान में स्थापित एग्री बिजनेस इन्क्यूबेशन केंद्र द्वारा बनाये जा  रहे सोया आधारित खाद्य पदार्थो की प्रसंस्करण तकनीकी एवं उद्यमिता विकास/स्टार्ट अप कार्यक्रम की सुविधा की जानकारी भी दी। संगोष्ठी में शामिल दर्शकों एवं श्रोताओं  के प्रश्नों एवं समस्याओं पर सार्थक चर्चा से निराकरण भी किया गया।  अंत में , धन्यवाद ज्ञापन श्री रामेन्द्र नाथ श्रीवास्तव द्वारा किया गया।

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