राज्य कृषि समाचार (State News)

फर्टिगेशन के माध्यम से उर्वरकों का संतुलित और कुशल उपयोग

लेखक: योगेश राजवाड़े, नरेन्द्र सिंह चंदेल, दिलीप जाट, रविन्द्र रंधे, दिव्या राठोड, भा.कृ.अनुं. प. केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल

27 अप्रैल 2026, भोपाल: फर्टिगेशन के माध्यम से उर्वरकों का संतुलित और कुशल उपयोग – फर्टिगेशन एक ऐसी आधुनिक कृषि तकनीक है जिसमें पानी में घुलनशील उर्वरकों को सिंचाई प्रणाली (जैसे: ड्रिप या माइक्रो-स्प्रिंकलर) के माध्यम से सीधे फसलों तक पहुँचाया जाता है। यह विधि पौधों की जड़ों के सक्रिय क्षेत्र में पोषक तत्वों की सटीक और समान आपूर्ति सुनिश्चित करती है। फर्टिगेशन में उर्वरकों का प्रयोग पौधों की वृद्धि के विभिन्न चरणों और उनकी दैनिक जल आवश्यकता के अनुसार किया जाता है, जिससे उर्वरकों का अधिकतम उपयोग संभव होता है और पोषक तत्वों का भूजल में रिसाव (लीचिंग) कम हो जाता है।

इसके परिणामस्वरूप फसल की उपज बढ़ती है, गुणवत्ता बेहतर होती है और पौधों का विकास स्वस्थ रूप से होता है। साथ ही, यह तकनीक पानी, श्रम और रसायनों की बचत करती है, जिससे यह टिकाऊ (सस्टेनेबल) और उच्च दक्षता वाली सटीक खेती (प्रिसिजन फार्मिंग) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। जब हम सूखे उर्वरक को हाथ से पूरे खेत में छिड़कते हैं, तो फसल उसका आधे से भी कम हिस्सा ही उपयोग कर पाती है। बाकी उर्वरक या तो पानी के साथ बह जाता है, हवा में उड़ जाता है या खरपतवार (घास) को पोषण देता है। फर्टिगेशन इस समस्या का समाधान करता है और आपके पैसे की बचत करता है। यह इस प्रकार काम करता है:

  1. पोषण को सीधे जड़ों तक पहुँचानामहंगा उर्वरक पूरे खेत में फैलाने के बजाय, ड्रिप फर्टिगेशन पौधे के ठीक नीचे एक छोटे, गीले क्षेत्र में तरल पोषण पहुँचाता है। इसका मतलब है कि आपकी फसल को उर्वरक मिलता है और पंक्तियों के बीच की खाली जमीन को कुछ नहीं मिलता। आपका उर्वरक केवल फसल को पोषण देता है, खरपतवार को नहीं।
  2. नियमित अंतराल पर पोषक तत्व देनापौधों को इंसानों की तरह समझें—आप एक ही दिन में पूरे महीने का खाना नहीं खाते। पारंपरिक खेती में एक बार में भारी मात्रा में उर्वरक डाल दिया जाता है, जिससे पौधों को झटका लग सकता है। फर्टिगेशन में आप पौधों को थोड़ा-थोड़ा पोषण हर कुछ दिनों में दे सकते हैं, ठीक जब उन्हें जरूरत होती है और जब वे बढ़ रहे होते हैं। फर्टिगेशन में फसल के विभिन्न विकास चरणों (जैसे वृद्धि अवस्था में अधिक नाइट्रोजन, फलन अवस्था में अधिक पोटाश) के अनुसार पोषक तत्वों की मात्रा को सटीक रूप से बदला जा सकता है।
  3. आसान अवशोषणपौधे अपना भोजन “पीते” हैं, चबाते नहीं। जब सूखा उर्वरक जमीन पर डाला जाता है, तो पौधों को उसे घुलने के लिए बारिश या ज्यादा सिंचाई का इंतजार करना पड़ता है। फर्टिगेशन में उर्वरक पहले से ही पानी में घुला होता है, इसलिए जड़ें उसे तुरंत अवशोषित कर सकती हैं।
  4. उर्वरक की हानि को रोकनाफर्टिगेशन आपके पैसे को पर्यावरण में बर्बाद होने से बचाता है:
  5. बहकर जाने से बचाव: बाढ़ सिंचाई उर्वरक को जमीन में बहुत गहराई तक ले जाती है, जहाँ जड़ें नहीं पहुँच पातीं। ड्रिप फर्टिगेशन पोषक तत्वों को जड़ों के क्षेत्र में ही रखता है।
  6. वाष्पीकरण से बचाव: जब यूरिया सतह पर डाला जाता है, तो उसका काफी हिस्सा अमोनिया गैस बनकर उड़ जाता है। फर्टिगेशन में नाइट्रोजन सीधे गीली मिट्टी में जाता है और वहीं सुरक्षित रहता है।
  7. मिट्टी में फंसने से बचाव: फॉस्फोरस जैसे उर्वरक सूखी मिट्टी में फंस जाते हैं और पौधे उन्हें नहीं ले पाते। पानी के साथ घुलकर देने से ये पोषक तत्व उपलब्ध रहते हैं और जड़ें आसानी से इन्हें अवशोषित कर पाती हैं।

5. संचालन और श्रमदक्षता

  • श्रम की बचत: पारंपरिक विधियों में उर्वरक डालने के लिए मजदूर या ट्रैक्टर की जरूरत होती है। फर्टिगेशन इस प्रक्रिया को स्वचालित बना देता है और सिंचाई के साथ ही पोषण देता है।
  • मिट्टी के संघनन में कमी: बार-बार ट्रैक्टर या मशीनों के उपयोग से मिट्टी सख्त हो जाती है। फर्टिगेशन से इस आवश्यकता में कमी आती है, जिससे मिट्टी की संरचना बेहतर बनी रहती है।

6. कृषि संबंधी लाभ

  • खरपतवार नियंत्रण: ड्रिप फर्टिगेशन पानी और पोषक तत्व केवल पौधों की जड़ों के पास देता है, जिससे पंक्तियों के बीच की जमीन सूखी रहती है। इससे खरपतवार कम उगते हैं।
  • जड़ों को जलने से बचाव: सूखे उर्वरकों की अधिक मात्रा पौधों की जड़ों के पास होने से जड़ का जलना (रूट बर्न) हो सकता है। फर्टिगेशन में घुले हुए पोषक तत्व दिए जाते हैं, जिससे यह जोखिम समाप्त हो जाता है।

पोषक तत्व समकालिकता–

संतुलित पोषण प्रबंधन के लिए पूरे सीजन की कुल उर्वरक आवश्यकता को छोटे-छोटे लक्षित भागों (माइक्रो-डोज) में बांटना जरूरी होता है।

  • प्रारंभिक अवस्था (020 दिन):

इस चरण में मुख्य उद्देश्य जड़ों का मजबूत विकास करना होता है, विशेषकर गीले क्षेत्र के अंदर। इस समय कुल फॉस्फोरस (P) का अधिक भाग देना चाहिए, जबकि नाइट्रोजन (N) और पोटाश (K) की मात्रा कम रखनी चाहिए ताकि नाजुक पौधों को नुकसान (जलन) न हो।

  • शाकीय वृद्धि अवस्था (2140 दिन):

इस अवस्था में पौधों की पत्तियों का तेजी से विस्तार होता है, इसलिए नाइट्रोजन (N) की मांग सबसे अधिक होती है। इसी समय कुल नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा देना चाहिए, जिससे पौधों की ऊपर की वृद्धि (बायोमास) अच्छी हो सके।

  • फूल और फल बनने की अवस्था (4180 दिन):

इस चरण में पोषक तत्वों का संतुलन बदलना जरूरी है। नाइट्रोजन की मात्रा कम करनी चाहिए, ताकि पौधे पत्तियों के बजाय फूलों को गिराए बिना फल बनाने पर ध्यान दें। साथ ही, पोटाश (K) की मात्रा काफी बढ़ानी चाहिए, क्योंकि यह फल के विकास, गुणवत्ता और पानी के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

  • परिपक्वता अवस्था (81100 दिन):

इस अवस्था में उर्वरकों का प्रयोग धीरे-धीरे पूरी तरह बंद कर देना चाहिए, क्योंकि फसल अपने ऊतकों में संचित पोषक तत्वों का उपयोग करके अंतिम उत्पादन (हार्वेस्ट) पूरा करती है।

फर्टिगेशन के लिए उपकरण–

वेंचुरी इंजेक्टर (वैक्यूम सक्शन)

वेंचुरी इंजेक्टर माइक्रो-सिंचाई प्रणालियों में सबसे सामान्य और किफायती उपकरणों में से एक है। यह वेंचुरी प्रभाव पर काम करता है—जब पानी एक संकरे पाइप से गुजरता है तो दबाव में कमी आती है, जिससे एक वैक्यूम बनता है और यह वैक्यूम तरल उर्वरक को मुख्य पाइपलाइन में खींच लेता है।

    उपयुक्त उपयोग: छोटे सिस्टम, कम बजट और ऐसे सेटअप जहाँ थोड़ा दबाव कम होना स्वीकार्य हो।

    इंजेक्टर का आकार और उपयोग–

    इंजेक्टर का व्यासप्रेरक जल प्रवाह (पानी)सक्शन क्षमता (उर्वरक)उपयुक्त उपयोग
    3/4 इंच (25 मिमी)600 – 2,000 लीटर प्रति घंटा50 – 150 लीटर प्रति घंटाछोटे पॉलीहाउस, किचन गार्डन और कम प्रवाह वाले प्रयोगात्मक प्लॉट
    1 इंच (32 मिमी)2,000 – 7,000 लीटर प्रति घंटा200 – 450 लीटर प्रति घंटामध्यम आकार के खुले खेत और सामान्य ग्रीनहाउस सिस्टम
    1.5 इंच (50 मिमी)3,780 – 12,000 लीटर प्रति घंटा450 – 1,000 लीटर प्रति घंटाबड़े बाग (ऑर्चर्ड) और कई एकड़ की कतार वाली फसलें
    2 इंच (63 मिमी)6,600 – 30,000 लीटर प्रति घंटा1,000 – 2,300 लीटर प्रति घंटाछोटे पॉलीहाउस, किचन गार्डन और कम प्रवाह वाले प्रयोगात्मक प्लॉट
    • उर्वरक टैंक (बायपास प्रेशर टैंक)

    ये मजबूत (हेवी-ड्यूटी) और बंद (सील्ड) टैंक होते हैं, जिन्हें मुख्य पाइपलाइन (मेनलाइन) से एक बायपास लूप के माध्यम से जोड़ा जाता है। मुख्य पाइप पर लगा आंशिक रूप से बंद वाल्व दबाव में अंतर (प्रेशर डिफरेंस) उत्पन्न करता है, जिससे पानी टैंक के अंदर जाता है, उर्वरक के साथ मिल जाता है और फिर यह मिश्रण वापस मुख्य पाइपलाइन में प्रवाहित हो जाता है।

    उपयुक्त उपयोग: सरल और कम लागत वाले सिस्टम, जहाँ बिजली उपलब्ध नहीं होती और अधिक मात्रा (बल्क) में रसायन/उर्वरक देना होता है।

    सीमाएँ(ध्यान देने योग्य बात):

    टैंक में पोषक तत्वों की मात्रा समान नहीं रहती। शुरुआत में घोल बहुत अधिक सघन होता है और धीरे-धीरे पानी के साथ पतला होते-होते अंत में लगभग शून्य हो जाता है। इसी कारण यह सटीक वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता।

    उदाहरण:

    • रासायनिक एवं उर्वरक इंजेक्शन के लिए प्लास्टिक का 30 लीटर उर्वरक टैंक – भारत में ड्रिप सिंचाई प्रणालियों में उपयोग होने वाला एक सामान्य बायपास टैंक है।
    • प्रोपोर्शनल डोज़िंग पंप (पानी से संचालित)

    ये उपकरण बहते हुए पानी की गतिज ऊर्जा (काइनेटिक एनर्जि) का उपयोग करके एक आंतरिक पिस्टन को चलाते हैं। यह पिस्टन उर्वरक को खींचकर बहुत ही सटीक अनुपात (प्रोपोर्शन) में पानी के साथ मिलाता है। क्योंकि ये वॉल्यूमेट्रिक सिस्टम होते हैं, इसलिए मुख्य पाइपलाइन के प्रवाह या दबाव में बदलाव होने पर भी मिश्रण का अनुपात स्थिर रहता है।

    उपयुक्त उपयोग: उच्च सटीकता वाले शोध कार्य और जैविक फर्टिगेशन (जैसे LFOM), जहाँ घोल का अनुपात और प्रति वर्ग मीटर पोषक तत्वों की मात्रा बिल्कुल सही होनी चाहिए। इन उपकरणों को बिजली की आवश्यकता नहीं होती।

    प्रोपोर्शनल डोज़िंग पंप(इंजेक्टर विशिष्टताएँ)

    इंजेक्टर का व्यासप्रेरक जल प्रवाह (पानी)सामान्य डोज़िंग रेंज (%)सामान्य इंजेक्शन दर (LPH)उपयुक्त उपयोग
    3/4 इंच (20 मिमी)10 – 2,500 लीटर प्रति घंटा0.2% – 2.0%0.02 – 50 लीटर प्रति घंटाप्रयोगात्मक प्लॉट, ग्रीनहाउस और सटीक परीक्षण (जैसे 10 m² भिंडी की क्यारियाँ)
    1 इंच (25 मिमी / 32 मिमी)20 – 5,000 लीटर प्रति घंटा0.2% – 2.0%0.04 – 100 लीटर प्रति घंटामध्यम आकार के बाग और मध्यम स्तर की खुली खेत की कतार वाली फसलें
    1.5 इंच (40 मिमी)500 – 8,000 लीटर प्रति घंटा0.2% – 2.0%1.0 – 160 लीटर प्रति घंटाबड़े पैमाने की व्यावसायिक खेती और केंद्रीकृत फर्टिगेशन सिस्टम
    • ऑटोमेटेड IoT फर्टिगेशन कंट्रोलर

    उन्नत (एडवांस) सेटअप में IoT कंट्रोलर पूरे सिस्टम का “दिमाग” होते हैं। ये स्वयं उर्वरक इंजेक्ट नहीं करते, बल्कि इलेक्ट्रिक इंजेक्शन पंप और सोलनॉइड वाल्व को नियंत्रित करते हैं। ये मौसम के डेटा, फ्लो मीटर और विभिन्न सेंसर से मिलने वाली जानकारी के आधार पर पूरे फर्टिगेशन शेड्यूल को स्वचालित (ऑटोमेट) कर देते हैं।

    उपयुक्त उपयोग: स्मार्ट कृषि परियोजनाएँ, बड़े पैमाने पर दूरस्थ (रिमोट) प्रबंधन, और अलग-अलग क्षेत्रों के लिए सटीक शेड्यूलिंग नियंत्रण।

    उदाहरण:

    • कंट्रोलर स्टेशन क्लाउड-आधारित सॉफ़्टवेयर का उपयोग करता है, जिससे आप स्मार्टफोन या वेब ब्राउज़र के माध्यम से सिंचाई के विभिन्न ज़ोन की निगरानी (मॉनिटरिंग) और समायोजन (एडजस्टमेंट) कर सकते हैं।

    राज्य स्तरीय योजना: मध्य प्रदेश

    मध्य प्रदेश सरकार ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) के तहत “Sensor-Based Automation System for Fertigation”( फर्टिगेशन के लिए सेंसर- आधारित स्वचालन प्रणाली) नाम से एक विशेष पायलट प्रोजेक्ट को आधिकारिक रूप से स्वीकृति दी है। नीचे इस योजना के वित्तीय प्रावधान, र आवेदन प्रक्रिया का विवरण दिया गया है:

    1. वित्तीय प्रावधान एवं सब्सिडी संरचना

    तकनीक को मानकीकृत करने के लिए सरकार ने हार्डवेयर लागत और वित्तीय सहायता की सीमा निर्धारित की है:

    मानक इकाई लागत: एक पूर्ण सेंसर-आधारित ऑटोमेशन यूनिट की अनुमानित लागत ₹4 लाख निर्धारित की गई है।

    सब्सिडी दर: योजना के तहत लाभार्थी को 50% की फ्लैट सब्सिडी प्रदान की जाती है।

    अधिकतम वित्तीय सहायता: प्रति यूनिट अधिकतम ₹2 लाख तक की सहायता दी जाएगी।

    २. पात्रता एवं आवेदन प्रक्रिया

    योजना के पारदर्शी और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कुछ आवश्यक शर्तें निर्धारित की गई हैं:

    न्यूनतम भूमि आवश्यकता: लाभार्थी के पास कम से कम 0.25 हेक्टेयर कृषि भूमि होना अनिवार्य है।

    पोर्टल पंजीकरण: आवेदन केवल ऑनलाइन माध्यम से किए जाएंगे। लाभार्थियों को MPFSTS (Madhya Pradesh Farm Subsidy Tracking System) पोर्टल पर पंजीकरण करना होगा।

    चयन प्रक्रिया: यह एक पायलट प्रोजेक्ट है और प्रत्येक जिले में सीमित यूनिट्स उपलब्ध हैं, इसलिए अंतिम चयन पारदर्शी ऑनलाइन लॉटरी सिस्टम के माध्यम से किया जाएगा।

    ३. सत्यापन एवं भुगतान प्रक्रिया

    चयन के बाद कंट्रोलर, सेंसर और वाल्व की भौतिक स्थापना की जाएगी। संबंधित विभाग के अधिकारियों द्वारा इनका जियो-टैगिंग और सत्यापन किया जाएगा।

    इसके बाद सब्सिडी राशि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से सीधे लाभार्थी के बैंक खाते या अधिकृत उपकरण निर्माता को प्रदान की जाएगी।

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