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राज्य कृषि समाचार (State News)

बालाघाट : धान की फसल में रोग-कीट के प्रकोप पर कृषि विभाग की सलाह

18 सितंबर 2026, बालाघाट: बालाघाट : धान की फसल में रोग-कीट के प्रकोप पर कृषि विभाग की सलाह – जिले में धान की फसल में कहीं-कहीं रोग एवं कीट का प्रकोप दिखाई दे रहा है। इसे देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को धान के खेतों का नियमित निरीक्षण करने तथा रोग या कीट के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही नियंत्रण के उपाय अपनाने की सलाह दी है। धान की फसल में मुख्य रूप से ब्लास्ट, जीवाणु पत्ती झुलसा (बीएलबी) और भूरा माहू (बीपीएच) का प्रकोप नुकसानदायक हो सकता है। परियोजना संचालक आत्मा डॉ. रामनाथ पटेल ने किसानों को रोग एवं कीट की पहचान और नियंत्रण के संबंध में आवश्यक सलाह दी है।

ब्लास्ट रोग की पहचान और नियंत्रण– ब्लास्ट रोग में धान की पत्तियों पर कत्थई एवं पीले रंग के अंडाकार धब्बे दिखाई देते हैं। बाद में ये धब्बे बढ़कर आंख के आकार के हो जाते हैं। गंभीर प्रकोप की स्थिति में रोग बालियों और दानों तक पहुंच सकता है, जिसे नेक ब्लास्ट कहा जाता है। कृषि विभाग ने नाइट्रोजन का अधिक प्रयोग नहीं करने तथा नाइट्रोजन और पोटाश का संतुलित उपयोग करने की सलाह दी है। नियंत्रण के लिए ट्राईसाइक्लाजोल 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी की 120 से 150 ग्राम मात्रा को 150 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव किया जा सकता है। आवश्यकता होने पर 10 से 15 दिन बाद अनुशंसित दवा का पुनः छिड़काव किया जा सकता है।

जीवाणु झुलसा रोग में यूरिया से बचें – जीवाणु पत्ती झुलसा रोग में पत्तियों के किनारों पर पीली और कत्थई धारियां दिखाई देती हैं, जो धीरे-धीरे पूरी पत्ती को झुलसा देती हैं। सुबह के समय पत्तियों पर पीले रंग की जीवाणुमुक्त बूंदें भी दिखाई दे सकती हैं। रोग की स्थिति में खेत में जलभराव से बचने और पानी का स्तर नियंत्रित रखने की सलाह दी गई है। इस रोग के प्रकोप में यूरिया का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे रोग तेजी से फैल सकता है। नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी की 500 ग्राम तथा स्ट्रेप्टोसाइक्लिन की 15 से 20 ग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

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भूरा माहू के प्रकोप में खेत रखें सूखा– भूरा माहू धान का रस चूसने वाला कीट है, जो पौधों के निचले हिस्से में रहता है। शुरुआती अवस्था में इसका पता ऊपर से आसानी से नहीं चलता। प्रकोप बढ़ने पर पौधों की पत्तियां पीली और भूरी होकर सूखने लगती हैं तथा खेत में चकत्ते दिखाई दे सकते हैं। जलभराव वाले खेतों में इसके प्रकोप की संभावना अधिक रहती है। भूरा माहू दिखाई देने पर खेत का पानी निकालकर 3 से 4 दिन तक खेत को सूखा रखने की सलाह दी गई है।कीटनाशक का छिड़काव करते समय दवा पौधे के निचले हिस्से तक पहुंचना जरूरी है। प्रति एकड़ लगभग 150 से 200 लीटर पानी में अनुशंसित कीटनाशक का छिड़काव किया जाए। भूरा माहू के नियंत्रण के लिए पायमेट्रोजिन, डायनोटेफ्यूरोन, थायोमेथोक्साम, इमीडाक्लोप्रिड, फिप्रोनिल + ब्यूप्रोफेजिन अथवा ब्यूप्रोफेजिन + एसीफेट में से कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित किसी एक दवा का निर्धारित मात्रा में उपयोग किया जा सकता है।

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नियमित निरीक्षण से बचाई जा सकती है फसल–  कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे धान के खेतों का नियमित निरीक्षण करें और पत्तियों, तनों तथा पौधों के निचले हिस्से में रोग एवं कीट के लक्षणों पर विशेष ध्यान दें। प्रारंभिक अवस्था में रोग और कीट की पहचान कर नियंत्रण के उपाय अपनाने से फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। किसानों को उर्वरकों एवं कीटनाशकों का उपयोग केवल अनुशंसित मात्रा और आवश्यकता के अनुसार ही करने की सलाह दी गई है।

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