राज्य कृषि समाचार (State News)

सेब के साथ अब सलूणी का सफेद मक्का भी बनेगा किसानों की पहचान, जीआई टैग से बढ़ीं उम्मीदें

01 सितंबर 2026, भोपाल: सेब के साथ अब सलूणी का सफेद मक्का भी बनेगा किसानों की पहचान, जीआई टैग से बढ़ीं उम्मीदें – हिमाचल प्रदेश की पहचान भले ही सेब की खेती से जुड़ी हो, लेकिन राज्य की कई पारंपरिक फसलें भी किसानों की आजीविका और स्थानीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। चंबा जिले की सलूणी सफेद मक्का ऐसी ही पारंपरिक फसल है, जिसे जुलाई 2026 में भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिलने के बाद नई पहचान मिली है। इससे किसानों को देश के बड़े बाजारों तक पहुंच और उपज का बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद बढ़ी है।

जीआई टैग मिलने के बाद सलूणी क्षेत्र के किसानों में उत्साह है। इस वर्ष क्षेत्र में 150 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर सफेद मक्का की खेती की गई है। भांदल, संघणी और लंगेरा सहित आसपास के इलाकों में किसान लंबे समय से इसकी खेती करते आ रहे हैं। किसानों के अनुसार इस बार पिछले वर्ष की तुलना में खेती का रकबा और उत्पादन दोनों बढ़े हैं।

चंबा से पठानकोट तक रहती है मांग

सलूणी के सफेद मक्के की मांग केवल चंबा तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश के अन्य जिलों के अलावा डमटाल और पठानकोट के बाजारों में भी इसकी मांग रहती है। जीआई टैग मिलने के बाद किसानों को उम्मीद है कि इसकी पहचान प्रदेश से बाहर भी मजबूत होगी और बाजार का विस्तार होगा।

देसी बीजों से आज भी होती है खेती

सलूणी सफेद मक्का की सबसे बड़ी खासियत इसकी पारंपरिक खेती और देसी बीजों का संरक्षण है। किसान पीढ़ियों से चले आ रहे स्थानीय बीजों का इस्तेमाल करते हैं। इन बीजों को सुरक्षित रखने के लिए कई किसान आज भी मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करते हैं। इससे पारंपरिक बीजों की शुद्धता और गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है।

किसानों का मानना है कि जीआई टैग से सलूणी सफेद मक्का को राष्ट्रीय बाजार में अलग पहचान मिल सकती है। यदि मांग बढ़ती है और किसानों को बेहतर दाम मिलता है, तो आने वाले वर्षों में इसकी खेती का रकबा बढ़ने के साथ पारंपरिक फसल किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत जरिया बन सकती है।

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