ब्रोकली की उन्नत खेती
लेखक: योगेष आनंद राजवाड़े, रविंद्र रँधे, सुनियोजित कृषि विकास केंद्र, भा.कृ.अनु.प.-केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, नवी बाग बैरसिया रोड, भोपाल
23 अक्टूबर 2026, भोपाल: ब्रोकली की उन्नत खेती –
प्रस्तावना
ब्रोकली गोभीवर्गीय सब्जियों के अंतर्गत आने वाली प्रमुख फसल हैं। इसका मूलतः सब्जी, सूप एवं सलाद के रूप में उपयोग किया जाता है। भारत चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा ब्रोकली उत्पादक देश हैं। भारत में ब्रोकली का उत्पादन लगभग 7.89 मिलियन टन होता हैं। भारत के प्रमुख ब्रोकली उत्पादक राज्य पष्चिम बंगाल, बिहार, ओडिषा, मध्यप्रदेष, हरियाणा, गुजरात एवं झारखण्ड हैं।
ब्रोकली मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं। स्प्राउटिंग ब्रोकली एवं हेडिंग ब्रोकली। हेडिंग ब्रोकली फूलगोभी की तरह होती हैं। यह प्रमुखतया हरे, श्वेत एवं बैंगनी रंग में पायी जाती है। भारत में हरे रंग की ब्रोकली अधिक लोकप्रिय हैं। ब्रोकली में विटामिन (ए एवं सी) और खनिज (कैल्षियम, फास्फोरस, आयरन एवं पोटेशियम) प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। इसके अलावा इसमें राइबोफ्लेविन, नियासिन एवं थायमिन पर्याप्त मात्रा में होते हैं। ब्रोकली में फूलगोभी से 130 गुना एवं पत्तागोभी से 22 गुना अधिक विटामिन ए होता हैं।
ब्रोकली की पौष्टिकता को देखते हुए महानगरों में इसकी मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं, परन्तु वर्तमान में इसकी खेती शहरी एवं बडे़ किसानों तक ही सीमित हैं। वर्तमान में छोटे शहरों एवं ग्रामीण किसानों में ब्रोकली की खेती एवं इसकी विपणन की जानकारी का आभाव हैं। यदि किसानों द्वारा ब्रोकली की खेती सही तरीके से की जाये तो यह आय में वृद्धि करने का अच्छा विकल्प बन सकती हैं।
मृदा एवं जलवायु
ब्रोकली की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं में की जा सकती हैं। परन्तु उचित जलनिकास वाली जीवांश पदार्थ युक्त बलुई दोमट मृदा सर्वोत्तम मानी जाती हैं, जिसका पी.एच. मान 6 से 7 के मध्य होता हैं। ब्रोकली ठंडी एवं आर्द्र जलवायु की फसल हैं। सामान्यतः इसकी खेती सर्दी के मौसम में अर्थात् सितंम्बर मध्य से फरवरी माह तक की जाती हैं, परन्तु ग्रीनहाउस जैसी नियंत्रित परिस्थितियों में ब्रोकली की फसल वर्षभर ली जा सकती हैं। पौधों की अच्छी वृद्धि एवं विकास के लिए तापमान लगभग 18-20 डिग्री सेल्सियस के मध्य होना चाहिए एवं बीज के अंकुरण के लिए मृदा का तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस उत्तम माना गया हैं।
उन्नत किस्में
ब्रोकली की प्रमुख किस्मों में पूसा ब्रोकली-1, के.टी.एस.-1, पालक समृद्धि, डी सिक्को, केलेब्रस, बालथम 29, ग्रीन स्प्राउटिंग मीडिया एवं संकर किस्मों में ग्रीन मैजिक, प्रीमियम क्रॉप, डेस्टिनी, मैराथन, ऐमेराल्ड, बेलस्टार, क्रोना, ग्रीन सर्फ, स्टिफ, ईस्टर्न मैजिक आदि प्रमुख हैं।
नर्सरी तैयार करना
ब्रोकली की पौध सितम्बर से अक्टूबर माह में तैयार की जा सकती हैं। इस हेतु बीज की 300-400 ग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा पर्याप्त होती हैं। नर्सरी तैयार करने हेतु प्लास्टिक नर्सरी ट्रे में मृदा रहित मीडिया कोकोपीट, वर्मीकुलाईट एवं परलाइट का मिश्रण क्रमश: 3:1:1 अनुपात में लिया जाता हैं। बुवाई से पूर्व बीजों को 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा या 5 ग्राम कार्बन्डाजिम से प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करना चाहिए। ट्रे में बीजों को बोने के पश्चात् पर्याप्त नमी देकर 3 से 6 दिनों के लिए पॉलीथीन से ढ़कना चाहिए। मिट्टी की 15 सेमी ऊँचाई, 3 से 4 मीटर लम्बाई एवं 1 मीटर चैड़ाई की मेढ़ या क्यारी बनाकर भी बीजो की बुवाई की जा सकती हैं। बुवाई के 25 से 30 दिनों के पश्चात् पौधे मुख्य खेत में रोपण करने हेतु तैयार हो जाते हैं।
खेत की तैयारी
खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए एवं उसके पश्चात् मिट्टी को भुरभुरा करने हेतु 1 से 2 जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए एवं अंतिम जुताई से पहले खेत में गोबर की खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए। खेत तैयार होने के पश्चात् नर्सरी में जब पौधे 4 से 5 सप्ताह के हो जाए तो उन्हेे ऊंची मेढ़ बनाकर 3 से 4 सेंटीमीटर की गहराई में रोपाई कर देनी चाहिए। रोपाई हेतु पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से 60 सेंटीमीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर उपयुक्त होती है। रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई अवश्य करनी चाहिए।
खाद एवं उर्वरक
सामान्यतः रोपाई के 25 से 30 दिन पहले मिट्टी में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद 8 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देनी चाहिए। ब्रोकली में खाद की अनुशंसित मात्रा 120:80:60 एन.पी.के कि.ग्रा./हे. होती हैं। फास्फोरस एवं पोटाश का आधा भाग एवं नत्रजन का एक चैथाई भाग रोपाई के समय देना चाहिए एवं शेष भाग को वेन्चुरी अथवा फर्टिलाइजर टैंक के माध्यम से टपक सिंचाई प्रणाली द्वारा घुलनशील अवस्था में प्रति सप्ताह दिया जाना चाहिए।
रोग एवं कीट प्रबंधन
नीचे सूची में ब्रोकली में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोंगो के नाम साथ ही उनकी रोकथाम में उपयोग होने वाले रसायन एवं उनकी मात्रा दी जा रही हैं-
| रोग एवं कीट | रसायन | मात्रा | टिप्पणी |
| रोग | |||
| आर्द्रगलन | ट्राइकोडर्मा विरिड़ी | 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज | बीज उपचार |
| काला विगलन | स्ट्रेप्टोसायक्लिन | 1 ग्राम प्रति 10 लीटर | पौध उपचार |
| पर्णचित्ति अंगमारी | डाइथेन एम.-45 | 2 ग्राम प्रति लीटर | खड़ी फसल पर |
| मुदकर मूलरोग | रोग प्रतिरोधक प्रजातियां लगाये | ||
| कीटः | |||
| माहू | इमिडाक्लोप्रिड | 0.3 एम. एल. प्रति लीटर | खड़ी फसल पर |
| डायमंडबैक मोथ | नीम बीज अर्क | 4 एम. एल. प्रति लीटर | खड़ी फसल पर |
| गोभी की तितली | बैसिलस थुरियनजीनिसस | 1 ग्राम प्रति लीटर | खड़ी फसल पर |







सिंचाई एवं खरपतवार नियंत्रण
सिंचाई जल की मात्रा फसल, मिट्टी की जलधारण क्षमता एवं जलवायु परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। ब्रोकली में सिंचाई हेतु सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली का उपयोग किया जा सकता है। इस विधि से सिंचाई करने हेतु 2 लीटर प्रति घंटा स्त्राव दर वाली इनलाइन ड्रिप लेटरल का प्रयोग करना चाहिए। इस विधि द्वारा प्रतिदिन अथवा एक दिन के अंतराल में फसल के अनुसार पानी दिया जाना चाहिए। टपक सिंचाई के माध्यम से 60 से 70 प्रतिशत जल की बचत एवं 20 से 25 प्रतिशत उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है एवं इस विधि में उर्वरकों का भी समुचित उपयोग होता हैं। खरपतवार नियंत्रण हेतु रोपाई के बाद डेढ़ से दो माह तक खरपतवार निकालते रहना चाहिए। खरपतवारों की रोकथाम के लिए खरपतवारनाशी फ्लुक्लोरेलिन का उपयोग 1 से 2 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600 लीटर पानी में घोल बनाकर रोपाई से 10-15 दिन पहले दिया जाना चाहिए।
सूक्ष्म सिंचाई विधि के साथ प्लास्टिक मल्चिंग का प्रयोग कर खरपतवार नियंत्रण एवं जल की बचत की जा सकती है, क्योंकि मल्चिंग अधिक वाष्पोत्सर्जन होने से बचाती है। मल्च के रूप में काले रंग की प्लास्टिक मल्च (20 से 25 माइक्रोन मोटाई) का प्रयोग अधिक प्रभावी होता हैं। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के साथ प्लास्टिक मल्च का प्रयोग कर उत्पादन में भी वृद्धि की जा सकती हैं।

फसल की कटाई एवं उपज
सामान्यतः ब्रोकली 65 से 80 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। मुख्य शीर्ष को 10 से 15 सेंटीमीटर तने के साथ काट लिया जाता हैं। कटाई के 10 से 15 दिनों पष्चात् नए षीर्ष दौबारा तैयार हो जाते हैं। इन्हें भी समय-समय पर काट लेना चाहिए। ब्रोकली की साधारण किस्मों से 75 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर एवं संकर किस्मों से 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है।
निष्कर्ष
यदि ब्रोकली की बढ़ती हुई मांग को देखते हुए व्यवसायिक तरीके से उन्नत खेती की जाए तो इससे अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। ब्रोकली की खेती ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे एवं सीमांत किसानों की आय में वृद्धि का अच्छा विकल्प हो सकता है।
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture


