भा.कृ.अनु.प.- खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर का अध्ययन
उपज हानि से उत्पादकता वृद्धि तक
उन्नत खरपतवार प्रबंधन तकनीकों का प्रभाव
24 अक्टूबर 2026, भोपाल: भा.कृ.अनु.प.- खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर का अध्ययन – खरपतवार जल, पोषक तत्व, प्रकाश और स्थान जैसे आवश्यक संसाधनों के लिए फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं और यदि इनका उचित प्रबंधन न किया जाए, तो फसल की उपज एवं किसानों के लाभ में कमी आती है। पिछले कई वर्षों से खरपतवारों का प्रकोप भारत में टिकाऊ फसल उत्पादन के प्रमुख अवरोधों में से एक रहा है।
इस समस्या की गंभीरता का स्पष्ट आकलन वर्ष 2018 में भा.कृ.अनु.प. खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर द्वारा किए गए एक अध्ययन से प्राप्त हुआ। इस अध्ययन में देश के विभिन्न कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना-खरपतवार प्रबंधन (AICRP-WM) के अंतर्गत वर्ष 2003-2014 के दौरान किए गए 1581 प्रक्षेत्र परीक्षणों के आधार पर प्रमुख फसलों में खरपतवारों के कारण औसत वास्तविक उपज हानि लगभग 25 प्रतिशत तथा इसके परिणामस्वरूप लगभग 11 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वार्षिक आर्थिक हानि का अनुमान लगाया गया था। उपज हानि विशेष रूप से मूंगफली (35.8%), सोयाबीन (31.4%), मूंग (30.8%), बाजरा (27.6%) और मक्का (25.3%) में अधिक पाई गई। इन आंकड़ों से स्पष्ट हुआ कि अपर्याप्त या समय पर खरपतवार नियंत्रण न होने के कारण फसल उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा प्रभावित हो रहा था।
खरपतवारों के कारण औसत उपज हानि केवल 13.43%
हालांकि, इसके बाद के लगभग 11 वर्षों में स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वर्ष 2026 में पुनः भा.कृ.अनु.प. खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर द्वारा किए गए नवीनतम आकलन में देशभर में वर्ष 2014-2024 के दौरान किए गए 1622 प्रक्षेत्र परीक्षणों के आधार पर खरपतवारों के कारण औसत उपज हानि केवल 13.43% आंकी गई। इस प्रकार, औसत उपज हानि में 11.57 प्रतिशत अंक की कमी दर्ज की गई, जो वर्ष 2018 के आकलन की तुलना में एक महत्वपूर्ण सुधार है। यह उपलब्धि भारत में खरपतवार प्रबंधन की दिशा में हुई महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाती है। नवीनतम अध्ययन में संबंधित फसलों के लिए खरपतवारों से होने वाली वार्षिक आर्थिक हानि लगभग 10.58 बिलियन अमेरिकी डॉलर आआंकी गई। यह वर्ष 2018 में अनुमानित 11 बिलियन अमेरिकी डॉलर की तुलना में कम है, जबकि नवीनतम अनुमान संबंधित फसलों के संशोधित एवं उच्चतर न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर किया गया है।
खरपतवार प्रबंधन के लिए विकल्प उपलब्ध
इस उल्लेखनीय सुधार का श्रेय किसी एक तकनीक को नहीं दिया जा सकता। पिछले वर्षों में किसानों को प्रभावी खरपतवार प्रबंधन के लिए विभिन्न विकल्प उपलब्ध हुए हैं, जिनमें बुवाई पूर्व एवं फसल उगने के बाद प्रयोग किए जाने वाले शाकनाशी, उन्नत शाकनाशी फॉर्मूलेशन, बेहतर छिडकाव तकनीक, यांत्रिक विधियां तथा विभिन्न सस्य एवं कृषि संबंधी प्रबंधन पद्धतियां शामिल है। विशेष रूप से, श्रमिकों की कमी अथवा हाथ से निराई-गुडाई की अधिक लागत एवं समय की आवश्यकता वाले क्षेत्रों में शाकनाशियों की बढ़ती उपलब्धता और अपनाने से खरपतवार नियंत्रण में महत्वपूर्ण सहायता मिली है। फसल खरपतवार प्रतिस्पर्धा की महत्वपूर्ण अवधि के दौरान समय पर खरपतवार नियंत्रण करने से खरपतवारों द्वारा जल, पोषक तत्व, प्रकाश एवं स्थान जैसे मूल्यवान संसाधनों के उपयोग को कम किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप फसल उपलब्ध संसाधनों का अधिक दक्षता से उपयोग करती है और उच्च उपज प्रदान करती है।
इस प्रकार उपज हानि में यह कमी किसी एक तकनीकी हस्तक्षेप का परिणाम न होकर बेहतर खरपतवार प्रबंधन तकनीकों, किसानों के ज्ञान एवं जागरूकता में वृद्धि, प्रभावी प्रसार सेवाओं तथा खरपतवार प्रबंधन तकनीकों की बेहतर उपलब्धता और अपनाने के संयुक्त परिणाम के रूप में देखी जानी चाहिए।
कृषि उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका
लगभग 11 वर्षों की अवधि में औसत उपज हानि को 25% से घटाकर 13.43% तक लाना यह दर्शाता है कि उन्नत खरपतवार प्रबंधन द्वारा फसल उत्पादन के एक महत्वपूर्ण हिस्से को सुरक्षित किया जा सकता है। भविष्य में समेकित खरपतवार प्रबंधन का व्यापक स्तर पर अपनाना, शाकनाशियों का विवेकपूर्ण एवं उचित उपयोग, समय पर खरपतवार नियंत्रण, किसानों में जागरूकता बढाना तथा प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण को और अधिक सुदृढ़ करना फसल खरपतवार प्रतिस्पर्धा को कम करने, उपज एवं आर्थिक हानियों को न्यूनतम करने तथा कृषि उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस प्रकार, प्रभावी खरपतवार प्रबंधन न केवल किसानों की आय और कृषि की लाभप्रदता बढ़ाने में सहायक होगा, बल्कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।
फसल की उपज में कमी को रोकने में बेहतर खरपतवार प्रबंधन की सफलता
खरपतवार वे अनचाहे पौधे हैं जो फसल के साथ उगते हैं। ये फसल के साथ पानी, खाद, धूप और जगह के लिए हौड़ करते हैं। यदि इन्हें समय पर नहीं हटाया जाए, तो फसल की बढ़वार कमजोर हो जाती है और पैदावार कम हो जाती है। इस कारण कई वर्षों से खरपतवार भारत में फसल की पैदावार कम होने का एक बड़ा कारण रहे हैं।
वर्ष 2018 में ICAR-निदेशालय खरपतवार अनुसंधान, जबलपुर द्वारा किए गए अध्ययन में बताया गया कि भारत की प्रमुख फसलों में खरपतवारों के कारण औसतन लगभग 25 प्रतिशत उपज का नुकसान हो रहा था। यह आंकड़ा वर्ष 2003-2014 के दौरान किए गए 1,581 खेत्त परीक्षणों पर आधारित था। इस कारण देश में हर साल लगभग 11 अरब अमेरिकी डॉलर की आर्थिक हानि होने का अनुमान लगाया गया था। मूंगफली में 35.8 प्रतिशत, सोयाबीन में 31.4. प्रतिशत, मूग में 30.8 प्रतिशत, बाजरा में 276 प्रतिशत और मक्का में 25.3 प्रतिशत तक उपज का नुकसान पाया गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट था कि खरपतवारों के कारण किसानों की फसल का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो रहा था।
आसान और प्रभावी तरीके उपलब्बा
इस बदलाव के पीछे कोई एक कारण नहीं है। पिछले वर्षों में किसानों को खरपतवार हटाने के कई आसान और प्रभावी तरीके उपलब्ध हुए हैं। इनमें खेत में खरपतवार निकलने से पहले और निकलने के बाद उपयोग की जाने वाली दवाएं, बेहतर दवाए, सही समय पर दवा का छिड़काव, हाथ से निराई-गुड़ाई, मशीनों से खरपतवार हटाना और फसल की अच्छी देखभाल जैसे तरीके शामिल है। खासकर जहां मजदूर आसानी से उपलब्ध नहीं होते या मजदूरी अधिक होती है, वहां खरपतवार की दवाओं ने किसानों को समय पर खरपतवार नियंत्रण में मदद की है। फसल की शुरुआती बढ़वार के समय खरपतवारों को समय पर नियंत्रित करने से फसल को पानी, खाद, धूप और जगह के लिए होने वाली होड़ से बचाया जा सकता है। इससे फसल को मिलने वाले संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है और पैदावार बढ़ती है।
इस सफलता में किसानों की बढ़ी हुई जानकारी, कृषि विभाग और कृषि वैज्ञानिकों की बेहत्तर सलाह, खेतों तक नई तकनीकों की पहुंच और खरपतवार नियंत्रण के बेहतर तरीकों का बढ़ता उपयोग महत्वपूर्ण रहा है। इसलिए उपज के नुकसान में आई कमी का श्रेय केवल खरपतवार की दवाओं को नहीं दिया जा सकता। यह बेहतर जानकारी, सही समय पर खरपतवार हटाने, नई तकनीकों और अलग-अलग तरीकों को मिलाकर अपनाने का परिणाम है।
25 प्रतिशत से घटकर 13.43 प्रतिशत तक पहुंचा उपज नुकसान पिछले लगभग 11 वर्षों में हुई इस प्रगति की एक बड़ी सफलता है। इससे किसानों की फसल का अधिक हिस्सा बचाने में मदद मिली है। हालांकि, कुछ फसलों में अभी भी खरपतवारों से काफी नुकसान हो रहा है, इसलिए आगे भी सुधार की जरूरत है। यदि किसान समय पर खरपतवार हटाने, सही मात्रा में खरपतवार की दवा का उपयोग करने, हाथ या मशीन से निराई करने और फसल की अच्छी देखभाल जैसे तरीकों को साथ-साथ अपनाए, तो खरपतवारों से होने वाले नुकसान को और कम किया जा सकता है। इससे फसल की पैदावार बढ़ेगी, आर्थिक नुकसान कम होगा और किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी।
खरपतवारों से सालाना आर्थिक हानि लगभग 10.58 अरब अमेरिकी डॉलर
लेकिन पिछले लगभग 11 वर्षों में इस स्थिति में काफी सुधार हुआ है। वर्ष 2026 में ICAR-निदेशालय खरपतवार अनुसंधान, जबलपुर द्वारा फिर से किए गए अध्ययन में वर्ष 2014-2024 के दौरान किए गए 1,622 खेत परीक्षणों के आधार पर पाया गया कि खरपतवारों के कारण औसत उपज का नुकसान घटकर केवल 13.43 प्रतिशत रह गया है। यानी लगभग 11 वर्षों में खरपतवारों से होने वाला औसत उपज नुकसान 25 प्रतिशत से घटकर 13.43 प्रतिशत हो गया। यह लगभग 46 प्रतिशत की कमी है। सरल शब्दों में कहें तो जो नुकसान पहले लगभग एक-चौथाई उपज का था, वह अब लगभग आधा रह गया है। यह भारत में खरपतवार नियंत्रण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वर्ष 2026 के अध्ययन में संबंधित फसलों में खरपतवारों से होने वाली सालाना आर्थिक हानि लगभग 10.58 अरब अमेरिकी डॉलर आकी गई, जो वर्ष 2018 के अनुमान से कम है I
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture


