रिटायरमेंट के बाद ओडिशा में बागवानी से नई शुरुआत, बिबेकानंद मिश्र के दो खेतों की कहानी
03 नवंबर 2026, भद्रक: रिटायरमेंट के बाद ओडिशा में बागवानी से नई शुरुआत, बिबेकानंद मिश्र के दो खेतों की कहानी – करीब 40 साल तक गुजरात, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में कॉर्पोरेट नौकरी करने के बाद रिटायर हुए बिबेकानंद मिश्र ने ओडिशा में खेती-बागवानी को अपना नया पेशा बना लिया है। मूल रूप से ओडिशा के रहने वाले मिश्र ने रिटायरमेंट के बाद देखा कि उनके इलाके में उपजाऊ जमीन खाली पड़ी है और गांव के युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, इसी ने उन्हें खेती की ओर मोड़ दिया।
उन्होंने अपनी खेती दो अलग-अलग खेतों में बांट रखी है—एक भद्रक जिले में पैतृक जमीन पर, और दूसरा ढेंकानाल जिले में नई खरीदी गई जमीन पर, जहां चक्रवात का खतरा तुलनात्मक रूप से कम है। मिश्र के इस सफर को उनके जीवन के इस पड़ाव पर जोश, तकनीक और मकसद के मेल के तौर पर देखा जा रहा है।
भद्रक में अमरूद, सुपारी और सागौन के बाग
भद्रक जिले की 10 एकड़ पैतृक जमीन पर मिश्र ने 2022 से बागवानी शुरू की। यहां उन्होंने 600 अमरूद के पेड़, 600 सुपारी के पेड़ और 4,000 से ज्यादा इमारती लकड़ी के पेड़ (महोगनी, चंदन और सागौन) लगाए हैं। इमारती लकड़ी के पेड़ों को उन्होंने जानबूझकर दीर्घकालिक निवेश के तौर पर चुना है, ताकि आने वाले वर्षों में अमरूद-सुपारी की नियमित आमदनी के साथ-साथ लकड़ी से भी बड़ी रकम मिल सके।
अमरूद के बाग से अब सालाना 15 से 20 क्विंटल फल की उपज मिल रही है। ढाई साल की अवधि में महोगनी के पेड़ 25 से 30 फुट और चंदन के पेड़ 5 से 8 फुट तक ऊंचे हो गए हैं, जो आगे लंबी अवधि की आय का जरिया बनेंगे।
ढेंकानाल में पॉलीहाउस और सैटेलाइट से निगरानी
ढेंकानाल जिले की 5 एकड़ जमीन पर मिश्र ने पॉलीहाउस, नेटहाउस और खुले खेत—तीनों तरीकों से खेती का मेल बनाया है। पॉलीहाउस में पाक चोई, लेट्यूस, चाइनीज कैबेज और तुलसी जैसी पत्तेदार सब्जियां उगाई जाती हैं, जबकि नेटहाउस में शिमला मिर्च और मौसमी टमाटर की खेती होती है।
इस खेत पर वे सैटेलाइट आधारित निगरानी, ड्रिप सिंचाई और कीट-रोग के पूर्वानुमान जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे रासायनिक छिड़काव की जरूरत घटी है। जनवरी 2025 से जनवरी 2026 तक के पहले पूरे साल में इस खेत से करीब 1 करोड़ रुपये के सकल कारोबार का अनुमान जताया गया है, हालांकि यह सिर्फ एक अनुमान है, अंतिम नतीजा नहीं।
खुले प्लॉट पर वे फसल चक्र अपनाते हैं, यानी एक ही जमीन पर बारी-बारी से अलग-अलग फसलें लगाई जाती हैं, जिससे मिट्टी की सेहत बनी रहती है और कीट-रोग का दबाव भी कम होता है। पॉलीहाउस और नेटहाउस की सुरक्षित खेती से मौसम की अनिश्चितता का असर भी कम हो जाता है, जो चक्रवात-प्रभावित ओडिशा जैसे राज्य में खासतौर पर अहम माना जाता है।
मिश्र कृषि विज्ञान केंद्रों और उद्यान विभाग के साथ मिलकर किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों, जागरूकता अभियानों और कार्यशालाओं में भी हिस्सा लेते हैं। वे ग्लोबल फार्मर बिजनेस नेटवर्क के सदस्य भी हैं, जो देश-विदेश के किसानों को आपस में जोड़ने वाला एक मंच है। इस मंच के जरिए वे दूसरे राज्यों और देशों के किसानों के अनुभवों से भी सीखते रहते हैं, जिसका फायदा वे अपने दोनों खेतों की योजना बनाने में उठाते हैं।
मिश्र की कहानी उन लोगों के लिए एक उदाहरण बन रही है, जो लंबे कॉर्पोरेट करियर के बाद रिटायरमेंट को खाली समय के बजाय किसी नई शुरुआत के मौके के तौर पर देखना चाहते हैं। उनके मुताबिक बागवानी और सुरक्षित खेती का यह मेल सिर्फ आमदनी का जरिया नहीं है, बल्कि खाली पड़ी जमीन के बेहतर इस्तेमाल और गांव की अर्थव्यवस्था को सहारा देने का भी एक तरीका है।
आगे की योजना में वे हाइड्रोपोनिक्स तकनीक, और भी ज्यादा विदेशी सब्जियों की किस्में, कोल्ड स्टोरेज की सुविधा और अपने ही खेत में एक किसान प्रशिक्षण केंद्र जोड़ने पर काम कर रहे हैं। उनका मकसद अपने अनुभव को आसपास के युवा किसानों तक पहुंचाना है, ताकि गांव से शहर की ओर हो रहे पलायन को कुछ हद तक रोका जा सके।
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