बिहार के 28 स्थानीय उत्पादों को GI टैग की उम्मीद, 10 उत्पाद अंतिम चरण में
14 अगस्त 2026, पटना: बिहार के 28 स्थानीय उत्पादों को GI टैग की उम्मीद, 10 उत्पाद अंतिम चरण में – बिहार के खेतों, गांवों और स्थानीय कारीगरों की पहचान बने विशिष्ट उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान दिलाने की दिशा में प्रयास तेज हो गए हैं। राज्य के 28 उत्पादों को भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग दिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इनमें से 10 उत्पादों के आवेदन अंतिम सीजीएम चरण तक पहुंच गए हैं। इससे इन उत्पादों को जल्द GI पहचान मिलने की उम्मीद मजबूत हुई है।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में आयोजित 20वीं GI समीक्षा बैठक में 28 GI आवेदनों की विस्तार से समीक्षा की गई। बैठक में नए उत्पादों को भी GI टैग दिलाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई। इसी क्रम में शाहाबाद के अनरसा, मनेर के लड्डू और कोसी जूट जैसे उत्पादों के लिए GI आवेदन की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया।
10 उत्पादों की प्रक्रिया अंतिम चरण में
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के अनुसंधान निदेशक और GI फैसिलिटेशन सेंटर के प्रधान अन्वेषक डॉ. अनिल कुमार सिंह ने बताया कि राज्य के 28 GI आवेदनों पर प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है। इनमें 10 आवेदन अंतिम सीजीएम चरण में पहुंच चुके हैं। यह GI पंजीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।
उन्होंने कहा कि GI टैग केवल किसी उत्पाद के नाम के साथ जुड़ने वाला प्रमाणपत्र नहीं है। किसी उत्पाद को GI पहचान मिलने से उसकी विशिष्टता, ब्रांडिंग और बाजार की संभावनाओं को मजबूती मिलती है। इससे संबंधित क्षेत्र के किसानों, कारीगरों और उत्पादकों को अपने उत्पाद की अलग पहचान बनाने में मदद मिल सकती है।
ब्रांडिंग और बाजार पर भी जोर
GI टैग मिलने के बाद किसी उत्पाद को उसके विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र और विशेष गुणों के आधार पर पहचान मिलती है। ऐसे में बिहार कृषि विश्वविद्यालय अब केवल GI पंजीकरण तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि इन उत्पादों को बाजार से जोड़ने, उनकी ब्रांडिंग और प्रचार-प्रसार की रणनीति पर भी काम कर रहा है।
बिहार को पहले ही भागलपुरी जरदालू, शाही लीची, कतरनी चावल, मगही पान और मिथिला मखाना सहित कई प्रमुख उत्पादों को GI पहचान मिल चुकी है। इन उत्पादों की विशिष्टता को व्यापक बाजार तक पहुंचाने के साथ अब नए उत्पादों को भी GI पहचान दिलाने की कोशिश की जा रही है।
GI टैग मिलने से स्थानीय उत्पादों की नकल पर रोक लगाने और वास्तविक उत्पादकों की पहचान मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है। यदि GI पहचान के साथ बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग, विपणन और ऑनलाइन बाजार उपलब्ध कराया जाए तो बिहार के ग्रामीण उत्पाद स्थानीय बाजार से निकलकर देश-विदेश के बाजारों तक अपनी मजबूत पहचान बना सकते हैं।
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture

