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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

2036 तक भारत का मक्का उत्पादन 75 मिलियन टन करने का लक्ष्य, हैदराबाद में पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू

04 नवंबर 2026, नई दिल्ली: 2036 तक भारत का मक्का उत्पादन 75 मिलियन टन करने का लक्ष्य, हैदराबाद में पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू – भारत में मक्का उत्पादन बढ़ाने, किसानों की आय में सुधार करने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से पहला अंतर्राष्ट्रीय मक्का सम्मेलन 2 नवंबर को हैदराबाद के जेडी कन्वेंशन सेंटर में शुरू हुआ। ‘बदलती दुनिया में भोजन, पशु-आहार, चारा, ईंधन और स्थिरता के लिए मक्का क्रांति’ (M4FS) विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में देश-विदेश के वैज्ञानिक, नीति-निर्माता, कृषि संस्थानों और उद्योग जगत के प्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन में भारत के मक्का उत्पादन को मौजूदा लगभग 55 मिलियन टन से बढ़ाकर अगले दशक में 75 मिलियन टन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया।

मक्का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने पर जोर

सम्मेलन में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने मक्का अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिकों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि भारत में मक्का उत्पादन लगभग 55 मिलियन टन तक पहुंच गया है और पिछले एक दशक में इसकी उत्पादकता में भी काफी सुधार हुआ है। अब अगले दशक में उत्पादन को 75 मिलियन टन तक पहुंचाने के लिए प्रयास करने होंगे। डॉ. जाट ने तकनीकी नवाचार, बेहतर फसल प्रबंधन और संसाधनों के कुशल उपयोग के माध्यम से मक्के की उत्पादकता को 1.5 गुना और बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कृषि अनुसंधान और उसके विस्तार का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंचना चाहिए। इससे किसानों की कमाई बढ़े और उनकी आजीविका बेहतर हो, तभी अनुसंधान के परिणाम सार्थक होंगे।

मक्के की खेती में किसानों को केंद्र में रखने पर जोर

डॉ. जाट ने मक्के से जुड़े पारंपरिक 4एफ विजन को बढ़ाकर 5एफ करने की बात कही। पारंपरिक 4एफ में भोजन (फूड), पशु आहार (फीड), चारा (फॉडर) और ईंधन (फ्यूल) शामिल हैं। उन्होंने किसानों को इस मॉडल के केंद्र में रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मक्का उत्पादन बढ़ाने के लिए खेती में मौजूद कमियों और कम पैदावार के कारणों की पहचान करना जरूरी है। इसके लिए प्रणाली-विज्ञान आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, ताकि फसल प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं को दूर करके उत्पादन बढ़ाया जा सके।

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उन्होंने अलग-अलग मौसमों और कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में मक्के की खेती को रणनीतिक रूप से बढ़ावा देने की बात कही। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया कि मक्के का रकबा बढ़ाने के प्रयासों से तिलहन और दलहन जैसी दूसरी महत्वपूर्ण फसलों की खेती पर नकारात्मक असर नहीं पड़ना चाहिए। डॉ. जाट ने मजबूत बीज प्रणाली विकसित करने की जरूरत बताते हुए कहा कि किसानों को किफायती और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराए जाने चाहिए। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा विकसित हाइब्रिड बीजों की उपलब्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है।

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329 हाइब्रिड किस्में विकसित, अनुसंधान को मजबूत करने पर जोर

आईसीएआर के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डी.के. यादव ने मक्के को खाद्य, पोषण और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण फसल बताया। उन्होंने पिछले पांच वर्षों में मक्का अनुसंधान और विस्तार के क्षेत्र में हुई प्रगति का उल्लेख करते हुए बताया कि इस दौरान 329 हाइब्रिड किस्में विकसित की गई हैं। डॉ. यादव ने मक्का पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (AICRP on Maize) को और मजबूत करने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि मक्का अनुसंधान में अधिक पैदावार देने वाली किस्मों के विकास, पोषण गुणवत्ता में सुधार और जैविक तथा अजैविक तनावों के प्रति फसलों की सहनशीलता बढ़ाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, उन्होंने कृषि संसाधनों के कुशल उपयोग, मशीनीकरण, किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की क्षमता बढ़ाने तथा सार्वजनिक क्षेत्र में हाइब्रिड बीज उत्पादन को मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने मक्के से इथेनॉल बनाने की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके लिए अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और उद्योग जगत के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।

किसानों की जरूरत के अनुसार विकसित हों उन्नत किस्में

सम्मेलन में सीआईएमएमवाईटी से जुड़े प्रख्यात मक्का वैज्ञानिक और वर्ल्ड फूड लॉरेट पद्मश्री डॉ. एस. वसल ने किसानों की जरूरतों के अनुरूप बेहतर किस्मों और हाइब्रिड बीजों के विकास में तेजी लाने की बात कही। उन्होंने इसके लिए सरल और किफायती प्रजनन तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया, ताकि किसानों को बेहतर उत्पादन देने वाली किस्में उपलब्ध कराई जा सकें।

वहीं, सम्मेलन के मुख्य अतिथि और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के पूर्व सचिव तथा आईसीएआर के पूर्व महानिदेशक पद्म भूषण डॉ. आर.एस. परोदा ने कहा कि कृषि अनुसंधान की प्राथमिकताएं खेती और उससे जुड़े क्षेत्रों की बदलती जरूरतों के अनुरूप तय की जानी चाहिए। उन्होंने उन्नत प्रजनन तकनीकों के इस्तेमाल, मक्के के आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और उपयोग तथा इसकी मजबूत मूल्य श्रृंखला विकसित करने पर जोर दिया। साथ ही, उन्होंने एफ्लाटॉक्सिन के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता बताई, ताकि भोजन और पशु आहार के रूप में इस्तेमाल होने वाले मक्के की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग पर जोर

कार्यक्रम की शुरुआत में मेज टेक्नोलॉजिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MTAI) के अध्यक्ष डॉ. एच.एस. जाट ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने भारत के कृषि क्षेत्र में मक्के के रणनीतिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए अनुसंधान संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत के बीच सहयोग बढ़ाना जरूरी है। कार्यक्रम के दौरान कई वैज्ञानिक प्रकाशनों का विमोचन किया गया। साथ ही, मक्का अनुसंधान एवं विकास में उल्लेखनीय योगदान देने वाले वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं को पुरस्कार प्रदान किए गए।

4 नवंबर तक चलेगा सम्मेलन

हैदराबाद में 2 से 4 नवंबर 2026 तक आयोजित इस अंतर्राष्ट्रीय मक्का सम्मेलन में मक्के की पैदावार बढ़ाने, उन्नत बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने, प्रजनन कार्यक्रमों को मजबूत बनाने और पोषण गुणवत्ता में सुधार करने जैसे विषयों पर चर्चा की जा रही है। सम्मेलन का उद्देश्य किसानों पर केंद्रित अनुसंधान को बढ़ावा देना और मक्के की टिकाऊ मूल्य श्रृंखला विकसित करने के लिए राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों के बीच सहयोग मजबूत करना है। इसके माध्यम से भारत में मक्का उत्पादन को अधिक उत्पादक, लाभकारी और टिकाऊ बनाने के लिए भविष्य की रणनीति तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। 

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