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फसल की खेती (Crop Cultivation)राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

स्ट्राबेरी की वैज्ञानिक एवं लाभदायक खेती

लेखक: सुनील कुमार राठौर, खाद्य वैज्ञानिक, डॉ.अनिता ठाकुर, मृदा वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, अनूपपुर (म.प्र.)

24 अक्टूबर 2024, नई दिल्ली: स्ट्राबेरी की वैज्ञानिक एवं लाभदायक खेती – परिचय स्ट्राबेरी रोजेसी कुल का पौधा है जिसकी उत्पति उत्तरी अमेरिका में हुई थी। भारत में इसका उत्पादन पर्वतीय भागों में नैनीताल, देहरादून, हिमाचल प्रदेश, महाबलेश्वर,महाराष्ट्र, नीलगिरी, दार्जलिंग आदि की पहाड़ियों में व्यावसायिक तौर पर किया जा रहा है। इसकी खेती अब मैदानी भागों, दिल्ली, बंगलौर, जालंधर, मेरठ, पंजाब, हरियाणा आदि क्षेत्रों में भी की जा रही है। सोलन हल्दवानी,देहरादून, रतलाम, नासिक, गुड़गाँव एवं अबोहर स्ट्राबेरी के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। अनुपपुर की मिट्टी तथा जलवायु स्ट्रोबेरी की खेती के लिए उपयुक्त है। अत: यहाँ पर इसकी व्यवसायिक खेतीकी जा सकती है। इसके लाल, गुलाबी, सुगंधित व पौष्टिक फलों की आजकल बहुत मांग है। इससे जैम व जैलीआदि भी बनाया जाता है। इसके 100 ग्राम फल में 87.8% पानी, 0.7% प्रोटीन, 0.2% वसा, 0.4% खनिज लवण,1.1% रेशा, 9.8% कार्बोहाइड्रेट, 0.03% कल्शियम, 0.03% फास्फोरस व 1.8% लौह तत्व पाया जाता है। इसकेअलावा इसमें 30 मि.ग्रा. निकोटिनिक एसिड, 52 मि.ग्रा. विटामिन सी व 0.2 मि.ग्रा. राइवोफ्लेविन भी होता है।विटामिन सी, लौह व खनिज तत्व की प्रचुर मात्रा होने के कारण इस फल का सेवन रक्त अल्पता से ग्रसित रोगियों के लिए बहुत ही लाभप्रद पाया गया है।

ड्रिप सिस्टम की स्थापना एवं खेत की तैयारी-

स्ट्राबेरी का फल बहुत ही नाजुक एवं क्षयशील होता है। अत: गुणवत्तायुक्त एवं अधिक उत्पादन के लिए फसल को टपकाव विधि (ड्रिप सिंचाई प्रणाली) से पानी देना चाहिए। इसके लिए फल एवं पौधे के अन्य भागों (पत्ती व तना आदि) को पानी के सीधे संपर्क से बनाना श्रेयस्कर है। एक एकड़ भूमि में ड्रिप सिंचाई प्रणाली से स्ट्रोबेरी लगाने में लगभग 40-65 हजार रूपये तक का खर्च आता है। फसल की रोपाई के पूर्व खेत की गहरी जुताई करके उसे अच्छी तरह समतल कर लेते हैं। तैयार खेत में रिज मेकर (करहा) या फावड़े की सहायता से 40 सें.मी. की
दूरी पर एक मीटर चौड़ी व 20-25 सें.मी. ऊँची क्यारी तैयार करते हैं। पट्टियों (मेड) की लंबाई अपनी सुविधा के अनुसार रखते है।भारत वर्ष में उगाई जाने वाली स्ट्राबेरी की अधिकांश किस्में आयातित है व कुछ किस्में संकर विधि से यहाँ कीजलवायु के अनुसार विकसित की गई है।अगेती – डगलस, गोरिल्ला, फर्न, अर्लिग्लो एवं तिओगा। पिछेती – चांडलर, डाना, सेल्भा एवं स्वीट चार्ली।

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प्रवर्धन

स्ट्राबेरी का व्यावसायिक तौर पर प्रसारण के लिए फलन के बाद जून-जुलाई में जब स्ट्राबेरी में रनर निकलने लगे तो पौधों पर 15 दिन के अंतर पर (50 पी.पी.एम.) जिब्रेलिक एसिड के घोल का छिड़काव करते हैं। इसके प्रति रनर से 15 से 20 पौधे बन जाते है। शुरू के 3-4 पौधे ही उत्पादक होते है। अत: इन्हीं पौधों को मुख्य खेत में लगाते है। उत्पादक खेत में निकलने वाले रनर्स को तोड़ देने से उपज
अच्छी मिलती है। टिशु कल्चर के द्वारा भी रनर का उत्पादन सफलतापूर्वक किया जा सकता है। एक पौधे से दूसरे मौसम में 5-10 तक नये पौधे (रनर) तैयार हो जाते है।

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सिंचाई एवं खाद

फलन में सिंचाई की आवश्यकता भूमि की किस्म एवं मौसम की दशा पर अधिक निर्भर है। सामान्यत: अक्टूबर-नवम्बर में ड्रिप सिस्टम को प्रतिदिन 40 मिनट (20 मिनट सुबह एवं 20 मिनट शाम) तक अवश्यचलायें। यह समय फसल की आवश्यकता के अनुसार घटाया-बढ़ाया भी जा सकता है। शीघ्र फल देने के प्रकृतिके कारण स्ट्राबेरी को अधिक खाद एवं उर्वरक की आवश्यकता होती है। तैयार क्यारी में 2
कि.ग्रा. गोबर की खाद एवं 20 ग्राम डी.ए.पी.प्रतिवर्ग मी. की दर से रोपाई के पूर्व ही मिला देते हैं। इसके पश्चात ड्रिप सिस्टम केद्वारा सिंचाई के पानी के साथ ही कोई ऐसा घुलनशील उर्वरक, जो नाइट्रोजन फास्फोरस, पोटाश एवं सूक्ष्म तत्व प्रदान कर सके, प्रति सप्ताह देते है। सामान्यत: 50:25:35 कि.ग्रा. नेत्रजन, फ़ॉसफोरस व पोटाश प्रति एकड़ केहिसाब से ड्रिप सिंचाई द्वारा देते है।

पौध रोपण का समय व विधि

स्ट्राबेरी की रोपाई सितम्बर से नवम्बर तक की जा सकती है। अगेती रोपाई से फसल का दाम तो अच्छामिलता है लेकिन सितम्बर में तापमान अधिक रहने से 15-20 तक पौध मर जाते है। अत: बेहतर है किअक्टूबर में ही फसल की रोपाई करें। एक एकड़ फसल की रोपाई के लिए 44-45 हजार रनर की आवश्यकतापड़ती है। तैयार क्यारी में 30 25 से.मी. की दूरी पर एक समान व स्वस्थ रनर की रोपाई करें। रोपाई के बादस्प्रिंकलर के द्वारा पानी से मिट्टी की अच्छी तरह संतृप्त कर देते हैं। रोपाई से पूर्व रनर की जड़ों कोवाबिस्टीन के 0.1 प्रतिशत घोल में 5-10 मिनट तक डुबा लेते हैं।

फसल प्रबंध एवं खरपतवार नियंत्रण

स्ट्राबेरी का पौधा और फल बहुत नाजुक होता है अत: उसे विशेष प्रबंध की आवश्यकता होती है। मल्चिंग से पूर्वफसल की 25 दिन के अंतराल पर निराई-गुड़ाई करें। यदि फसल खरपतवारों से मुक्त है तो रोपाई के 30 दिनबाद केवल एक गुड़ाई पर्याप्त होती है। यदि खेत में मोथा का प्रकोप है तो उसे खेत की तैयारी के समय किसी प्रभावकारी खरपतवार नाशी (राउंड अप या लीडर 3 लीटर प्रति एकड़) का प्रयोग करके नष्ट कर लें उसके बाद ही फसल लगायें।रोपाई के 50 दिन बाद फसल की मल्चिंग कर देते हैं। इस काम के लिए सस्ती कीमत वाली काली पालीथीन का प्रयोग करते हैं। क्यारी की लम्बाई व चौड़ाई के अनुसार पालीथीन की पट्टियाँ बना कर उसमें ब्लेड की सहायता से छेद बनाकर पौधों को छेद से ऊपर निकालते हुए अच्छी तरह बिछा देते है। काली पालीथीन के लगाने से खरपतवारों का विनाश, पानी का संरक्षण तथा सर्दी में भूमि का तापवर्धन होता है। मल्चिंग के लिए पालीथीन के स्थान पर धान के पुआल का प्रयोग कर सकते हैं।

पैकिंग एवं विपणन

अत्याधिक नाजुक होने की वजह से स्ट्राबेरी के फलों को छोटे एवं पारदर्शी प्लास्टिक के डिब्बे (प्लास्टिकनेट) में पैक करते हैं। एक पनेट में 200 ग्राम फल भरा जाता है। इन भरे हुए डिब्बों को गत्ते कदो टुकड़ों के बीच रखकर टेप से चिपका देते हैं। इस प्रकार से पैक किये गये डिब्बों को सड़क एवं रेलमार्ग द्वारा दूरस्थ स्थानों तक पहुँचाया जाता है। सुरक्षित एवं क्षति रहित परिवहन एवं विपणन के लिए वातानुकूलित वाहनों को प्रयोग में लाते हैं। तुडाई के बाद यथाशीघ्र फलों का विपणन करना पड़ता है। यदि तुड़ाई के बाद फलों को शीत गृह में नहीं रखा जाता है तो वे 2 दिन में ही खराब हो जाते हैं।

कीट व बीमारी नियंत्रण

रेड-कोर: यह फफूंदी जनित बीमारी है। प्रभावित पौधे छोटे आकार के रहते है तथा पत्तियाँ नील-हरित शैवाल के रंग की प्रतीत होती है। प्रभावित पौधे की जड़ों को तोड़कर देखने से उनका मध्य भाग लाल रंग का दिखाई पड़ता है। नियंत्रण के लिए 4 ग्राम रिडोमिल नामक दवा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। एंथ्राक्नोस: इस रोग से प्रभावित पौधे की पत्तियों, तनों एवं फल पर काले रंग के छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं।मैंकोजेब 0.15 प्रतिशत घोल के प्रयोग से इस पर काबू पाया जा सकता है।झुलसा: पौधे की पत्तियों पर अनियमित आकार के लाल व बैगनी रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। फफूंदी का उग्र प्रकोप होने पर पौधे के सभी भाग झुलस से जाते हैं।इसके अतिरिक्त एफिड, लाल मकड़ी, थ्रिप्स, सफेद मक्खी आदि कीड़े पत्तियों से रस चूसकर फसल को हानि पहुँचाते हैं। सैप विटिल नामक कीड़ा पके हुए फलों में छेद करके रस चूसता है। इसे नियंत्रण के लिए imidacloprid 17.8% SL का प्रयोग करते हैं I

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