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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

जैविक कपास धोखाधड़ी मामला, शोषित किसानों को न्याय दिलाने उचित मुआवजा मिले, जांच के लिए एसआईटी बने- दिग्विजय सिंह

28 जुलाई 2025, नई दिल्ली: जैविक कपास धोखाधड़ी मामला, शोषित किसानों को न्याय दिलाने उचित मुआवजा मिले, जांच के लिए एसआईटी बने- दिग्विजय सिंह – 2001 में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) शुरू किया, जिसे कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) लागू करता है। इसका उद्देश्य जैविक उत्पादों के निर्यात को प्रमाणित और विनियमित करना है। इस ढांचे के तहत, NPOP प्रमाणन निकायों (CBs) को मान्यता देता है, जो आंतरिक नियंत्रण प्रणाली (ICS) का सत्यापन करती हैं। ICS 25 से 500 किसानों के समूह होते हैं, जो जैविक कपास उगाते हैं। वर्तमान में (2025 तक) लगभग 6,046 ICS और 35 CBs हैं।

नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में दिग्विजय सिंह ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया ‘Tracenet’ नामक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से संचालित होती है, जो जैविक उत्पादन का ट्रैक रखने और सत्यापन करने में मदद करता है। ICS के सत्यापन के बाद एक ‘ट्रांजैक्शन सर्टिफिकेट’ जारी किया जाता है, जो उस ICS को जैविक घोषित करता है।

लेकिन समस्या क्या है?

ज्यादातर किसान जिन्हें ICS में पंजीकृत बताया गया है, वे न तो जैविक कपास उगा रहे हैं और न ही इस प्रणाली में अपनी उपस्थिति के बारे में जानते हैं। मतलब, ICS समूहों ने जानबूझकर धोखाधड़ी करके किसानों के नाम जोड़े हैं ताकि उन्हें ट्रांजैक्शन सर्टिफिकेट मिल सके।

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इसके क्या प्रभाव हैं?

जब हमारे किसान अपने उत्पाद का सही मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब कुछ शक्तिशाली व्यापारी गैर-जैविक (Bt) कपास को ‘जैविक’ बताकर छह गुना अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। इन निर्यातकों द्वारा आयकर और GST की भी बड़े पैमाने पर चोरी की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को अब जैविक उत्पाद बाजार में धोखाधड़ी का केंद्र माना जा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा मान्यता रद्द की जा रही है।

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घोटाले का पैमाना

इस घोटाले का आकार 2.10 ट्रिलियन रुपये (2,10,00,00,00,000 रुपये) से भी ज़्यादा है, क्योंकि पिछले एक दशक में 12 लाख किसानों ने 1.05 ट्रिलियन रुपये मूल्य का कपास उगाया, लेकिन व्यावसायिक संस्थाओं ने इसे अजैविक बताकर खरीदा और धोखे से इसे लगभग दोगुनी कीमत (मौसम के आधार पर 2 गुना या 3 गुना) पर जैविक बताकर बेच दिया।

प्रत्येक किसान 2.5 एकड़ में खेती करता है, और लगभग ₹5,000/क्विंटल की दर से सालाना 7 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन करता है, जिससे उसे सालाना 87,500 रुपये की कमाई होती है; 6000 से ज़्यादा आईसीएस समूहों के 24 लाख किसानों में से लगभग 12 लाख किसान प्रभावित और ठगे गए हैं।

2 व्यावसायिक संस्थाओं पर छापे से 750 करोड़ रुपये की जीएसटी चोरी का खुलासा (सिर्फ़ 2 व्यावसायिक संस्थाओं से 7,500 करोड़ रुपये के घोटाले का पर्दाफाश, क्योंकि कर चोरी कुल राशि का सिर्फ 5% थी)।

अंतरराष्ट्रीय चिंता

अक्टूबर 2020 में GOTS (Global Organic Textile Standard) ने भारत में नकली ट्रांजैक्शन सर्टिफिकेट पकड़े और ।। कंपनियों को प्रतिबंधित किया व एक प्रमुख सर्टिफायर की मान्यता रद्द की।

जून 2021 में USDA (अमेरिका) ने भारत के ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन की ऑटोमैटिक मान्यता बंद कर दी।

नवम्बर 2021 में EU ने 5 भारतीय सर्टिफायर्स की मान्यता रद्द कर दी क्योंकि जैविक कहे गए उत्पादों में प्रतिबंधित रसायन पाए गए।

जनवरी 2022 में New York Times की रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत के जैविक कपास निर्यात का 80% हिस्सा फर्जी है, और अधिकतर किसान जानते तक नहीं कि उनके नाम फर्जी सर्टिफिकेशन में इस्तेमाल हो रहे हैं। कई ICS फर्जी दस्तावेजों और चोरी की गई पहचान के आधार पर बनाए गए।

सरकार की प्रतिक्रिया

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने 27 अगस्त 2024 को प्रधानमंत्री को एक पत्र के माध्यम से मध्य प्रदेश में जैविक कपास धोखाधड़ी को चिह्नित किया, जिसके जवाब में 28 नवंबर 2024 को पीयूष गोयल से एक पत्र प्राप्त हुआ। सांसद द्वारा 20 दिसंबर 2024 को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय से एक राज्यसभा प्रश्न भी उठाया गया था। इसके अलावा, 24 जनवरी 2025 को एक पत्र के माध्यम से वाणिज्य मंत्री से जांच की मांग की गई, जिस पर 8 मार्च 2025 को एक प्रतिक्रिया जारी की गई।

हमारा आरोप है कि मंत्रालय इस घोटाले में संलिप्त है, तथा 2017 से अपने ही निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन होने के बावजूद उसने कोई कार्रवाई नहीं की है। उनके पत्र और निरंतर निष्क्रियता घोटाले की स्वीकृति का संकेत देते हैं।

क्या सरकार कार्रवाई कर रही है?

कागज़ों पर हां, असल में नहीं।

एपीडा ने 2017 से आधार-आधारित सत्यापन अनिवार्य करने के लिए कई परामर्श जारी किए हैं, लेकिन सात साल बाद भी, इन प्रावधानों का क्रियान्वयन नहीं हुआ है।

पीयूष गोयल द्वारा 28 नवंबर 2024 को प्राप्त पत्र में इस तथ्य को स्वीकार किया गया कि धोखाधड़ी हुई है। इसके बदले में, एक प्रमाणन निकाय का पंजीकरण रद्द कर दिया गया और कुछ और संस्थाओं पर जाँच शुरु कर दी गई। इसके बाद, यह मुद्दा इंदौर पुलिस आयुक्त और धार जिल (मध्य प्रदेश) पुलिस अधीक्षक के समक्ष उठाया गया।

पीयूष गोयल द्वारा 8 मार्च 2025 को प्राप्त पत्र में कहा गया है कि कपास उत्पादक समूहों पर अघोषित ऑडिट किए गए हैं और इंदौर पुलिस आयुक्त द्वारा धार स्थित एक आईसीएस के प्रबंधक के खिलाफ एक प्राथमिकी भी दर्ज की गई है।

ईडी और ईओडब्ल्यू को की गई शिकायतों पर कोई सार्थक कार्रवाई नहीं हुई।

इंदौर अपराध शाखा ने एक कथित जबरन वसूली मामले में फर्जी प्राथमिकी दर्ज की, अपराध की जाँच के लिए नहीं, बल्कि अपनी जेबें भरने के लिए।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल द्वारा 9 जनवरी 2025 को ट्रेसनेट 2.0 का उद्घाटन करने के बाद भी, इन परामर्शों का क्रियान्वयन नहीं किया गया है।

हमारी माँगें

1. उच्च न्यायालय के एक कार्यरत न्यायाधीश की निगरानी में सीबीआई के नेतृत्व में एक विशेष जाँच दल (एसआईटी) का गठन किया जाए।

2. 2017 से लंबित परामर्शों के साथ-साथ ट्रेसनेट 2.0 का तत्काल कार्यान्वयन।

3. 192 निलंबित/समाप्त धोखाधड़ी वाले आईसीएस समूहों के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई (क्योंकि इन गड़बड़ियों में शामिल सभी आईसीएस समूहों का निलंबन केवल 1 महीने में ही रद्द कर दिया गया था)।

4. 6,046 आईसीएस समूहों में से प्रत्येक की जाँच की जानी चाहिए, और घोटाले या धोखाधड़ी में पकड़े गए किसी भी व्यक्ति पर आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

5. प्रमाणन निकायों द्वारा पारदर्शी निरीक्षण।

6. शोषित किसानों को उचित मुआवजा।

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