ट्राउट मछली का उत्पादन 6 गुना बढ़ा, सालाना 5,000 टन तक पहुंचा आंकड़ा
20 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: ट्राउट मछली का उत्पादन 6 गुना बढ़ा, सालाना 5,000 टन तक पहुंचा आंकड़ा – भारत में ठंडे पानी में मछली पालन यानी शीतजल मत्स्यपालन तेजी से आजीविका के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में उभर रहा है। पिछले एक दशक में देश में ट्राउट मछली का उत्पादन छह गुना बढ़कर लगभग 5,000 मीट्रिक टन सालाना तक पहुंच गया है। इससे पहाड़ी क्षेत्रों के किसानों को रोजगार और आय के नए अवसर मिल रहे हैं। केंद्र सरकार भी इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत 2,299 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश कर चुकी है।
मत्स्यपालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने 18 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी का आधिकारिक दौरा किया। इस दौरान उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में शीतजल मत्स्यपालन के विकास की प्रगति की समीक्षा की और ट्राउट मछली पालने वाले किसानों से बातचीत की।

मुनस्यारी में ट्राउट पालन से आजीविका के अवसर बढ़े
दौरे के दौरान सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने मुनस्यारी स्थित जौहर मत्स्य स्वायत्त सहकारिता और नमजाला ट्राउट फार्म का दौरा किया। उन्होंने यहां ट्राउट मछली पालने वाले किसानों से उनके अनुभवों और इस व्यवसाय से जुड़ी संभावनाओं पर चर्चा की। उन्होंने रेनबो ट्राउट पालन को आजीविका के टिकाऊ विकल्प के रूप में विकसित करने में स्थानीय सहकारी समितियों की भूमिका की सराहना की। उनके अनुसार, गोरी गंगा की ठंडी जलधाराओं और अनुकूल तापमान के कारण मुनस्यारी रेनबो ट्राउट पालन के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा है। इससे क्षेत्र की पारंपरिक खेती के साथ मछली पालन को भी व्यावसायिक गतिविधि के रूप में बढ़ावा मिला है।
शीतजल मत्स्यपालन के लिए 2,299 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश
केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत ठंडे पानी वाले क्षेत्रों में 2,299 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया है। इसका उद्देश्य मत्स्यपालन से जुड़ा बुनियादी ढांचा विकसित करना, उत्पादन बढ़ाना और किसानों के लिए आजीविका के नए अवसर तैयार करना है। भारत में शीतजल मत्स्यपालन की गतिविधियां मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में केंद्रित हैं। इन क्षेत्रों की ग्लेशियर से निकलने वाली नदियां, ऊंचाई पर स्थित झीलें और स्वच्छ जलधाराएं रेनबो ट्राउट सहित ठंडे पानी में रहने वाली मछलियों के पालन के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराती हैं।
योजना के तहत इन छह पहाड़ी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 5,600 से अधिक रेसवे, 54 हैचरी, 293 कोल्ड स्टोरेज और 260 फीड मिल स्थापित करने की मंजूरी दी गई है। ये सुविधाएं मछली पालन, बीज उत्पादन, चारे की उपलब्धता, भंडारण और बाजार तक उत्पाद पहुंचाने की व्यवस्था को मजबूत करने में मदद करेंगी।
उत्तराखंड में 317 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी
उत्तराखंड में मत्स्यपालन को बढ़ावा देने के लिए 317 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें आधुनिक मछली बाजार, लैंडिंग सेंटर और सितारगंज में एकीकृत एक्वापार्क की स्थापना शामिल है। इसके अलावा, राज्य सरकार ने 170 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ ट्राउट प्रोत्साहन योजना शुरू की है। इसका लक्ष्य वर्ष 2028-29 तक 1,500 रेसवे, 100 मिनी हैचरी और 600 कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं स्थापित करना है। इन प्रयासों से मछली पालन के विस्तार और उत्पादों के भंडारण एवं विपणन को बेहतर बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
नेपाल को ट्राउट मछली का निर्यात, आईटीबीपी भी खरीदार
उत्तराखंड ने जून 2026 में पहली बार नेपाल को ट्राउट मछली का निर्यात किया। इससे राज्य के मत्स्यपालकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच बनाने का नया अवसर खुला है। इसके साथ ही, उत्तराखंड सरकार और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के बीच हुए समझौता ज्ञापन के तहत राज्य का मत्स्यपालन विभाग आईटीबीपी को भी ट्राउट मछली की आपूर्ति कर रहा है। इस तरह किसानों को बाजार से जोड़ने के लिए संस्थागत खरीद की व्यवस्था भी विकसित की जा रही है।
वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रशिक्षण से मिल रही मदद
मुनस्यारी में ट्राउट पालन को बढ़ावा देने में भीमताल स्थित आईसीएआर-सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ कोल्डवाटर फिशरीज रिसर्च (डीसीएफआर) की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। संस्थान मछली के बीज उत्पादन, बीमारी प्रबंधन और किसानों के प्रशिक्षण में वैज्ञानिक सहायता उपलब्ध करा रहा है। दौरे के दौरान सचिव ने इस योगदान की सराहना की। वैज्ञानिक मार्गदर्शन से किसानों को मछलियों के स्वास्थ्य की देखभाल, पालन की बेहतर तकनीकों और उत्पादन संबंधी चुनौतियों से निपटने में मदद मिलती है।
पहाड़ी गांवों की अर्थव्यवस्था को मिल सकता है बढ़ावा
शीतजल मत्स्यपालन का महत्व केवल मछली उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने, किसानों की आय के स्रोतों में विविधता लाने, पोषण सुरक्षा मजबूत करने और निर्यात को बढ़ावा देने की संभावनाएं हैं। ट्राउट पालन से इको-टूरिज्म को भी प्रोत्साहन मिल सकता है। इसके अलावा, महासीर जैसी लुप्तप्राय मछली प्रजातियों के संरक्षण और सीमावर्ती गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी शीतजल मत्स्यपालन की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
मत्स्यपालन विभाग के सचिव का मुनस्यारी दौरा उत्तराखंड सहित अन्य हिमालयी क्षेत्रों में ट्राउट पालन की संभावनाओं को आगे बढ़ाने और स्थानीय किसानों को टिकाऊ आजीविका से जोड़ने के प्रयासों का हिस्सा है।
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