राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

इथेनॉल में भारत की रिकॉर्ड रफ्तार: गाँव, किसान और पर्यावरण– सभी को फायदा

11 अप्रैल 2025, नई दिल्ली: इथेनॉल में भारत की रिकॉर्ड रफ्तार: गाँव, किसान और पर्यावरण– सभी को फायदा –  भारत का इथेनॉल उद्योग आज दुनिया भर में चर्चा का विषय बन चुका है। स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में ये एक ऐसी कहानी है, जिसने 2025 के लक्ष्य से पहले ही पेट्रोल में करीब 20% इथेनॉल मिलाने का कमाल कर दिखाया। इस सेक्टर को और मजबूत करने के लिए आज नई दिल्ली में एक खास राउंड टेबल सम्मेलन हुआ, जिसमें बड़े-बड़े सरकारी अधिकारी, इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों के नुमाइंदे, नीति-निर्माता और उद्योग के दिग्गज शामिल हुए। सबका मकसद था भारत के इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (ईबीपी) प्रोग्राम को अगले पड़ाव तक ले जाना।

इसी मौके पर एक खास थॉट लीडरशिप रिपोर्ट भी लॉन्च की गई, जिसमें इथेनॉल के बढ़ते रोल को लेकर एक साफ रोडमैप पेश किया गया। ये रोडमैप बताता है कि कैसे इथेनॉल भारत के तीन बड़े मकसदों– ऊर्जा सुरक्षा, गाँवों का विकास और पर्यावरण की रक्षा– को पूरा करने में गेम-चेंजर बन सकता है।

इथेनॉल की रफ्तार: भारत की बड़ी कामयाबी

भारत ने इथेनॉल मिश्रण में गजब की रफ्तार पकड़ी है। 2022 में तय समय से पहले 10% मिश्रण का लक्ष्य पूरा हुआ, और जनवरी 2025 तक ये आंकड़ा 19.6% तक जा पहुंचा। इस कामयाबी ने देश को कई फायदे दिए – 1.08 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची, करीब 185 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल की जरूरत घटी, और 557 लाख मीट्रिक टन CO₂ का उत्सर्जन कम हुआ। कुछ लोग खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हैं, लेकिन रिपोर्ट साफ कहती है कि भारत हर साल 165 लाख मीट्रिक टन अनाज का अतिरिक्त स्टॉक पैदा करता है, जिसे इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल करने से खाने की सप्लाई पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

मक्का और टूटे हुए चावल से बनने वाला इथेनॉल अब बड़ा मौका बनकर उभरा है। खासकर मक्का, जो कम पानी मांगता है और इथेनॉल बनाने में शानदार नतीजे देता है, इसकी खूब चर्चा है। रिपोर्ट बताती है कि अगर हर साल 165 लाख मीट्रिक टन बेकार अनाज का इस्तेमाल हो, तो किसानों की जेब में सीधे 35,000 करोड़ रुपये से ज्यादा आ सकते हैं। इससे गाँवों की तस्वीर बदलेगी और शहरों की ओर पलायन भी रुकेगा।

चुनौतियाँ भी कम नहीं

लेकिन रास्ता इतना आसान नहीं। मक्का की कीमतें बढ़ रही हैं, फीडस्टॉक के लिए अलग-अलग सेक्टरों में होड़ मची है, इथेनॉल की खरीद की कीमतें जस की तस हैं, और डिस्टिलर्स ड्रायड ग्रेन्स (डीडीजीएस) जैसे उप-उत्पादों से कमाई घट रही है। ये सब डिस्टिलरीज के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि इथेनॉल की कीमतों को बाजार के हिसाब से बदलने, मक्का की खेती बढ़ाने, भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) से टूटे और बेकार चावल की पक्की सप्लाई सुनिश्चित करने और इथेनॉल के उप-उत्पादों के लिए मजबूत मार्केट तैयार करने की जरूरत है।

भविष्य का रोडमैप और बड़े सपने

ये राउंड टेबल सम्मेलन प्राइमस पार्टनर्स ने ग्रेन इथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (जीईएमए) और इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एनर्जी (आईएफजीई) के साथ मिलकर आयोजित किया। इसमें भारत में ब्राजील के राजदूत केनेथ एच. डा नोब्रेगा, खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के संयुक्त सचिव अश्विनी श्रीवास्तव, कृषि मंत्रालय के विवेक शुक्ला, ग्रीन फ्यूल एक्सपर्ट वैभव डांगे और जीईएमए के अभिनव सिंघल जैसे दिग्गज शामिल हुए।

अश्विनी श्रीवास्तव ने बताया कि सरकार एक बड़ा रोडमैप तैयार कर रही है। इसमें फीडस्टॉक की कमी दूर करना, एफसीआई से टूटे चावल की सप्लाई पक्की करना, और E100, E93, E85 जैसे ज्यादा इथेनॉल मिश्रणों पर काम करना शामिल है। यहाँ तक कि सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (एसएएफ) की संभावनाएँ भी तलाशी जा रही हैं। अभिनव सिंघल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम भारत के ऊर्जा भविष्य को मजबूत करने, किसानों की जिंदगी बेहतर करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने की दिशा में एक मील का पत्थर है।

आईएफजीई के संजय गंजू ने कहा कि साहसिक नीतियों और इंडस्ट्री के साथ मिलकर काम करने से भारत का इथेनॉल प्रोग्राम इतना कामयाब हुआ। अनाज इथेनॉल गाँवों को आर्थिक ताकत देने, किसानों की कमाई बढ़ाने और साल भर इथेनॉल प्रोडक्शन चलाने का शानदार मौका है। लेकिन इसके लिए फीडस्टॉक की पक्की सप्लाई, सही दाम और नीतिगत सपोर्ट चाहिए।

इस राउंड टेबल सम्मेलन और रिपोर्ट के लॉन्च ने सरकार की उस सोच को और मजबूत किया, जो एक ऐसा इथेनॉल रोडमैप चाहती है जो सबको साथ ले और भविष्य के लिए तैयार हो। आने वाले वक्त में 100% इथेनॉल (ई100) की ओर बढ़ना, फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों को बढ़ावा देना और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल जैसे नए रास्ते तलाशना प्राथमिकता होगी। इन बड़े सपनों को हकीकत में बदलने के लिए सरकार और इंडस्ट्री को कंधे से कंधा मिलाकर काम करना होगा, ताकि भारत स्वच्छ, खुशहाल और ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बन सके।

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