राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

अन्नदाता से ऊर्जादाता बनेगा किसान, एक ही खेत में फसल के साथ पैदा होगी बिजली; प्रल्हाद जोशी ने बताया एग्रीवोल्टिक्स से कैसे होगा फायदा  

11 सितंबर 2026, नई दिल्ली: अन्नदाता से ऊर्जादाता बनेगा किसान, एक ही खेत में फसल के साथ पैदा होगी बिजली; प्रल्हाद जोशी ने बताया एग्रीवोल्टिक्स से कैसे होगा फायदा – केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा, शिक्षा और उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा कि देश का किसान अब अन्नदाता के साथ ऊर्जादाता भी बन रहा है। उन्होंने कहा कि एग्रीवोल्टिक्स तकनीक किसानों को एक ही जमीन से खाद्यान्न और स्वच्छ ऊर्जा, दोनों का उत्पादन करने में सक्षम बना सकती है। यानी किसान खेत में फसल उगाने के साथ उसी जमीन पर सौर ऊर्जा का उत्पादन कर बिजली से भी कमाई कर सकता है।

प्रल्हाद जोशी ने नई दिल्ली में आयोजित 7वें एग्रीवोल्टिक्स वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस 2026 के प्री-इवेंट को संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने बताया कि पीएम-कुसुम योजना के अगले चरण में एग्रीवोल्टिक्स के लिए एक अलग घटक रखने की दिशा में काम किया जाएगा। इसका फोकस खास तौर पर छोटे और सीमांत किसानों के साथ किसान उत्पादक संगठनों (FPO), सहकारी समितियों और पंचायतों पर रहेगा।

एक ही खेत में खेती और सौर ऊर्जा

एग्रीवोल्टिक्स में किसान को खेती और सौर ऊर्जा में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं होगी। इसमें खेत के ऊपर सोलर पैनल लगाए जाते हैं और उनके नीचे फसल की खेती की जा सकती है। इस तरह एक ही जमीन का इस्तेमाल खाद्यान्न उत्पादन और बिजली उत्पादन, दोनों के लिए किया जा सकता है।

प्रल्हाद जोशी ने कहा कि इस व्यवस्था में जमीन का मालिकाना हक किसान के पास ही रहेगा। सौर ऊर्जा से होने वाली अतिरिक्त आय किसान को मानसून और बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के बीच आय की सुरक्षा देने में भी मदद कर सकती है।

एक एकड़ जमीन से कमाई के तीन रास्ते

मंत्री ने बताया कि एग्रीवोल्टिक्स मॉडल में एक एकड़ जमीन से किसान को तीन तरह के आर्थिक लाभ मिल सकते हैं। पहला, फसल बेचने से आय; दूसरा, पैदा की गई सौर बिजली को DISCOM यानी बिजली वितरण कंपनी को बेचकर कमाई; और तीसरा, सिंचाई में डीजल की जरूरत कम होने से होने वाली बचत। उन्होंने कहा कि इस तरह खेती करने वाले किसान के लिए सौर ऊर्जा आय का एक अतिरिक्त स्रोत बन सकती है और खेत की उत्पादकता के साथ ऊर्जा उत्पादन को भी जोड़ा जा सकता है।

भारत में छोटे और सीमांत किसानों पर फोकस

प्रल्हाद जोशी ने कहा कि भारत में दुनिया की करीब 18 प्रतिशत आबादी रहती है, जबकि देश के पास दुनिया की केवल 2.4 प्रतिशत भूमि है। वहीं, देश के 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे और सीमांत श्रेणी में आते हैं और उनके पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन होती है। ऐसे में सीमित भूमि से खेती और ऊर्जा उत्पादन, दोनों को जोड़ना महत्वपूर्ण हो सकता है।

पीएम-कुसुम से करीब 29 लाख पंप सोलराइज

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि पीएम-कुसुम योजना के तहत करीब 29 लाख पंपों का सोलराइजेशन किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि पिछले साल देश में विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा के जरिए 16.3 गीगावाट क्षमता जुड़ी। इसमें पीएम-कुसुम से 7.6 गीगावाट और रूफटॉप सोलर से 8.7 गीगावाट क्षमता शामिल रही। रूफटॉप सोलर में मुख्य रूप से पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना का योगदान रहा और इससे 56 लाख लाभार्थियों को फायदा हुआ।

एक साल में 55.29 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता जुड़ी

प्रल्हाद जोशी ने बताया कि पिछले साल भारत ने 55.29 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता जोड़ी। यह क्षमता नॉर्वे की 40.6 गीगावाट, स्विट्जरलैंड की करीब 30 गीगावाट, ऑस्ट्रिया की 34 गीगावाट और बेल्जियम की करीब 33 गीगावाट स्थापित बिजली क्षमता से अधिक है।

30 फसलों पर 17 सोलर सिस्टम का परीक्षण

मंत्री ने कहा कि एग्रीवोल्टिक्स को देश के अलग-अलग हिस्सों में लागू करने से पहले अलग-अलग फसलों, जलवायु और क्षेत्रों के हिसाब से ज्यादा शोध की जरूरत है। उन्होंने पुणे स्थित BAIF रूरल इनोवेशन सेंटर का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां 30 फसलों पर 17 अलग-अलग सौर प्रणालियों का परीक्षण किया जा रहा है।

इन परीक्षणों से यह समझने में मदद मिल रही है कि किस फसल के लिए सोलर पैनल की ऊंचाई, पैनलों के बीच दूरी, ट्रैकिंग व्यवस्था और कारोबारी मॉडल किस तरह का होना चाहिए। अलग-अलग फसल और क्षेत्र के हिसाब से सही संयोजन तय करना एग्रीवोल्टिक्स की सफलता के लिए जरूरी है।

ट्रैक्टर-हार्वेस्टर के अनुकूल हों सोलर सिस्टम

प्रल्हाद जोशी ने उद्योग और नवाचार से जुड़े लोगों से ऐसी सोलर संरचनाएं विकसित करने का आग्रह किया, जिनके बीच से ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और अन्य कृषि मशीनें आसानी से गुजर सकें। उन्होंने कहा कि सिस्टम तैयार करते समय स्थानीय मौसम, फसल और क्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है। उन्होंने ICAR, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों और फसलों से जुड़ा डेटा उपलब्ध कराने की जरूरत पर भी जोर दिया। इससे क्षेत्र और फसल के अनुसार बेहतर एग्रीवोल्टिक्स मॉडल तैयार किए जा सकेंगे।

लागत कम करने के लिए तकनीकी नवाचार पर जोर

मंत्री ने एग्रीवोल्टिक्स की लागत कम करने के लिए स्ट्रक्चर, सामग्री और माउंटिंग सिस्टम में नवाचार की जरूरत बताई। उनका जोर ऐसे समाधान विकसित करने पर रहा, जिनसे मौजूदा लागत का अंतर कम किया जा सके और तकनीक को किसानों के लिए ज्यादा उपयोगी बनाया जा सके। उन्होंने कहा कि एग्रीवोल्टिक्स को व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए किसानों की जरूरतों के हिसाब से तकनीक, संरचना और कारोबारी मॉडल तैयार करना जरूरी है।

करीब 70 हजार सूर्य मित्र प्रशिक्षित

प्रल्हाद जोशी ने बताया कि देश में करीब 70,000 सूर्य मित्रों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। उन्होंने कहा कि एग्रीवोल्टिक्स सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां खाद्य उत्पादन और स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत एक साथ बढ़ रही है।

3F फ्रेमवर्क पर रहेगा जोर

कार्यक्रम के दौरान 7वें एग्रीवोल्टिक्स वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस 2026 का टीजर और आधिकारिक लोगो भी जारी किया गया। कॉन्फ्रेंस के तहत Agrivoltaics Pitch Hub की थीम “Farm to Fork Innovation” रखी गई है। इसमें NSEFI नॉलेज पार्टनर है। एग्रीवोल्टिक्स के लिए 3F फ्रेमवर्क—Food, Fuel और Fibre पर भी जोर दिया जाएगा। इसका उद्देश्य खेती, ऊर्जा और कृषि आधारित जरूरतों को एक साथ जोड़कर नवाचार को बढ़ावा देना है।

21 से 23 अक्टूबर तक होगा सम्मेलन7वां एग्रीवोल्टिक्स वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस 2026 21 से 23 अक्टूबर 2026 तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित किया जाएगा। इसमें एग्रीवोल्टिक्स तकनीक, कृषि और स्वच्छ ऊर्जा को एक साथ जोड़ने के लिए शोध, नवाचार और व्यावहारिक समाधानों पर चर्चा होगी।

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