राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

जल संकट वाले राज्यों में बदलेगा फसल पैटर्न, ICAR ने सुझाया फसल विविधीकरण का मॉडल

06 अगस्त 2026, नई दिल्ली: जल संकट वाले राज्यों में बदलेगा फसल पैटर्न, ICAR ने सुझाया फसल विविधीकरण का मॉडल – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने देश में जल संकट और गिरते भूजल स्तर को देखते हुए जल उपलब्धता के अनुरूप फसल पैटर्न अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। आईसीएआर के अध्ययन में पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे भूजल संकट वाले राज्यों में मौजूदा फसल पैटर्न और जल उपलब्धता के बीच असंतुलन सामने आया है। परिषद ने ऐसे क्षेत्रों में धान और गन्ने जैसी जल-गहन फसलों के स्थान पर दलहन, तिलहन, मोटे अनाज (मिलेट्स) और बागवानी फसलों को बढ़ावा देने की सिफारिश की है।

ICAR ने तैयार किया ‘भारत में फसल प्रणालियों का एटलस’

आईसीएआर ने कृषि-जलवायु परिस्थितियों, जल उपलब्धता, संसाधनों और बाजार की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए ‘भारत में फसल प्रणालियों का एटलस’ तैयार किया है। इसके साथ ही चावल, गेहूं, मक्का, बाजरा, ज्वार, अरहर, चना, सोयाबीन, सरसों, मूंगफली, कपास, गन्ना, आलू और प्याज सहित 14 प्रमुख फसलों के लिए जिला एवं कृषि-पारिस्थितिकी आधारित फसल योजना तैयार की गई है।

कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जल-गहन फसलों की खेती

अध्ययन में पाया गया कि देश के 68 जिलों में 650 मिमी से कम वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में करीब 28.9 लाख हेक्टेयर में धान की खेती हो रही है, जो कुल धान क्षेत्र का 5.67 प्रतिशत है। वहीं 91 जिलों में 700 मिमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में लगभग 7.21 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती की जा रही है, जो कुल गन्ना क्षेत्र का 10.76 प्रतिशत है। आईसीएआर का कहना है कि ऐसे क्षेत्रों में फसल विविधीकरण जल सुरक्षा, कृषि उत्पादकता और किसानों की आय के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद करेगा।

47 जिलों में लागू किया गया फसल विविधीकरण मॉडल

सरकार स्थानीय जल उपलब्धता, मृदा की विशेषताओं और कृषि-जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा दे रही है। इसी उद्देश्य से आईसीएआर ने 47 चिन्हित जिलों में फसल विविधीकरण की पायलट परियोजना लागू की है। इसके तहत दलहन, तिलहन, मिलेट्स और बागवानी फसलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

सूक्ष्म सिंचाई और वैज्ञानिक खेती पर जोर

आईसीएआर ने विभिन्न फसलों के लिए ड्रिप फर्टिगेशन और वैज्ञानिक सिंचाई प्रबंधन को मानकीकृत किया है, जिससे जल उपयोग दक्षता बढ़ाई जा सके। वर्ष 2023-24 से 2025-26 के दौरान परिषद ने 457 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए, जिनसे 8,749 किसान और 4,592 कृषि विस्तार कार्यकर्ता लाभान्वित हुए।

सरकार की विभिन्न योजनाओं से मिलेगा सहयोग

केंद्र सरकार प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PM-DDKY), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), प्रति बूंद अधिक फसल, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, वाटरशेड विकास कार्यक्रम और राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) जैसी योजनाओं के माध्यम से टिकाऊ कृषि, सूक्ष्म सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा दे रही है।

जलवायु अनुकूल खेती पर भी फोकस

आईसीएआर जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिए वर्षा जल संचयन, खेत तालाब, भूजल पुनर्भरण, संरक्षण कृषि, सूक्ष्म सिंचाई, ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली, सीधे बुवाई वाले धान (DSR), सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन (SRI), एआई एवं मौसम आधारित सिंचाई सलाह, जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों तथा कृषि वानिकी जैसी तकनीकों को बढ़ावा दे रहा है। इसके अलावा राष्ट्रीय नवाचार जलवायु अनुकूल कृषि (NICRA) के तहत 151 संवेदनशील जिलों में जलवायु अनुकूल गांव विकसित किए जा रहे हैं और 651 जिलों के लिए कृषि आकस्मिकता योजनाएं तैयार की गई हैं।

कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने मंगलवार को लोकसभा में एक लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

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