कपास उत्पादक क्षेत्रों में 2040 तक गंभीर जलवायु परिवर्तन होंगे

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कार्बन उत्सर्जन के दुष्परिणाम

  • ( निमिष गंगराड़े, नई दिल्ली)

21  अगस्त 2021, नई दिल्ली कपास उत्पादक क्षेत्रों में 2040 तक गंभीर जलवायु परिवर्तन होंगे– कपास उत्पादन के लिए जलवायु जोखिमों का अपनी तरह का पहला वैश्विक विश्लेषण जिसमें भारत की नगदी फसल कपास से जुड़े आर्थिक-सामाजिक पहलुओं का विश्लेषण भी किया गया है।

यदि देश में कार्बन उत्सर्जन अधिक रहता है तो वर्ष 2040 तक, भारत के कपास क्षेत्रों में से एक तिहाई क्षेत्र को अधिक तापमान, पानी की उपलब्धता में परिवर्तन, और मौसम की अत्यधिक अस्थिरताओं का सामना करना पड़ सकता है।

cotton

वैश्विक कपास उत्पादन के लिए जलवायु जोखिमों के पहली तरह के विश्व स्तरीय विश्लेषण से पता चलता है कि 2040 तक जलवायु परिवर्तन तापमान वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में बदलाव और मौसम की चरम घटनाओं से विश्व में उच्च जोखिम वाली फसल कपास लगाने वाले आधे से अधिक क्षेत्रों पर संकट भी ला सकता है। विश्लेषण के तहत, जलवायु परिदृश्य की सबसे खराब स्थिति वाली संभावनाओं पर प्रकाश डाला गया है कि कपास उगाने वाले सभी वैश्विक क्षेत्रों में 2040 तक मौसम की कम से कम एक उथल-पुथल से जोखिम बढ़ेगा। हालांकि यह वृद्धि कम से लेकर बहुत अधिक तक है, दुनिया के कपास उगाने वाले आधे क्षेत्रों को कम से कम एक या बहुत अधिक जोखिम या भारी परिवर्तन का सामना करना पड़ेगा।
‘जलवायु परिवर्तन के लिए अनुकूलन – वैश्विक कपास उत्पादन के लिए भौतिक जोखिम मूल्यांकन’ “Adapting to climate change – physical risk assessment for global cotton production”, शीर्षक से, विश्लेषण को कॉटन 2040 इनिशिएटिव द्वारा कमीशन किया गया था, जिसे इंटरनेशनल सस्टेनेबिलिटी गैर-लाभकारी फोरम फॉर द फ्यूचर और लॉड्स फाउंडेशन द्वारा सहयोग दिया गया। यह विश्लेषण कॉटन 2040 के पार्टनर और क्लाइमेट-रिस्क स्पेशलिस्ट्स  Acclimatise द्वारा किया गया था, जो विलिस टावर्स वॉटसन के क्लाइमेट एंड रेजिलिएशन हब का हिस्सा है।

इस अध्ययन से आगे पता चलता है कि दुनिया के सभी कपास उगाने वाले क्षेत्रों पर सन् 2040 तक कम से कम जलवायु के एक खतरे से होने वाला जोखिम मंडराता रहेगा। पांच अन्य बड़े कपास उत्पादक देश- चीन, अमेरिका, ब्राजील, पाकिस्तान और तुर्की – भी इसी प्रकार के दौर से गुजर सकते हैं। विशेष रूप से जंगल की आग, सूखे और अत्यधिक वर्षा से जलवायु जोखिम में वृद्धि हुई है। दुनिया के दो क्षेत्रों – उत्तरी सूडान और मिस्र सहित उत्तर पश्चिमी अफ्रीका, और पश्चिमी और दक्षिणी एशिया के लिए समग्र रूप से उच्चतम जलवायु जोखिम का अनुमान है।
फोरम फॉर द फ्यूचर के मुख्य कार्यकारी सैली उरेन ने कहा- गारमेंट इंडस्ट्री वर्तमान में भारतीय कपास पर अत्यधिक निर्भर है और यह विश्लेषण व्यापक कपास उद्योग के लिए सचेत होने का समय है। क्षेत्र के जलवायु लचीलेपन के निर्माण के लिए, कपास उत्पादन के स्थायी रूपों में व्यापक बदलाव को कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए, मिलकर व्यापक कार्रवाई की जाना चाहिए, साथ ही साक्षरता, लिंग, डिजिटल पहुंच और वित्तीय सुविधा जैसे मुद्दों के साथ सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में भी निवेश करना चाहिए।

एलेस्टेयर बागली, निदेशक, कॉरपोरेट्स – क्लाइमेट एंड रेजिलिएशन हब, विलिस टॉवर वॉटसन के अनुसार- भारत सहित अधिकांश देश उत्सर्जन में कमी करने की प्रतिबद्धताओं और लक्ष्यों से दूर है, जिसका अर्थ है कि इस सदी के अंत तक 3 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वार्मिंग संभव है। डीकार्बोनाइजेशन के साथ हम कितने भी सफल हों- हमें आने वाले दशकों में अपरिहार्य जलवायु परिवर्तन और उथल-पुथल का सामना करना होगा। यदि हम समाज पर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को सीमित करना चाहते हैं तो आज से ही तैयारी जरूरी है।

वैश्विक कपड़ा बाजार में उपयोग किए जाने वाले सभी प्रकार के रॉ मटेरियल में केवल कपास की हिस्सेदारी ही लगभग 31 प्रतिशत है, जो सब मिला कर 600 अरब डॉलर से अधिक है। भारत विश्व स्तर पर सबसे अधिक कपास उगाने वाला देश है, जिसकी वैल्यू चैन में लगभग 6 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं जिसमें कपास व्यापार और उसके प्रसंस्करण में लगभग 4 से 5 करोड़ लोगों का रोजगार भी शामिल है। भारतीय कपास का अधिकांश भाग 1 हेक्टेयर से कम के छोटे खेतों में उगाया जाता है। सीआरवीए अध्ययन भारत के तीन प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात और तेलंगाना के 13 जिलों में कपास की खेती और कपास प्रसंस्करण पर केंद्रित है।

इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी काउंसिल (आईसीएसी) की प्रोजेक्ट कंसल्टेंट संध्या क्रांति ने कहा- जलवायु परिवर्तन का वर्षा आधारित कपास उत्पादन पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। भारत में बारानी कपास का क्षेत्र दुनिया में सबसे बड़ा है, साथ ही कपास किसानों की संख्या भी अधिक है जो वर्षा आधारित परिस्थितियों में कपास की खेती करते हैं। जलवायु में कोई भी परिवर्तन उनकी आजीविका में बदलाव को प्रभावित करेगा, जिसे भारत झेल नहीं सकता।

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