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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

बायो-बिटुमेन से सड़क निर्माण की ऐतिहासिक पहल: पराली बनेगी किसानों की आय का नया स्रोत – शिवराज सिंह चौहान

30 मार्च 2026, नई दिल्ली: बायो-बिटुमेन से सड़क निर्माण की ऐतिहासिक पहल: पराली बनेगी किसानों की आय का नया स्रोत – शिवराज सिंह चौहान – केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पराली से बायो-बिटुमेन बनाकर सड़क निर्माण तक पहुँचने की यह पहल भारत के लिए ऐतिहासिक और भविष्य की दिशा तय करने वाली है। उन्होंने इसे किसानों की आय बढ़ाने, पर्यावरण संरक्षण, आत्मनिर्भरता और स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने वाली एक साथ कई लक्ष्यों को साधने वाली पहल बताया।

वे सीएसआईआर मुख्यालय (CSIR), नई दिल्ली में आयोजित “लिग्नोसेल्युलोसिक बायोमास से बायो-बिटुमेन – फार्म रेजिड्यू टू रोड्स” विषयक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, वैज्ञानिक और किसान भी उपस्थित रहे।

महावीर जयंती पर अहिंसा का संदेश

श्री चौहान ने अपने संबोधन की शुरुआत भगवान महावीर को नमन करते हुए की और कहा कि जो व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है वही सच्चा विजेता होता है। उन्होंने कहा कि आज के वैश्विक माहौल में सत्य, अहिंसा और संयम की शिक्षाएँ और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं।

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उन्होंने पराली जलाने को भी अहिंसा के विरुद्ध बताया और कहा कि इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान होता है, बल्कि असंख्य जीव-जंतुओं का जीवन भी नष्ट हो जाता है।

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पराली की समस्या से समाधान तक का सफर

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पहले गांवों में पराली का उपयोग पशुओं के चारे और अन्य घरेलू कार्यों में हो जाता था, इसलिए इसे जलाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन आधुनिक खेती और समय की कमी के कारण अब किसान इसे जलाने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

उन्होंने बताया कि सरकार ने डायरेक्ट सीडिंग जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया है, जिससे पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली जलाने की घटनाएँ कम हुई हैं। अब बायो-बिटुमेन तकनीक से पराली को आय का स्रोत बनाया जा सकता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त लाभ मिलेगा।

किसानों की आय बढ़ेगी, पर्यावरण भी बचेगा

श्री चौहान ने कहा कि जैसे पहले बेकार समझा जाने वाला तेल अब उपयोगी बन गया है, वैसे ही अब पराली भी मूल्यवान संसाधन बनेगी। इससे किसानों की आय बढ़ेगी और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम

उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के समय में भारत को आत्मनिर्भर बनना बेहद जरूरी है। बायो-बिटुमेन के उपयोग से बिटुमेन के आयात में कमी आएगी, जिससे देश को लगभग साढ़े चार हजार करोड़ रुपये का सीधा लाभ हो सकता है।

उन्होंने कहा कि सही नीति, स्पष्ट उद्देश्य और मजबूत नेतृत्व के साथ एक कदम कई समस्याओं का समाधान बन सकता है, और यह पहल उसका उदाहरण है।

प्राचीन विज्ञान से आधुनिक शोध तक भारत की ताकत

श्री चौहान ने कहा कि भारत की वैज्ञानिक परंपरा बहुत प्राचीन है, जिसमें आर्यभट्ट, सुश्रुत, चरक, कणाद, भास्कराचार्य, नागार्जुन, वराहमिहिर, बौधायन, महर्षि पराशर और ऋषि कश्यप जैसे महान विद्वानों का योगदान रहा है।

उन्होंने कहा कि आज के वैज्ञानिक देश के विकास के नायक हैं, जो ज्ञान, परिश्रम और नवाचार के माध्यम से खेती और विज्ञान को एक साथ जोड़ रहे हैं।

खाद्य सुरक्षा और नई किस्मों पर काम

उन्होंने बताया कि भारत आज चावल उत्पादन में विश्व में अग्रणी है और कभी विदेशों से गेहूं मंगाने वाला देश आज उच्च गुणवत्ता वाले गेहूं और बासमती चावल का निर्यात कर रहा है।

उन्होंने कहा कि देश की बढ़ती आबादी को देखते हुए दलहन, तिलहन, फल और सब्जियों में आत्मनिर्भरता जरूरी है। इसके लिए वैज्ञानिक ऐसी किस्मों का विकास कर रहे हैं जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बीच भी अच्छा उत्पादन दे सकें।

विज्ञान और किसानों की साझेदारी से विकसित भारत का लक्ष्य

केंद्रीय मंत्री ने विश्वास जताया कि वैज्ञानिक संस्थानों और किसानों के संयुक्त प्रयास से पराली से बायो-बिटुमेन, बायो-ईंधन और अन्य नवाचारों के माध्यम से भारत को विकसित और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि यह पहल खेत, खलिहान और प्रयोगशाला को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।

किसान ही देश की ताकत

श्री चौहान ने कहा कि भारत गांवों का देश है और किसान उसकी आत्मा हैं। उन्होंने कहा कि किसानों की सेवा करना उनके लिए भगवान की पूजा के समान है।

उन्होंने इस पहल को “मिट्टी की खुशबू को मशीन की ताकत से जोड़ने” और “खेत के अवशेष को देश की ताकत में बदलने” वाला कदम बताया।

बायो-बिटुमेन से कई लाभ एक साथ

कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में यह पहल बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुनिया आयात पर निर्भरता कम करने के विकल्प तलाश रही है।

उन्होंने कहा कि बायो-बिटुमेन के उपयोग से पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम होगी और पर्यावरण संरक्षण में मदद मिलेगी। साथ ही “कचरे से संपत्ति” बनाने की दिशा में यह एक बड़ा कदम है।

उन्होंने बताया कि इस तकनीक से देश में आयातित बिटुमेन पर होने वाला हजारों करोड़ रुपये का खर्च भी कम किया जा सकता है।\

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