कृषि कंपनी समाचार (Industry News)

क्रॉपलाइफ इंडिया ने किसानों के लिए घटते फसल संरक्षण विकल्पों पर जताई चिंता

18 सितंबर 2026, नई दिल्ली: क्रॉपलाइफ इंडिया ने किसानों के लिए घटते फसल संरक्षण विकल्पों पर जताई चिंता – क्रॉपलाइफ इंडिया ने भारतीय किसानों के लिए उपलब्ध फसल संरक्षण समाधानों के सीमित होते दायरे पर चिंता जताते हुए सरकार से इस मुद्दे पर शीघ्र कदम उठाने का आग्रह किया है। संगठन के अनुसार, भारत में किसानों के पास वर्तमान में लगभग 380 एक्टिव इंग्रीडिएंट्स (एआई) उपलब्ध हैं, जबकि दुनियाभर में किसानों के लिए करीब 1,200 एक्टिव इंग्रीडिएंट्स उपलब्ध हैं।

क्रॉपलाइफ इंडिया ने कहा कि बेहतर विकल्प उपलब्ध हुए बिना मौजूदा फसल संरक्षण समाधानों पर प्रतिबंध किसानों के लिए दोहरी चुनौती पैदा कर सकते हैं।

संगठन ने इस अंतर को दूर करने के लिए दो-स्तरीय दृष्टिकोण प्रस्तावित किया है। इसके तहत मौजूदा मॉलिक्यूल्स पर किसी भी तरह का प्रतिबंध स्थापित वैज्ञानिक साहित्य के आधार पर होना चाहिए, जिसमें संबंधित परिस्थितियों में सुरक्षा, स्वास्थ्य और प्रभावशीलता से जुड़े आंकड़ों को शामिल किया जाए। साथ ही, किसानों पर पड़ने वाले प्रभाव का भी आकलन किया जाना चाहिए।

दूसरा प्रस्ताव भारत के नियामक ढांचे में पांच वर्ष की रेगुलेटरी डेटा प्रोटेक्शन (आरडीपी) व्यवस्था लागू करने का है। आरडीपी के तहत देश में किसी नए उत्पाद के पंजीकरण के लिए तैयार किए जाने वाले रेगुलेटरी डेटा को निर्धारित अवधि तक संरक्षण दिया जाएगा।

क्रॉपलाइफ इंडिया के अनुसार, इससे किसानों के लिए उपलब्ध फसल संरक्षण समाधानों के विकल्प बढ़ सकते हैं और दुनियाभर में उपलब्ध नई एवं अधिक प्रभावी तकनीकों को भारत में लाने के लिए निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है। कंपनी द्वारा सुरक्षा, स्वास्थ्य और भारतीय परिस्थितियों में प्रभावशीलता से संबंधित अध्ययनों पर किए गए निवेश को संरक्षण मिलने से नई तकनीकों के तेजी से पंजीकरण और उपलब्धता को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।

धनुका एग्रीटेक लिमिटेड के प्रबंध निदेशक राहुल धनुका ने कहा, “एल नीनो और जलवायु परिवर्तन जैसे कारक किसानों के लिए कीट दबाव को और अधिक गतिशील और चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं। इसलिए एक ऐसे मजबूत ढांचे की तत्काल आवश्यकता है, जो बेहतर विज्ञान, नवाचार और प्रौद्योगिकी आधारित उत्पादों के प्रवेश की अनुमति दे तथा किसानों को बदलती कीट परिस्थितियों से निपटने में मदद कर सके।”

उन्होंने कहा, “आरडीपी मौजूदा रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को बेहतर बनाएगा, बेहतर तकनीक के प्रवेश की अनुमति देगा और एविडेंस-बेस्ड फेजिंग आउट में मदद करेगा।”

नई फसल संरक्षण तकनीकों को प्रोत्साहन देने के लिए आरडीपी

क्रॉपलाइफ इंडिया ने कहा कि रेगुलेटरी डेटा प्रोटेक्शन के अभाव में किसानों को नई तकनीकों तक पहुंच मिलने में बाधा आ रही है। साथ ही, रेगुलेटरी डेटा की अनुचित नकल या इस्तेमाल की आशंका उद्योग में नए उत्पादों और तकनीकों के लिए निवेश को हतोत्साहित कर सकती है।

संगठन के अनुसार, आरडीपी की व्यवस्था भारत के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को प्रमुख वैश्विक बाजारों में अपनाई जाने वाली व्यवस्थाओं के अनुरूप लाने में भी मदद कर सकती है। चीन, इंडोनेशिया और मलेशिया में छह वर्ष तक, जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा, थाईलैंड, ब्राजील और कोलंबिया में दस वर्ष तक का प्रोटेक्शन उपलब्ध है। ऑस्ट्रेलिया, ताइवान और फिलीपींस में यह अवधि आठ वर्ष तक है।

क्रॉपलाइफ इंडिया के वाइस चेयरमैन और बायर क्रॉपसाइंस लिमिटेड के सीओओ मोहन बाबू बोप्पना ने कहा कि टाइम-बाउंड आरडीपी व्यवस्था वैश्विक स्तर पर इनोवेशन और फेयर कॉम्पिटिशन को बढ़ावा देने में मददगार रही है।

उन्होंने कहा, “ईयू, उदाहरण के लिए, ग्रीन मॉलिक्यूल्स के रजिस्ट्रेशन को प्रोत्साहित करने के लिए 13 वर्ष तक का प्रोटेक्शन प्रदान करता है। भारत अपने फ्रेमवर्क को ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिसेज के अनुरूप बनाकर किसानों के लिए चॉइस बास्केट का विस्तार कर सकता है और सीमित विकल्पों पर निर्भरता कम कर सकता है। इससे भारतीय क्रॉप प्रोटेक्शन इंडस्ट्री को ग्लोबल वैल्यू चेन में आगे बढ़ने में भी मदद मिलेगी।”

उन्होंने कहा, “आरडीपी किसानों के लिए बेहतर सॉल्यूशंस उपलब्ध कराने, सरकार के लिए देश में सुरक्षित तरीके से अधिक खाद्य उत्पादन में मदद करने और उद्योग के लिए किसानों तक लगातार नई टेक्नोलॉजी पहुंचाने के प्रोत्साहन के लिहाज से विन-विन हो सकता है।”

बोप्पना ने नई तकनीकों और ग्रीन मॉलिक्यूल्स की भूमिका पर भी जोर दिया।

“न्यू मॉलिक्यूल्स, जिसमें इंडस्ट्री द्वारा लाए जा सकने वाले ग्रीन मॉलिक्यूल्स भी शामिल हैं, अधिक सिलेक्टिव तरीके से काम करते हैं। वे फ्लोरा और फॉना को होने वाले अनइंटेंडेड डैमेज से बचाते हैं और इनके एप्लीकेशन की मात्रा भी काफी कम होती है। इसलिए वे किसान के लिए अधिक इकोनॉमिकल और पर्यावरण के लिए अधिक सुरक्षित हो सकते हैं,” उन्होंने कहा।

बदलता कीट दबाव बढ़ा रहा चुनौती

क्रॉपलाइफ इंडिया के अनुसार, भारतीय किसान हर साल कीटों और रोगों के कारण अपनी फसल का लगभग 10 से 35 प्रतिशत हिस्सा खो देते हैं, जिससे करीब 2 लाख करोड़ रुपये का वार्षिक नुकसान होता है।

संगठन ने कहा कि एल नीनो और जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों के कारण कीट दबाव अधिक डायनेमिक हो रहा है। ऐसे में किसानों के पास फसल संरक्षण के लिए व्यापक विकल्प उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है।

बासफ एग्रीकल्चरल सॉल्यूशंस, इंडिया के बिजनेस डायरेक्टर गिरिधर रानुवा ने कहा, “भारतीय किसानों के लिए उपलब्ध फसल संरक्षण समाधानों को रिफ्रेश और एक्सपैंड करने के लिए एक होलिस्टिक फ्रेमवर्क की आवश्यकता है, जिसे मजबूत और साइंस-बेस्ड रेगुलेटरी गार्डरेल्स का समर्थन प्राप्त हो।”

उन्होंने कहा कि टाइम-बाउंड रेगुलेटरी डेटा प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क नई और बेहतर तकनीकों की शुरुआत को प्रोत्साहित कर सकता है, जिससे किसानों को कीटों से होने वाले फसल नुकसान से बेहतर तरीके से निपटने, कृषि उत्पादकता और आय को मजबूत करने तथा भारत के विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों में योगदान देने में मदद मिल सकती है।

क्रॉपलाइफ इंडिया ने हाई-वैल्यू मार्केट्स में बढ़ती रेगुलेटरी सख्ती का भी उल्लेख किया। विशेष रूप से यूरोपीय संघ में विभिन्न क्रॉप प्रोटेक्शन मॉलिक्यूल्स पर लागू मैक्सिमम रेजिड्यू लिमिट्स के अधिक कड़े होने के बीच संगठन ने कहा कि बेहतर तकनीकों तक पहुंच किसानों और निर्यातकों को इन आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद कर सकती है।

संगठन ने सरकार से ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से क्रॉप प्रोटेक्शन प्रोडक्ट्स की बिक्री को भी रेगुलेट करने का आग्रह किया है। इसके तहत लाइसेंसिंग ऑब्लिगेशंस और डिजिटल ट्रेसेबिलिटी जैसे उपायों के जरिए ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर अनऑथराइज्ड प्रोडक्ट्स की बिक्री को रोकने का प्रस्ताव है।

क्रॉपलाइफ इंडिया ने कहा कि किसानों के लिए व्यापक और बेहतर फसल संरक्षण विकल्प उपलब्ध कराने के लिए मजबूत, साइंस-बेस्ड रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के साथ नई तकनीकों के प्रवेश को भी गति देना आवश्यक है।


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