खेती में उर्वरकों का सही उपयोग कब ?

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खेती में उर्वरकों का सही उपयोग कब ?

खेती में उर्वरकों का सही उपयोग कब – खरीफ फसलों का उत्पादन बढ़ाने में बीज के बाद उर्वरकों का योगदान सबसे अधिक रहा है। परंतु किसान अभी भी उर्वरकों का प्रयोग फसलों की आवश्यकता तथा पोषक तत्वों की उनके खेत में उपलब्धता के आधार पर नहीं कर रहे हैं। इसका एक मुख्य कारण उनकी भूमि पोषक तत्वों की मात्रा ज्ञात करने की जटिलता तथा उसके प्रति किसानों की उदासीनता मुख्य कारण है।

आशा है भारत सरकार द्वारा स्वाइल हेल्थ कार्ड योजना किसानों की इस उदासीनता को तोडऩे में सक्षम होगी। स्वाइल हेल्थ कार्ड द्वारा किसान को उसकी भूमि की सही स्थिति तथा उसमें उपलब्ध पोषक तत्वों की जानकारी मिलेगी जिसके आधार पर वह अपनी फसलों में संतुलित पोषक तत्वों का प्रयोग कर फसल की लागत को भी कम कर पायेगा परंतु मिट्टी के नमूने से लेकर प्रयोगशाला उसके विश्लेषण में जाने – अनजाने में हुई भूल या लापरवाही इस पूरी योजना की सफलता पर प्रश्न चिन्ह लगा सकती है जिसके परिणाम सिर्फ और सिर्फ किसान को ही भुगतने होंगे। इसलिए इस योजना की सफलता किसान की जागरूकता पर ही निर्भर करती है।

जागरुक किसान नत्रजन व फास्फोरस का महत्व समझने लगे हैं और वह विभिन्न फसलों में इनके सही अनुपात को उपयोग में ला रहे हैं। परंतु अभी बहुत से किसान ऐसे भी है जो फास्फोरस युक्त उर्वरकों को खड़ी फसल में दे रहे हैं। इस ओर भी जागरूकता लाना भी आवश्यक है। उर्वरकों के उपयोग के आरंभ के वर्षों में तीसरे प्रमुख तत्व पोटाश की प्रदेश के अधिकांश जिलों की भूमि में देने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि यह मिट्टी में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। अधिक उपज देने वाली जातियां आने के बाद पोटाश की मिट्टी में शनै: शनै: मात्रा कम होती चली गयी और अब उपज के स्तर को बनाये रखने के लिये इसकी भूमि में आपूर्ति आवश्यक हो गयी है।

इसकी कमी के लक्षण भी सोयाबीन व अन्य फसलों में दिखने लगे हैं, पत्तियों के बाहरी ओर पीलापन आने से इसकी कमी को पहचाना जा सकता है। गहरी जड़ों वाली फसलों में इसका उपयोग बीज बोने के पूर्व या बीज बोते समय करना चाहिए। खरीफ में प्रदेश में सोयाबीन फसल का रकबा लगभग 55-58 लाख हेक्टर रहता है। तिलहनी फसल होने के कारण इस फसल में अन्य तत्वों के अतिरिक्त गंधक की भी आवश्यकता होती है क्योंकि गंधक में तेल बनाने की प्रक्रिया में एक आवश्यक तत्व है। इसके प्रति सोयाबीन उगाने वाला किसान सोचता भी नहीं। वह अधिकतर फास्फोरस तथा नत्रजन की आपूर्ति डीएपी द्वारा कर लेता है।

गंधक की आपूर्ति किसान बिना लागत बढ़ाये कर सकता है इसके लिए उसे डीएपी का मोह छोड़कर फास्फोरस की आपूर्ति सिंगल सुपर फास्फेट से करनी होगी जिससे फसल को 16 प्रतिशत फास्फोरस के अतिरिक्त 12 प्रतिशत गंधक तथा 21 प्रतिशत कैल्शियम भी मिल जाता है। स्वाइल हेल्थ कार्ड किसानों को एक दिशा-निर्देश तो दे सकता है परंतु यह समाधान नहीं। इसके लिए किसी निर्धारित क्षेत्र के स्वाइल हेल्थ कार्ड का वैज्ञानिक अध्ययन करना होगा। उसके बाद निकले निष्कर्षों के आधार पर किसान को उचित सलाह देनी होगी तभी इस योजना का लाभ होगा। एक क्षेत्र के मिट्टी के नमूनों को 4-5 विभिन्न प्रयोगशाला में भिजवा कर उनका परीक्षण करना होगा तभी हम किसी निष्कर्ष पर पहुंच पायेंगे अन्यथा शंका में ही घिरे रहेंगे।

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