गुलाब में रोग प्रबंधन

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15 फरवरी 2021, भोपाल। गुलाब में रोग प्रबंधन- पुष्प जगत में गुलाब का एक विशिष्ट स्थान है। गुलाब को फूलों की रानी के नाम से भी जाना जाता है। गुलाब एक कर्तित पुष्प है, जिसका विश्व में व्यापक रूप से व्यापार किया जाता है। कर्तित पुष्पों की मांग, भारत सहित सारे विश्व में 11-12 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रही है। गुलाब का उत्पादन महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, हरियाणा, तमिलनाडु, राजस्थान तथा पश्चिम बंगाल, आदि राज्यों में किया जा रहा है। गुलाब का प्रयोग मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों, विभिन्न त्यौहारों, शादी-विवाह के मंडपों आदि के सौन्दर्यकरण व गुलदस्ते बनाने में किया जाता है। इसके अलावा गुलाब को इत्र, गुलाब जल तथा गुलकन्द बनाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। गुलाब से बने उत्पादों को औषध्ेिंा के रूप में उपयोग और उपलब्ध्ता के साथ-साथ रोगों के प्रकोप में भी बढ़ोत्तरी हुई है। एकीकृत रोग प्रबंधन के अंतर्गत यदि किसान पौध उपचार, मृदा उपचार, खेत की निगरानी, रोगों के नुकसान का लक्षण, उनके नुकसान करने का समय व ढंग, प्रभावी नियंत्रण हेतु उन्नत शस्य क्रियाओं, जैविक नियंत्रण, जैविक फफूंदनाशकों तथा मान्यता प्राप्त रसायनों के सुरक्षित प्रयोग इत्यादि पर ध्यान दें तो रोगों का समन्वित प्रबंधन करते हुए उत्पादकता में भी उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है, जो गुलाब की खेती के व्यावसायिक विकास में सहायक सिद्ध होगी।

चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्डयू)
यह रोग ”स्पफैरोथेका पन्नोसा किस्म रोजेÓÓ नामक फफूंद से होता है। गर्म एवं शुष्क मौसम तथा ठण्डी रातें इस रोग के लिए अनुकूल होती हैं। खेतों में 15.5 डिग्री सेल्सियस का रात्रि तापमान और 90 से 99 प्रतिशत की सापेक्षिक आद्र्रता, के उत्पादन व उसके अंकुरण को बढ़ाती है, जिससे रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। इसका प्रकोप पौध के सभी बाहरी भागों पर होता है। नयी कोमल पत्तियां ऐंठ जाती हैं तथा उनकी ऊपरी सतह पर फफोले पड़ जाते हैं, जो सफेद चूर्ण से ढके होते हैं।

पत्तियों, पुष्प वृंत तथा पुष्प कलिकाओं पर भूरे-सफेद चूर्णिल धब्बे दिखाई पड़ते हैं और यह फफूंद धीरे-धीरे पूरे पौध पर सफेद चूर्ण के रूप में फैल जाती है। सवंमित पत्तियां कुरूप हो जाती हैं। रोगग्रस्त कलियां नहीं खिल पाती हैं। पौध झुलसा हुआ दिखाई देता है। रोग का प्रकोप अधिक होने पर पत्तियों की वृद्धि एवं प्रकाश संश्लेषण की क्रिया-विधि में कमी आने लगती है। कर्तित पुष्पों का बाजारी भाव कम हो जाता है।

प्रबंधन

  • गुलाब की रोग-रोधी किस्मों का उपयोग करें।
  • रोग ग्रसित शाखाओं व टहनियों को काटकर जला दें।
  • खेत में गिरी हुई पत्तियों को एकत्रित कर नष्ट कर दें। खेत में नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों को कम मात्रा में दें तथा स्प्रिंकलर सिस्टम से सिंचाई करें।
  •  जैविक नियंत्रण में जैसे एम्पिलोमाइसीज क्विसकबालिस तथा स्युडोजाइमा फ्रलोकुलोजा जैव कारक के व्यापारिक सूत्राण का छिड़काव करें।
  •  रोग से बचाव के लिए घुलनशील गंधक 2 ग्राम/ लीटर या कैराथेन 1 मि.ली./ लीटर या बैनलेट 1 मि.ली./ लीटर या बाविस्टीन 2 ग्राम/ लीटर घोल का छिड़काव प्रत्येक 10-15 दिन अंतराल पर 2 से 3 छिड़काव करें।
    काला धब्बा (ब्लैक स्पॉट)
    यह रोग ‘डिप्लोकार्पन रोजैड़Ó नामक फफूंद से होता है। यह गुलाब का विश्वव्यापी रोग है। यह रोग बरसात या अधिक आद्र्रता एवं ठण्ड के मौसम में अधिक फैलता है। पत्तियों के ऊपरी सतह पर 2-15 मि.मी. व्यास के वृत्ताकार काले धब्बे पड़ जाते हैं। ये धब्बे गोल या बेडौल होकर एक साथ जुड़ते जाते हैं जिससे पत्तियों के किनारे मुड़ जाते हैं। एक गहरे वृताकार या अनियमित आकार में छोटे-छोटे काले रंग के बिजाणुओं में कॉनिडिया सतह पर दिखाई देते हैं। इसके बाद पत्तियां पीली होकर गिर जाती हैं, तना तथा शाखायें सूख जाती हैं।
    प्रबंधन
  • इस रोग से निजात पाने के लिए ऊत्तक संवर्धन से तैयार पौधों का प्रयोग करें।
  • पौधे पर अधिक समय तक लगातार सिंचाई न करें।
  • भूमि की सतह के पास की पत्तियों की कटाई-छंटाई नियमित रूप से करें। पौधे को अधिक सघनता पर न लगाएं और पौधे में अच्छा वायु संचार होने दें। रोग-रोधीे किस्मों का उपयोग करें।
  • रोग ग्रसित पत्तियों व टहनियों को एकत्रित करके जला दें तथा खेत की सफाई पर ध्यान दें।
  • रोग से बचाव के लिए क्लोरोथैलोनिल 2 ग्राम/लीटर या फर्बाम 2 ग्राम/लीटर या बैनलेट 1 मि.ली./लीटर के घोल का छिड़काव करें।
    उकठा (डाई बैक)
    यह रोग ‘डिप्लोडिया रोजेरम, कॉलेटोट्रिकम ग्लिओस्पोराइडिसÓ नामक कवक से होता है। इस रोग के आक्रमण से पौध्ेा ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगते हैं। रोग मुख्य रूप से काटी-छांटी गयी शाखाओं की ऊपरी सतह से शुरू होता है। शाखाएं भूरे-काले रंग की हो जाती हैं। बाद में रोग शाखा से मुख्य तना तथा तने से जड में फैलता है। गंभीर प्रकोप होने पर पौध मर जाता है। रोग नए पौधे की अपेक्षा पुराने पौधे पर जल्दी और अधिक होता है। फफूंद के बीजाणु साल भर पौधे की शाखाओ के कांटों में मौजूद रहते हैं। ये प्रभावित भागों पर गोल, गहरे रंग के धब्बे बनाते हैं। इनके आक्रमण से छाल पर गहरे भूरे रंग के बाहरी क्षतचिन्ह बन जाते हैं। प्राय: तने की छाल पर पाये जाने वाले क्षतचिन्ह उकठा या डाईबैक में बदल जाते हैं। इस रोग से फूलों के उत्पादन पर भारी गिरावट होती है।
    प्रबंधन
  • रोग से निजात पाने के लिए ऊत्तक संवर्धन से तैयार पौधों का प्रयोग करें।
  • रोग ग्रस्त शाखाएं, सूखी टहनियों और मुरझाए फूलों के डंठलों को काटकर जला दें।
  • कटाई-छंटाई के बाद शाखाओं पर 4 भाग कॉपर कार्बोनेट, 4 भाग रेड लैड और 5 भाग अलसी के तेल का अच्छी तरह से मिश्रण बनाकर उसका लेप करें।
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