बीज परीक्षण क्यों और कैसे

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बीज परीक्षण बीज उत्पादन कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसमें बीजों के नमूने की जांच की जाती है। बीज परीक्षण प्रयोगशाला का मुख्य कार्य भारत शासनद्वारा अधिसूचित फसल किस्मों के बीज नमूनों का परीक्षण बीज निगम 1968 के तहत किया जाता है। ताकि कृषकों को उच्च गुणवत्ता वाला बीज उपलब्ध हो सके। बीज परीक्षण, प्रमाणीकरण/उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत आधार एवं प्रमाणित (सर्विस सेम्पल के रूप में प्रजनक) बीजों की भौतिक शुद्धता, अंकुरण, आद्र्रता, अन्य पहचान योग्य किस्म एवं बीज स्वास्थ्य का परीक्षण किया जाता है किसी भी पंजीकृत बीज फसल को ‘खेत स्तर’ पर मानक अनुरूप फसल से उत्पादित बीज संबंधित प्रक्रिया केन्द्र पर प्राप्त हुआ और उसका संसाधन उपरांत प्रमाणीकरण संस्था के प्रतिनिधि द्वारा नमूने निर्धारित मात्रा में उत्पादक/उत्पादित संस्था की उपस्थिति में लाट अनुसार लेकर बीज गुणवत्ता की जांच हेतु मुख्यालय द्वारा कोडिंग कर बीज परीक्षण प्रयोगशालाओं में परीक्षण हेतु भेजे जाते हैं। वहां निम्नानुसार जांच की जाती है।

भौतिक शुद्धता परीक्षण
भौतिक शुद्धता परीक्षण बीज नमूने में संबंधित फसल के बीजों के अतिरिक्त अन्य फसलों, खरपतवार, आपत्तिजनक खरपतवार के बीज एवं अक्रिय पदार्थ जैसे मिट्टी, लकड़ी, छिलके, कंकड़, कचड़ा आदि बीजों की शुद्धता का विश्लेषण इन्हीं सब घटकों का भार के आधार पर प्रतिशत ज्ञात किया जाता है। जिससे ज्ञात हो सके कि बीज भौतिक रूप से मानकों के अनुरूप हे अथवा नहीं। इसकी जांच निम्न घटकों में पूर्ण होती है।

शुद्ध बीज
शुद्ध बीज से तात्पर्य केवल संबंधित किस्म और प्रकार के बीजों से है जिसमें परिपक्व, छोटे आकार, सुकड़े एवं टुटे हुये बीज जो मूल आकार के आधे से अधिक हो को शुद्ध बीज माना जाता है।

अन्य फसलों के बीज
परीक्षण किये जा रहे फसल के बीजों में अन्य किसी भी फसल के बीज उपस्थित हों (संबंधित किस्म के शुद्ध बीजों के अतिरिक्त) उन्हें अन्य फसलों के बीज माना जाता है।

खरपतवार के बीज
नमूने में उपस्थित जैसे सांवा, अकरी, मुर्दो, केना आदि के बीजों को खरपतवार बीजों में निर्धारण किया जाता हे7

आपत्तिजनक खरपतवार के बीज
जैसे गेहूं में हिरनखुरी, प्लेरिस माईनर, धान से जंगली धान, भिंडी से जंगली भिंडी, जई से जंगली जई, सरसों से आर्जीमोनमैक्सीकाना आदि।
शुद्धता, पृथक्करण एवं तौलना
भौतिक शुद्धता परीक्षण नमूनों के उक्त चार घटकों को शुद्धता बोर्ड पर फैलाकर चिमटी, स्पेचुला की सहायता से अलग करने के बाद तोलकर भार के आधार पर सभी घटकों का प्रतिशत ज्ञात किया जाता है।

उपकरण
चिमटी, लैंस, भौतिक तुला, बीजविलौअर, स्पेचुआ, लैंप, बीज विभाजक, माईक्रोस्कोप आदि।
अन्य पहचानी जा सकते वाली किस्मों (ओ.डी.व्ही.) का परीक्षण – अन्य पहचानी जा सकने वाली खरीफ में कोदो, कपास, मिर्च, बाजरा, कुकरबिटस, सूर्यमुखी। रबी में गेहूं, ग्वार, टमाटर, प्याज, कुसुम, बरसीम आदि को छोड़कर सभी फसलों में किया जाता है। ओ.डी.व्ही, परीक्षण मूलत: बीज के मोरफोलाजीकल लक्षण जैसे आकार एवं हाईलम कलर के आधार पर होता है। यदि बीज बाहरी कारकों बरसात पानी एवं वातावरण से प्रभावित है उसे शंकाग्रस्त बीज माना जाता है। स्पष्ट पहचान आने वाले बीजों को ओ.डी.व्ही. में निर्धारण किया जाता है। परीक्ष्ज्ञण वाले नमूने के बीजों को अच्छे प्रकाश में लैंस की सजायता से देखा जाता हे। सूक्ष्मदर्शी का भी प्रयोग होता है ‘विभिन्न किस्मों के बीज लक्षणों के आधार पर अन्य किस्मों के बीज को अलग किया जाता है। नमूने से अलग किये गये ओ.डी.व्ही. बीजों की संख्या अनुसार निर्धारण प्रति किलो में किया जाता है। जैसे -चना 10-20, मटर 5510, सोयाबीन 10-40 प्रति कि.ग्रा. आधार/प्रमाणित सभी फसलों में अलग-अलग होता है।

आद्र्रता परीक्षण
आद्र्रता परीक्षण हेतु यह सुविधा प्रक्रिया केन्द्रें पर भी उपलब्ध होती है जिससे नमी परीक्षण मात्र मास्चर मीटर से किया जाता है इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि बीजों में नमी का प्रतिशत प्रमाणीकरण मानकों के अनुरूप है अथवा नहीं, निकाला जाता हेै।

ओवन द्वारा
बीज को ग्राईडिंग कर गैस कंटेनर वाटल्स में रखकर वजन करके इसके पश्चात कंटेनर को प्रत्येक फसल हेतु निर्धारित तापमान एवं निर्धारित समय तक ओवन में रखकर सुखाया जाता है। सुखाने के पश्चात कंटेनर को पुन: वजन कर बीज के वजन में आयी कम को प्रतिशत में निकाल कर आद्र्रता प्रतिशत का निर्धारण किया जाता है।
एम= एम2-एम3 & 100
एम2-एम1
जहां-बीज में मौजूद नमी
एम1= खाली कंटेनर का ढक्कन सहित वजन
एम2= कंटेनर का ढक्कन एवं बीज सहित सुखाने के पूर्व वजन।
एम3 = कंटेनर का ढक्कन एवं बीज सहित सूखने के वजन।

स्वास्थ्य परीक्षण
गेहूं, धान, ज्वार एवं बाजरा केवल चार फसलों में स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है। उक्त बीमारियों की बीजों विजुअली देखकर तथा धान बंट को सोडियम हाईड्राक्साइड के 0.2 प्रतिशत के घोल में 24 घंटे तक 30 डिग्री सेल्सियस तापक्रम में बीज को भिगोकर बीमारी से प्रभावित बीजों को अलग कर प्रतिशत निर्धारित कर बीजों से प्राप्त कोनिडिया एवं स्पीर्स को माइक्रोस्कोप में देखकर निश्चित किया जाता है।

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