फसलों में सिंचाई प्रबंधन करें

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फसलों में सिंचाई प्रबंधन करें

फसलों में सिंचाई प्रबंधन करें – खेती प्रबंधनों की दासी है, आवश्यकता अन्न की अधिक है, बढ़ती जनसंख्या का बोझ जो हमारे ऊपर है। बुआई रकबा सीमित है इन परिस्थितियों में लक्षित उत्पादन के लिये कठोर प्रबंध ही एकमात्र रास्ता बच जाता है जिसको पकड़़कर कृषि की बढ़ती चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। सफल खेती के लिये खेत की तैयारी से लेकर कटाई एवं भंडारण तक यदि देखा जाये तो समुचित उत्पादन के पीछे प्रबंधन का ही हाथ होता है। खेती में जल की उपयोगिता और उपलब्ध जल की बूंद-बूंद को किस तरह से कृषि उत्पादन में लगाया जाये यह बात महत्वपूर्ण है।

प्रदेश की गहरी काली भूमि जो कुछ दशक पहले तक खरीफ के मौसम में उचित फसल के अभाव में खाली पड़ी फिरती थी। वर्तमान में सोयाबीन के कारण हरी-भरी दिखाई देने लगी है। और वर्षा का जो जल बेकार वह जाता था का सदउपयोग होने लगा। सोयाबीन की फसल में मानसून के अतिरेक और कभी दोनों को सहने की अभूतपूर्व क्षमता है परंतु यदि थोड़े से प्रयास से सोयाबीन के उत्पादन में उछाल लाया जाना सम्भव हो तो क्यों नहीं उसे अपनाकर अतिरिक्त उत्पादन प्राप्त करके आर्थिक क्षमता बढ़ा ली जाये। यदि गौर से देखा जाये तो इस छोटे प्रयास का बड़ा लाभ संभव है। सोयाबीन की 18-20 कतारों के बीच एक कतार छोड़कर उसका ‘थ्री इन वनÓ अर्थात् एक कार्य से तीन लाभ अर्जित किये जा सकते है।

अतिरिक्त वर्षा जल का संचय तथा उसका भविष्य में उपयोग, पौध संरक्षण कार्यों के लिये निरीक्षण पथ तथा मौका आने पर सिंचाई नाली ताकि जीवनरक्षक सिंचाई सम्भव हो सके यह सभी कार्य किये जा सकते हैं। इसी प्रकार धान की फसल को भी सतत 2-3 फीट पानी से भरे खेत की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है बल्कि प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि धान के खेत में केवल कल्ले फूटते समय तथा फूल आने के समय ही जमा/थमा पानी की आवश्यकता होती है वो भी अधिक से अधिक 3-4 इंच बस, अन्य समय में केवल खेत को यदि गीला रखा जाये तो वह अच्छे उत्पादन के लिये पर्याप्त होगा।

ऐसा करने से 30-40 प्रतिशत जल की बचत संभव होगी। प्रयोगों मेें यह भी पाया गया है कि कल्ले निकलते समय यदि भरा जल का खेत रहेगा तो विपरीत असर होगा, कम कल्ले फूटेंगे और इसका सीधा असर उत्पादन पर होगा। इस प्रकार कल्ले, फूल, दाना भरने की अवस्था में जल का यदि उचित प्रबंध किया जाये तो 60-65 क्विंटल प्रति हेक्टर तक उत्पादन लेना असंभव नहीं होगा। तमिलनाडु तथा आंध्रप्रदेश सरीखे धान उत्पादन प्रधान प्रदेशों में अनुसंधानों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि हर तीन दिन के अंतर से 3 दिनों के लिये धान के खेत से पानी निकालकर फिर भरते रहने से उतनी सी उपज मिलती है जितना 8 से.मी. पानी सतत खेत में भरा रहने दिया जाये। इस तरह खरीफ की दलहनी/तिलहनी फसलों को भी पुख्ता जल प्रबंध की आवश्यकता होती है।

दलहनी फसल अरहर जिसका उपयोग अमीर-गरीब सभी प्राय: रोज ही भोजन में करते हैं को पानी के उचित प्रबंध की बड़ी आवश्यकता होती है। अतिरिक्त जल से इसकी बढ़वार रुक जाती है। सतत निंदाई-गुड़़ाई और अतिरिक्त जल के निथार से इसका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। तिलहनी फसलों में मूंगफली, तिल को पानी के अतिरेक से बचाना आवश्यक होता है ताकि अच्छी बढ़वार होकर अच्छा उत्पादन मिल सके।

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