30 साल में कितना मजबूत हुआ लोकतंत्र ?

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पंचायती राज

  • सी.आर. बिजॉय
    (अनुवाद: विशाल कुमार जैन )

4 जुलाई 2022,  30 साल में कितना मजबूत हुआ लोकतंत्र ? – भारत में लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत करने के लिहाज से साल 1992 को मील का पत्थर माना जाता है। तीन दशक पहले इसी साल संविधान में 73वां (पंचायती राज के लिए) और 74वां (नगरपालिका और शहरी स्थानीय निकायों के लिए) संशोधन किया गया था। आजादी के बाद राजनीतिक लोकतंत्र को निचले पायदान तक ले जाने की दिशा में यह पहला ऐतिहासिक कदम था। इन संशोधनों का मकसद संविधान के अनुच्छेद 40 को हकीकत में बदलना था। संविधान का अनुच्छेद 40 नीति निदेशक सिद्धांतों में से एक सिद्धांत को समेटे हुए है और इसमें राज्य को ग्राम पंचायतों के गठन और पावर देने का सुझाव दिया गया है। इसमें कहा गया है कि राज्य न केवल ग्राम पंचायत को संगठित करे बल्कि इतनी शक्ति और अधिकार दे कि वे स्वशासन की एक इकाई के रूप में कार्य कर सकें।

अतीत की बातें

प्राचीन काल से ही भारत में ‘लोकतांत्रिक’ संस्थाओं का लंबा इतिहास रहा है। साझा संप्रभुता के आधार पर जुड़े इस समाज में, शक्ति और अधिकार का बंटवारा कुछ ऐसा रहा है कि गांव, स्वशासी ग्राम गणराज्य के रूप में कार्य करते रहे हैं।

भारत के कार्यवाहक गवर्नर-जनरल (1835-38) चाल्र्स टी. मेटकाफ ने लिखा था, ‘ग्राम समुदाय छोटे गणराज्य हैं, उनके पास अपनी जरूरत भर का लगभग सब कुछ मौजूद है.. केन्द्रीय सत्ता में कई वंश का शासन रहा। सब आए और निपट गए। पर ग्राम समुदाय जस के तस है… ग्राम समुदायों के इस संघ ने, अपने आप में एक अलग छोटे राज्य का गठन कर लिया है। भारत के लोगों के संरक्षण में इसने किसी भी अन्य वजहों से अधिक योगदान दिया है।’

पर अंग्रेजी हुकूमत में कर इत्यादि के संग्रह और लोगों तक सुविधाएं ले जाने के लिए मध्यस्थ ढांचे का खूब विकास हुआ और इस तरह ग्राम सभा के अधिकार कम होते गए। 1919 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट ने लोकप्रिय जनादेश के आधार पर स्थानीय स्वशासी संस्थाओं के लिए मार्ग प्रशस्त किया जिसका स्थानीय मामलों पर नियंत्रण होना था। ग्राम पंचायत अधिनियम को तब के मद्रास, बॉम्बे, मध्य प्रांत, बरार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार, असम और पंजाब में लागू किया गया। गर्वनमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 ने प्रांतीय स्वायत्तता और निर्वाचित सरकार की शुरुआत की।

फिर भी, पंचायती राज को संविधान के मसौदे में जगह नहीं मिली। तब यह दो धड़े की बहस में फंस गया। एक तरफ डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचार थे कि गांव ‘अज्ञानता, संकीर्ण मानसिकता और सांप्रदायिकता का अड्डा’ हैं तो दूसरी तरफ महात्मा गांधी का विचार था कि ‘भारतीय स्वतंत्रता सबसे नीचे से शुरू होनी चाहिए और यह सुनिश्चित होना चाहिए कि हर गांव आत्मनिर्भर और अपने मामलों के प्रबंधन में सक्षम हो’। इसका परिणाम यह हुआ कि इस मुद्दे को नीति निदेशक सिद्धांतों में ही जगह मिल पाई और इसे अनुच्छेद 40 शामिल में किया गया। इसे लागू करने की प्रतिबद्धता नहीं थी। इससे निपटने का जिम्मा भविष्य की सरकारों पर छोड़ दिया गया।

हालांकि, 1950 के दशक के आखिर और 1960 के दशक की शुरुआत में, कई राज्यों ने त्रिस्तरीय एक नई प्रणाली बनाई। गुजरात और महाराष्ट्र को छोडक़र अधिकांश में इसकी उपेक्षा हुई। पश्चिम बंगाल में 1973 में एक नया सवेरा हुआ। 1978 में पश्चिम बंगाल में दो-स्तरीय प्रणाली को अपनाया गया। उसके बाद आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में। पंचायत चुनाव नियमित रूप से केवल महाराष्ट्र और गुजरात (1960 के दशक की शुरुआत से) और बाद में पश्चिम बंगाल (1978 से) में आयोजित किए गए।

कई आधिकारिक समितियों ने प्रभावी ग्रामीण शासन से जुड़े मसले की जांच की। बलवंत राय मेहता समिति (1957) ने निर्णय लेने की शक्ति राज्य से ग्राम पंचायतों को देने की सिफारिश की। राष्ट्रीय विकास परिषद (1958) चाहती थी कि लोकतंत्र को सभी सरकारी प्रक्रियाओं और विकास में जमीनी स्तर और लोगों की भागीदारी बढ़ाई जाए। अशोक मेहता समिति (1977) ने जिला पंचायतों को राज्य के नीचे सत्ता केंद्र बनाने के लिए दो स्तरीय प्रणाली का प्रस्ताव रखा और जीवीके राव समिति (1985) ने तीन स्तरों वाले ढांचे की सिफारिश की। ग्राम सभाओं को प्रत्यक्ष लोकतंत्र का अवतार मानते हुए, एलएम सिंघवी समिति (1986) ने संविधान संशोधन के माध्यम से एक नया अध्याय शामिल करने का समर्थन किया, जिसमें ग्राम सभा को विकेंद्रीकृत लोकतंत्र का आधार बनाया गया।

लेकिन सामंती सोच वाले शासक वर्ग को ये भरोसा करने में चार दशक लग गए कि लोग खुद से खुद पर शासन कर सकते हैं। दरअसल, तब शासक वर्ग, कमांड और कंट्रोल लाइन, पर बहुत ज्यादा निर्भर था। स्वतंत्रता के वक्त भारत को औपनिवेशिक प्रशासन के तरीके विरासत में मिले थे। इन तरीकों को ईजाद ही इसलिए किया गया था कि एक गुलाम देश और उसके लोगों पर आसानी से शासन किया जा सके। आजादी के संघर्ष में यह खयाल भी शामिल था कि भविष्य में शासन करने के इन तरीकों का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा।

कैसे आए महत्वपूर्ण संशोधन अस्तित्व में?

1989 के संविधान (64वां संशोधन) विधेयक में संविधान में अनुच्छेद 243 को शामिल करने का प्रस्ताव शामिल था। इसके तहत सभी राज्यों में त्रिस्तरीय ढांचे को अनिवार्य किया जाना था। इसमें संविधान (65वां संशोधन) भी शामिल था जो शहरी स्थानीय निकाय से जुड़ा था। ये दोनों बिल 13 अक्टूबर, 1989 को लोकसभा से पारित हुए लेकिन राज्यसभा से पास नहीं हो पाए। 1990 में आया एक संयुक्त विधेयक भी फंस गया क्योंकि सरकार बदल गई। आखिरकार पंचायती राज पर संविधान (73वां) संशोधन कानून और नगरपालिका पर संविधान (74वां) संशोधन कानून क्रमश: 22 और 23 दिसंबर 1992 को पारित किया गया। पश्चिम बंगाल को छोडक़र सभी राज्य विधानसभाओं द्वारा अनुमोदित, इन कानूनों को क्रमश: 24 अप्रैल, 1993 और 1 जून, 1993 को अधिसूचित किया गया।

प्राचीन काल से ही भारत में ‘लोकतांत्रिक’ संस्थाओं का लंबा इतिहास रहा है। साझा संप्रभुता से संचालित इस समाज में, शक्ति और अधिकार का बंटवारा कुछ ऐसा रहा है कि गांव स्वशासी ग्राम गणराज्य के रूप में कार्य करते रहे हैं।

संविधान में दो नए भाग जोड़े गए- भाग IX  ‘पंचायत’ और भाग IXA  ‘नगर पालिकाएं’। कानूनों ने 29 विषयों को पंचायतों को और 18 विषयों को नगर पालिकाओं के सुपुर्द कर दिया। राज्यों को इन संशोधनों के हिसाब से एक साल के भीतर उपयुक्त कानून बनाना था। ग्रामीण शासन को तीन स्तरीय पंचायत राज संस्थाओं को सौंप दिया जाना था। इसी तरह शहरी शासन की जिम्मेदारी तीन प्रकार की नगर पालिकाओं को सौंप दिया जाना था। इसमें एक बड़े शहर के हिसाब से, दूसरा छोटे शहर के हिसाब से और तीसरा उन कस्बों के लिए था जो शहर में तब्दील हो रहे थे। (क्रमश:)

(मोंगाबे से साभार)

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