संपादकीय (Editorial)

प्राणीनाम् प्राणदा कृषि

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10 मई 2023, भोपाल । प्राणीनाम् प्राणदा कृषि – ‘खेती आप सेती’ आदिकाल से भोजन का पुख्ता श्रोत रही है और रहेगी। खेती में ‘संदेशन खेती’ को कोई स्थान नहीं है स्वयं देखो, सुनो और करो तो ही सफलता मिल सकती है। खेती सतत बहने वाली नदी के समान है उसमें बहाव तो कम ज्यादा हो सकते हैं परंतु रूकावट कहीं और कभी भी नहीं है। प्रदेश के कृषकों को खरीफ-रबी दोनों में हानि तो उठानी पड़ी फिर भी उतनी ही गति से जायद की फसलों का विस्तार किया गया जिसके सुखद परिणाम मिलने में अब अधिक समय नहीं बचा है। किसानी में ‘उपचार के पहले बचाव’ को अधिक महत्व दिया जाना आवश्यक है। जायद से बचे खेतों में ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई जिसके महत्व एवं फायदे पर पहले ही लिखा जा चुका है। ढेरों कीट-रोगों से फसलों के नुकसान को रोकने का सबसे सस्ता और सरल उपाय है। खेतों की तथा मेढ़ों की साफ-सफाई ताकि रोग-कीटों को आश्रय मिलना खत्म हो जाये। अब समय आ रहा है जायद की मक्का, चरी की मक्का, मूंगफली, मूंग, उड़द, लोबिया की कटाई का उस कार्य को भी तत्परता से हाथों में लिया जाना होगा एक बार फिर ध्यान दिलाना आवश्यक होगा कि मिट्टी के स्वास्थ्य परीक्षण के लिये यह सबसे उत्तम समय है पास की किसी प्रयोगशाला में नमूने भेेजें ताकि सिफारिश खरीफ बुआई के पहले ही हाथ में हो।

बसंतकालीन गन्ना तथा जड़ी की गन्ना फसल खेतों में है इस वक्त तापमान बढ़ता ही जा रहा है। भूमि में नमी के हृास की तीव्रता बढ़ रही है इस कारण भूमि के आकार, प्रकार तथा जरूरत को परखकर पानी देते रहें ताकि फसल हरी-भरी रहे। यही समय है गन्ने में मिट्टी चढ़ाने का तथा बची हुई उर्वरक की मात्रा को देने का जो निंदाई-गुड़ाई अर्थात् खरपतवार निकालने के बाद ही दिया जाये। वर्षा आधारित खेती में भूमि में अधिक से अधिक जल का संरक्षण करने के उपायों का पालन करें छोटी-छोटी डबरी तैयार रखें। हरी खाद के महत्व को सभी जानते हंै यही समय है हरी खाद सनई, ढेंचा की बुआई का ताकि समय रहते उसको भूमि में मोड़ दिया जाकर लाभ उठाया जा सके। हरी खाद के उपयोग से महंगे रसायनिक उर्वरकों के उपयोग पर भी कमी करके पैसा बचाया जा सकता है। लाभ की खेती का सबसे अहम मुद्दा है कि उसकी लागत में कमी की जा सके एक बार यदि लागत पर ही कमी हो सकी तो खेती तो स्वयं ही लाभकारी हो जायेगी। धान का क्षेत्र वर्तमान में पहले की अपेक्षा दोगुना हो रहा है जहां कभी धान लगाने के नाम पर संकोच होता था ऐसे क्षेत्रों में धान लगाकर अच्छा खासा उत्पादन लिया जा रहा है। और पुरानी परम्परा पुन: जीवित हो रही है। धान में सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य होता है समय पर अच्छे ढंग से पूर्ण तकनीकी का पालन करके उसकी नर्सरी डाली जाये उसकी सुरक्षा पुख्ता हो और अंदाज से उसे रोपाई मुख्य खेत जाति की पकने की अवधि से एक तिहाई से अधिक नहीं हो पाये। उसकी रोपाई की चाहे जो भी विधि है उसका पालन किया जाये। वैसे धान की श्रीविधि की सफलताओं की चर्चा तथा परिणाम सबके सामने है।

उद्यानिकी खेती का अभिन्न अंग है नये बगीचों को लगाने के लिये गड्ढों की खुदाई कर उसमें गोबर खाद डालकर तैयार रखने का यह उचित समय है। पुराने पौधों की कटाई-छंटाई खासकर बेर की कटाई करके विकसित जाति को लगाने का समय भी यही है। संतरे, नींबू, कटहल के मुख्य तनों पर बोर्डो पेस्ट का लेप तथा छिडक़ाव कार्य के साथ सक्रिय जड़ों के पास थाला बनाकर धूप दिखाने के बाद उसमें खाद-उर्वरक तथा सिंचाई भी की जाना चाहिये। बगीचों के लिये टपक सिंचाई सर्वोत्तम है को प्राथमिकता दें ताकि कीमती जल का अपवय पर रोक लग सके। नगदी मसाला फसल हल्दी, अदरक तथा अरबी और औषधि फसलों को लगाने की भी तैयारी करें। धान की नर्सरी के बगल में प्याज की भी नर्सरी डालें तथा कुछ क्षेत्र में गेंदा की भी नर्सरी तैयार करें। कुल मिलाकर कृषि की निरन्तरता कितनी अधिक है तेज है शायद ही किसी और कार्यों से इसकी तुलना हो सके यही कारण है। इसीलिये कहा है ‘प्राणीनाम् प्राणदा कृषि’।

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