ज्वार के जरिए खाद्य-सुरक्षा

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  • अरविन्द सरदाना

13 सितम्बर 2022, भोपालज्वार के जरिए खाद्य-सुरक्षा  साठ के दशक में लाई गई क्रांति ने बेहद सीमित, खासकर गेहूं-चावल की, फसलों को बढ़ावा दिया था। लेकिन इसने कई पौष्टिक, कम लागत की आसान फसलों को दरकिनार कर दिया था। क्या आज के दौर में फिर से उस कथित मोटे अनाजों को बढ़ावा दिया जा सकता है? क्या होगा, यदि मध्य प्रदेश में ज्वार की फसल को प्रोत्साहित किया जाए? प्रस्तुत है इस विषय पर यह लेख-
अब तक हमारा देश खाद्य सुरक्षा के लिए गेहूं और धान पर ही निर्भर रहा है, किन्तु अब इसे एक नया मोड़ देने का समय आ गया है। वास्तव में अलग-अलग क्षेत्रों के मोटे और अधिक पौष्टिक अनाज इसमें शामिल होने चाहिए। मध्यप्रदेश के लिए ज्वार को बढ़ावा देना उचित कदम होगा। हमें याद रखना चाहिए कि मध्यप्रदेश में ज्वार की खेती का जो रकबा वर्ष 1980 में 23 लाख हेक्टेयर था, वर्ष 2016-17 में घटकर केवल 2 लाख हेक्टेयर हो गया।

ज्वार को बढ़ावा देने के लिए क्या कदम हो सकते हैं, हमारा ध्यान आदिवासी अंचलों पर होना चाहिए। ज्वार की खेती को फैलाने के लिए जरूरी होगा कि हम सरकारी खरीदी की पुख्ता व्यवस्था बनाएं। दूरदराज के इलाकों के लिए विकेंद्रीकृत व्यवस्था ही चल सकती है। गेहूं के अनुभव से हम इसकी बारीकियां सीख सकते हैं। पिछले वर्ष ज्वार का समर्थन मूल्य 2738 रुपए था, जबकि किसान इसे मंडी या गांव में 1400 से 1600 के आस-पास बेच रहे थे। यदि इतना अंतर रहा तो इसके प्रति कोई आकर्षित नहीं होगा। समर्थन मूल्य मिलने पर ही छोटे किसानों को प्रोत्साहन मिलेगा। सभी परिवारों को नगद की आवश्यकता होती है और सोयाबीन की तरफ भागने का यही मुख्य कारण रहा है।

ज्वार को बढ़ावा देने के लिए चिन्हित क्षेत्रों में सामूहिक प्रयास करना चाहिए। फसलों में परिवर्तन तभी आते हैं जब एक साथ कई व्यवस्थाओं को संजोया जाए। खाद, बीज उपलब्ध करवाना, समर्थन मूल्य पर खरीदना, सरकार का स्टॉक भारतीय खाद्य निगम तक पहुँचाना, कृषि विज्ञान एवं पारंपरिक ज्ञान का मेल करवाना, फसल के लिए बीमा करवाना, ये सभी एक साथ करने की जरूरत होगी। ये सब काम सरकार ही कर सकती है। एक बार परंपरा में आ जाएं तब बाजार व्यवस्था इसे फैला सकती है।

खाद्य-सुरक्षा के लिए जरूरी है कि ज्वार मध्यप्रदेश में राशन दुकानों से उपलब्ध हो। आज जहां चार किलो गेहूं एवं एक किलो चावल मिलता है, वहीं तीन किलो गेहूं और एक किलो ज्वार दिया जा सकता है। यह व्यवस्था बनाने के लिए राज्य सरकार को भारतीय खाद्य निगम एवं केंद्र सरकार के साथ पहल करनी होगी और इसे एक मुद्दा बनाना होगा। तभी यह घोषणाओं से बढ़ कर क्रियान्वयन की तरफ जा सकता है।

खाद्य सुरक्षा के कई आयाम हैं, केवल राशन दुकान ही एकमात्र आयाम नहीं है। हम गेहूं के सन्दर्भ में देखते हैं कि छोटे किसान एवं खेतीहर मजदूर अपने घर की जरूरत के लिए अनाज भरते हैं। अपने खेतों से या मजदूरी से कुछ व्यवस्था कर लेते हैं। जैसे ज्वार का रकबा बढ़ता है, इसका उपयोग भी बढ़ेगा। ज्वार यहां का पारंपरिक खाद्यान्न है और इसका चलन वापस आ सकता है। यह अधिक पौष्टिक भी होगा और गेहूं का एक विकल्प भी।

भारतीय खाद्य निगम के बफर स्टॉक का एक उद्देश्य यह भी है कि वह बाजार के भाव को नियंत्रण में रख पाए। इस कारण हम देखते हैं कि खाद्य निगम कई बार अपने स्टॉक से मैदा मिलों को गेहूं सप्लाई करता है। इस वर्ष गेहूं के भाव को संभालना मुश्किल होगा। भारतीय खाद्य निगम ने मैदा मिलों की सप्लाई को रोक दिया है। स्टॉक कम होने का कारण है, बिना होमवर्क किए, हमने गेहंू के निर्यात को खोल दिया था। यदि गेहूं पर निर्भरता कम करके इन मोटे; पौष्टिक, अनाजों के चलन को बढ़ावा मिलता है, तो लोगों के पास विकल्प होंगे। उदाहरण के लिए ज्वार और गेहूं एक-दूसरे के बदले में उपयोग किए जा सकते हैं।

सैद्धांतिक रूप से शायद इसे माना भी जाता है, पर-भारतीय खाद्य निगम या राज्य सरकारों द्वारा कोई ठोस योजना नजर नहीं आती है, बल्कि इसकी उलटी दिशा नजर आती है। मध्यप्रदेश के खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग के आंकड़े यह कहानी बखूबी बयान करते हैं। वर्ष 2018-19 में गेहूं का उपार्जन 73 लाख टन था और ज्वार का उपार्जन केवल 0.06 लाख टन। वर्ष 2020-21 में गेहूं का उपार्जन बढक़र 129 लाख टन हो गया और ज्वार का उपार्जन घट कर शून्य हो गया।

कथनी और करनी में बहुत अंतर है और बिना इसे पाटे कोई हल नहीं निकाला जा सकता। ज्वार को बढ़ावा देने के लिए कुछ मुख्य चरण हैं, जिन्हें पहले लेने होंगे, तभी लोगों में विश्वास बन पायेगा। समर्थन मूल्य, पर खरीदी की व्यवस्था ही इस प्रक्रिया को शुरू कर सकती है। गेहूं का उपार्जन बहुत बढ़ा है, क्योंकि उसकी खरीदी गांव के पास के केन्द्रों पर होती है और प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती है। यही व्यवस्था ज्वार के लिए होनी चाहिए। इससे किसानों में विश्वास बढ़ेगा और ज्वार का फैलाव होगा। यह चरण शुरू होते ही बाजार भाव भी बढ़ेगा और कुछ वर्षों में किसानों के पास दोनों विकल्प होंगे, मंडी में बेचें या सरकारी केंद्र पर। इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा के लिए भी एक पौष्टिक विकल्प बन पायेगा। (सप्रेस)

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